बोडेली क्षेत्र में मिट्टी के कोडिया का स्थान अब रंग-बिरंगे फाइबर के दीये ले रहे हैं
बदलाव के कारण पारंपरिक मिट्टी के काम का कुटीर उद्योग खतरे में
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, सुबह 2:27 · 1 मिनट का पाठ
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बोडेली तालुका के जबुगाम क्षेत्र में दिवाली के पर्व के दौरान बाजार में खरीदारी का भारी माहौल देखा जा रहा है। हालांकि, इस वर्ष पारंपरिक मिट्टी के कोडिया और दीयों के स्थान पर रंग-बिरंगे फाइबर के आकर्षक दीयों का चलन बढ़ गया है। फाइबर के दीयों के बढ़ते क्रेज के कारण हजारों वर्षों से चली आ रही मिट्टी के दीयों की परंपरा और उसका महत्व धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा है।
संदेश की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव के कारण बोडेली तालुका में मिट्टी का काम करने वाले कलात्मक कारीगरों की आजीविका पर बेरोजगारी का खतरा मंडरा रहा है। जबुगाम के कुम्हारवाड़ा में रहने वाले अनुभवी कारीगर नटुभाई प्रजापति रोजाना चाक पर बैठकर 150 से 300 की संख्या में दीये, कुल्हड़ और कोडिया बनाते हैं। वे मिट्टी से वस्तुएं बनाकर, डोरी से काटकर, भट्टी में पकाकर और रंगाई करके उन्हें तैयार करते हैं। इसके बावजूद, वे मुश्किल से इतना कमा पाते हैं जिससे उनका गुजारा हो सके।
कारीगरों के लिए मिट्टी की कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। अब मिट्टी बाहर से मंगवानी पड़ती है, जिससे इसकी लागत सोने से भी महंगी पड़ती है। इसके अलावा, प्रजापति समुदाय के बेटे इस कला विरासत को सीखने के लिए तैयार नहीं हैं, जिसके कारण यह कुटीर उद्योग अब मरणासन्न स्थिति में आ गया है।
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