भारतीय महिला हॉकी टीम के पूर्व कोच गुरदयाल सिंह भंगू का 86 वर्ष की आयु में निधन
वर्ष 2002 की कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय टीम के मुख्य कोच के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, दोपहर 3:52 · अपडेट रात 8:31 · 2 मिनट का पाठ
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भारतीय महिला हॉकी टीम को सफलता के शिखर पर पहुंचाने वाले दिग्गज कोच गुरदयाल सिंह भंगू का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। स्पोर्ट्सस्टार की रिपोर्ट के अनुसार, वे लंबे समय से कनाडा के सरे में बस गए थे, जहां शुक्रवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। हॉकी इंडिया ने एक आधिकारिक बयान जारी कर उनके परिवार और परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की है और कहा है कि भारतीय हॉकी में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।
गुरदयाल सिंह भंगू ने वर्ष 1998 में भारतीय महिला हॉकी टीम के मुख्य कोच के रूप में कार्यभार संभाला था। उस समय टीम वर्ल्ड कप में 12वें स्थान पर थी, लेकिन भंगू के मार्गदर्शन में टीम ने कम समय में ही प्रभावशाली प्रदर्शन किया। उन्होंने कोच के रूप में जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही महीनों के भीतर टीम को एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल दिलाया। उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि वर्ष 2002 की मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स थी, जहां भारत की महिला टीम ने फाइनल में इंग्लैंड को 3-2 से हराकर स्वर्ण पदक जीता था। इस यादगार मैच में ममता खरब ने अतिरिक्त समय में गोल्डन गोल करके टीम को जीत दिलाई थी।
खेल के प्रति उनकी निष्ठा और मार्गदर्शन के कारण वर्ष 2000 में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान पाने वाले वे हॉकी के पहले कोच थे। भारत के अलावा, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी थी। वे 1972 से 1976 के बीच नाइजीरिया की महिला हॉकी टीम के मुख्य कोच रहे और उनके मार्गदर्शन में नाइजीरिया की टीम 1976 में पहली बार वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई हुई थी।
गुरदयाल सिंह भंगू का जन्म वर्ष 1941 में अविभाजित भारत के लायलपुर में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान का फैसलाबाद है। वे अंबाला में पले-बढ़े और विश्वविद्यालय स्तर पर हॉकी खेली। इसके बाद वे पटियाला की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS) से जुड़ गए। वहां उन्होंने हॉकी के दिग्गज खिलाड़ी ध्यानचंद और 1956 के ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता बलकिशन सिंह के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया और उनके सहायक के रूप में काम किया।
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