सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में वन अधिकारों के दावों की जांच के लिए भूषण गवई समिति नियुक्त की
अगास्त्यमलाई क्षेत्र में वनवासियों के दावों के निपटारे के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त समयसीमा दी
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, रात 9:53 · 4 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तमिलनाडु में वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के तहत अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों की जांच के लिए जस्टिस भूषण आर. गवई के नेतृत्व में एक विशेष समिति का गठन किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस समिति का गठन किया है, जिसमें जस्टिस गवई अध्यक्ष होंगे। इस पैनल में सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी (CEC) के एक अधिकारी और तमिलनाडु के प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट को शामिल किया गया है।
यह समिति वन-निवासी अनुसूचित जनजाति (FDST) और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (OTFD) के दावों के निर्धारण की निगरानी करेगी। समिति द्वारा FRA के तहत सक्षम अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों की सूक्ष्म जांच की जाएगी और इसके निष्कर्ष सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंपे जाएंगे। समिति को दावों के त्वरित निपटान के लिए अधिकारियों को आवश्यक निर्देश देने का अधिकार दिया गया है, और राज्य सरकार को समिति को मासिक प्रगति रिपोर्ट सौंपनी होगी।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील अगास्त्यमलाई लैंडस्केप में वनवासियों के दावों की पहचान करने और उनके न्यायिक निपटान के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू करने में लंबे समय तक विफल रहने के लिए तमिलनाडु सरकार की कड़ी आलोचना की है। बेंच ने टिप्पणी की कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के अंतरिम स्थगन को हटाने के बाद भी वर्षों तक FRA के तहत प्रक्रिया शुरू नहीं की गई थी। कोर्ट ने नोट किया कि जब इस कोर्ट ने मौजूदा स्थिति का स्वतः संज्ञान लिया, उसके बाद ही यह प्रक्रिया शुरू हुई प्रतीत होती है।
कोर्ट ने आगे कहा कि श्रीविल्लीपुथुर-मेगामलाई टाइगर रिजर्व और अगास्त्यमलाई बायोस्फीयर के अन्य आरक्षित वनों से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिए जाने के बाद ही राज्य सरकार जागी लगती है। बेंच ने स्पष्ट किया कि FRA, 2006 के तहत दावों को प्राप्त करने, पहचानने और निपटाने में देरी के लिए राज्य सरकार मुख्य रूप से जिम्मेदार है। कोर्ट ने नोट किया कि वन क्षेत्र में अतिक्रमण का संज्ञान लेने से पहले ग्राम सभाओं का गठन तक नहीं किया गया था। इसलिए, कोर्ट ने राज्य को इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 'अंतिम अवसर' दिया है।
कोर्ट ने राज्य को 30 दिनों के भीतर शेष ग्राम सभाओं का गठन पूरा करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, ग्राम सभाओं के गठन के पांच महीने के भीतर कानूनी तीन-स्तरीय तंत्र के माध्यम से दावों को आमंत्रित करने और उनके निपटान की पूरी प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया है। समिति को यह अंतिम समयसीमा समाप्त होने के दो महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करनी होगी।
यह कार्रवाई अगास्त्यमलाई लैंडस्केप में बड़े पैमाने पर हुए अतिक्रमण के संदर्भ में की गई है, जहां 29 मई के फैसले में कोर्ट ने बेदखली, पुनर्वास और पर्यावरणीय बहाली के लिए समयबद्ध प्रक्रिया का आदेश दिया था। हालिया कार्रवाई मेगामलाई क्षेत्र में रहने या खेती करने वाले लोगों पर FRA के कार्यान्वयन के विरोधाभासी दावों के कारण हुई थी।
राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि बेदखली से पहले FRA के तहत दावों की जांच करना आवश्यक है। हालांकि, कोर्ट ने एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वरन की इस दलील को स्वीकार किया कि वन भूमि पर कब्जा करने या खेती करने वाले हर व्यक्ति को इस कानून के तहत अंधाधुंध संरक्षण नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य द्वारा पहचाने गए दो श्रेणियों के कब्जाधारियों पर इस कानून के तहत विचार नहीं किया जाएगा: पहला, जो वन भूमि पर खेती करते हैं लेकिन वहां केवल अस्थायी निवास रखते हैं, और दूसरा, जो वन सीमा के बाहर रहते हैं लेकिन वन क्षेत्र के भीतर खेती करते हैं।
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ काउंसिल जयदीप गुप्ता और राज्य के सामाजिक न्याय विभाग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचु उपस्थित रहे।
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