मत्स्य उद्योग में सटीकता लाने के लिए इनकोइस द्वारा फिश ऐप लॉन्च
मछुआरे समुद्र से ही पकड़ी गई मछलियों की जियोटैग्ड तस्वीरें अपलोड कर सकेंगे
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, शाम 7:44 · अपडेट शाम 7:54 · 4 मिनट का पाठ
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भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) द्वारा विकसित नए एंड्रॉइड-आधारित मोबाइल एप्लिकेशन 'फिशरीज इंफॉर्मेशन सोर्स हब' (FISH) देश में फिशिंग एडवाइजरी देने की पद्धति में बड़ा बदलाव ला सकता है। इस ऐप के माध्यम से मछुआरे समुद्र में रहकर ही अपनी पकड़ी गई मछलियों की मात्रा की जियोटैग्ड तस्वीरें सीधे अपलोड कर सकेंगे।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस डेटा की मदद से अधिक सटीक और प्रजाति-विशिष्ट फिशिंग पूर्वानुमान विकसित किए जा सकेंगे। इससे मछुआरा समुदाय लक्षित मछली प्रजातियों को अधिक कुशलता से खोज सकेगा और टिकाऊ मत्स्य प्रबंधन को समर्थन मिलेगा।
भारत के समुद्री मत्स्य उद्योग क्षेत्र से लगभग 38 लाख तटीय निवासियों की आजीविका जुड़ी हुई है। हालांकि, यह क्षेत्र वर्तमान में तटीय संसाधनों के अत्यधिक उपयोग, तटीय जल में पकड़ी जाने वाली मछलियों की दर में गिरावट और मशीनीकृत तथा छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने वालों के बीच आय की बड़ी असमानता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
वर्तमान में, इनकोइस समुद्र की सतह के तापमान और क्लोरोफिल की सांद्रता के सैटेलाइट अवलोकनों के आधार पर दैनिक पोटेंशियल फिशिंग ज़ोन (PFZ) एडवाइजरी जारी करता है, ताकि खोज समय को कम किया जा सके और पकड़ी जा सकने वाली मछलियों की क्षमता में सुधार किया जा सके। लेकिन, विशिष्ट प्रजातियों के लिए पूर्वानुमान विकसित करने के लिए बड़ी मात्रा में जियो-रेफरेंस्ड कैच डेटा की आवश्यकता होती है, जो पारंपरिक निगरानी प्रणालियों के माध्यम से उपलब्ध नहीं होता है।
इस कमी को दूर करने के लिए इनकोइस ने 'सिटिजन-साइंस' दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें मछुआरा समुदाय को वैज्ञानिक अनुसंधान में सक्रिय भागीदार बनाया गया है। FISH ऐप के माध्यम से मछुआरे पकड़ी गई मछलियों की तस्वीरें ले सकते हैं, जो स्वचालित रूप से लोकेशन डेटा के साथ टैग हो जाती हैं। यह जानकारी इनकोइस के सर्वर पर भेजी जाती है, जहाँ वैज्ञानिकों और फिश टैक्सोनॉमी विशेषज्ञों द्वारा इसकी गुणवत्ता की जाँच और विश्लेषण किया जाता है।
इनकोइस के निदेशक टी.एम. बालकृष्णन नायर के अनुसार, इसके परिणाम उत्साहजनक रहे हैं। 2023-24 के पायलट चरण के दौरान 1,000 से अधिक मछुआरों ने इस एप्लिकेशन को इंस्टॉल किया था, जिससे उपयोगी जियो-टैग्ड तस्वीरों के सबमिशन में लगभग 20 गुना वृद्धि हुई। 2024 के अंत तक, इनकोइस को विभिन्न तटीय राज्यों से 1,000 से अधिक मान्य जियो-रेफरेंस्ड छवियां प्राप्त हुई थीं।
यह ऐप गुजराती, तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़, मराठी, ओडिया और बंगाली सहित 10 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। निदेशक ने बताया कि यह ऐप इंटरनेट कनेक्टिविटी के बिना भी काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। मछुआरे समुद्र में तस्वीरें ले सकते हैं और नेटवर्क उपलब्ध होने पर उन्हें अपलोड कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि एकत्रित डेटा हैबिटेट सूटेबिलिटी मॉडल और व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछलियों के लिए भविष्य की प्रजाति-विशिष्ट एडवाइजरी बनाने में मदद कर सकता है, जो इनकोइस द्वारा संचालित टूना एडवाइजरी सेवा की तरह ही होगा।
ऐप पर शोध करने वाले संस्थान के वैज्ञानिकों धन्या एम. लाल, टी.एन.सी. कार्तिक, स्नेहा झा, चेन्नुरी सतीश, सुस्मिता रौलो, आर. प्रेमकुमार, संजीबा कुमार बलियासिंह, अलकेश समंता और सुधीर जोसेफ ने उल्लेख किया है कि नागरिकों द्वारा उत्पन्न डेटा सैटेलाइट अवलोकनों का पूरक बन सकता है और मत्स्य अनुसंधान में महत्वपूर्ण सूचना अंतराल को भरने में मदद कर सकता है। ऐप के भविष्य के संस्करणों में उपयोगकर्ताओं को पकड़ी गई मछलियों की संख्या, जेलीफिश ब्लूम्स, समुद्री कचरे और बायकैच की रिपोर्ट करने की सुविधा भी मिल सकती है।
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