राणपुर में सिर पर मैला उठाने की प्रथा के खिलाफ 28 साल पहले शुरू हुई लड़ाई
1996 में अहमदाबाद के राणपुर गांव में मानव मल को सिर पर उठाने की शर्मनाक प्रथा के खिलाफ सामाजिक और कानूनी जंग शुरू हुई थी।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, सुबह 9:08 · 4 मिनट का पाठ
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अहमदाबाद जिले के धंधुका तालुका में स्थित राणपुर गांव वर्ष 1996 में एक गंभीर सामाजिक विवाद का केंद्र बना था। इस गांव में दलित सफाईकर्मियों ने मानव मल को हाथों से साफ करने के बजाय उसे सिर पर रखकर ले जाने की अत्यंत शर्मनाक और अमानवीय प्रथा के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी। इस प्रथा के खिलाफ सामाजिक और कानूनी लड़ाई की शुरुआत 1996 में हुई थी, जिसने पूरे गुजरात में चर्चा छेड़ दी थी।
राणपुर गांव भादर और गोमा नामक दो नदियों के किनारे बसा हुआ है। 1991 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, इस गांव में दलितों की कुल संख्या 582 थी। इस अनुसूचित जाति में आने वाली उपजातियों में रोहित, वणकर और वाल्मीकि समाज शामिल थे। गांव के रोहितवास में लगभग 100, वणकर समाज में 34 और वाल्मीकि समाज में 20 परिवार रहते थे।
इस प्रथा की सच्चाई तब सामने आई जब 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के पत्रकार राजीव शाह ने 11 मार्च, 1996 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उन्होंने 'राणपुर में आज भी मानव मल को सिर पर उठाकर ले जाने की शर्मनाक प्रथा अस्तित्व में है' जैसे शीर्षक के साथ यह समाचार दिया था। बीबीसी गुजराती के साथ बातचीत में राजीव शाह ने बताया कि यह रिपोर्ट 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के पहले पन्ने पर छपी थी और बाद में इसके दूसरे संस्करण में भी प्रकाशित हुई थी। उन्होंने उल्लेख किया कि गांव में सिर पर मैला उठाने वालों के लिए एक रजिस्टर भी रखा जाता था, जिसमें कुछ लोगों के नाम लिखे थे। इस पूरी घटना की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने में दलित कार्यकर्ता मार्टिन मेकवान का बड़ा योगदान रहा था।
रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद गांव दो हिस्सों में बंट गया था। एक तरफ गैर-दलितों, ग्राम पंचायत के अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों का कहना था कि राणपुर में ऐसी कोई प्रथा अस्तित्व में नहीं है और समाचार पत्रों की रिपोर्ट भ्रामक है। दूसरी ओर, ग्रामीणों का कहना था कि सफाईकर्मियों ने अवैध हड़ताल की है, इसलिए सत्ताधारी पक्ष के पास उनके खिलाफ कदम उठाने का अधिकार है। वहीं दूसरी ओर दलितों ने आरोप लगाया कि अधिकारियों द्वारा उनका अपमान किया जा रहा है।
गांव के नेता शशिकांत कालमा ने रामजी मंदिर में आयोजित सभा में इस स्थिति पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया था। उन्होंने बताया कि पंचायत में कुल 45 सफाईकर्मी काम करते थे, जिनमें से 36 लोग पिछले 4 से 25 वर्षों से दैनिक मजदूर के रूप में कार्यरत थे। इन सफाईकर्मियों में 6 झाड़ू लगाने वाले, 4 खाद के ढेर उठाने वाले, 15 गटर सफाईकर्मी और लगभग 4 लोग सिर पर मैला उठाने का काम करते थे। शशिकांत कालमा के अनुसार, 24-01-1996 को सभी सफाईकर्मियों को निकाल दिया गया था और उनकी उपस्थिति दर्ज करना बंद कर दिया गया था। पिछले ढाई-तीन महीनों से ये सभी सफाईकर्मी घर बैठे थे और उनकी स्थिति बहुत विकट थी।
दलित महिलाओं ने मंदिर के बाहर खड़े होकर अपनी बेबसी व्यक्त करते हुए कहा कि वे पिछले दो महीनों से भूखी या अर्ध-भूखी रह रही थीं। ग्रामीणों के सामने हाथ जोड़ने के बावजूद किसी का दिल नहीं पसीजा और इसके बजाय उन्हें गालियां दी गईं। इस आर्थिक संकट के कारण उन्हें बर्तन बेचकर या कर्ज लेकर गुजारा करना पड़ रहा था। शशिकांत कालमा ने आगे कहा कि एक तरफ वे नौकरी पर नहीं जा पा रहे थे, तो दूसरी तरफ वेतन के अभाव में बच्चों को खिलाने की चिंता सता रही थी।
इस पूरी घटना की जांच और राय देने के लिए टी.डी. सोयंतर, डॉ. रमेशचंद्र परमार, 'सेंटर फॉर द सोशल स्टडीज' सूरत के कार्यकर्ता प्रदीपकुमार पचपिंडे और 'नवसर्जन ट्रस्ट' के कार्यकर्ताओं ने स्थल का दौरा किया था। डॉ. रमेशचंद्र परमार ने 'हाथ में झाड़ू, माथे में मैला' नामक पुस्तिका के माध्यम से गांव में होने वाली इस घटना का चित्रण किया है।
राणपुर गांव अमृतलाल दलपतभाई सेठ और प्रसिद्ध कवि एवं लेखक झवेरचंद मेघानी की कर्मभूमि रही है।
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