उत्तरी अफ्रीका में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन से जल संकट और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा
यूरोप में निर्यात के लिए ग्रीन हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया में पानी की खपत बढ़ने से पर्यावरणीय जोखिम पैदा हो गए हैं।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, दोपहर 2:06 · 2 मिनट का पाठ
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द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरी अफ्रीका से यूरोप में ग्रीन हाइड्रोजन निर्यात करने की परियोजनाएं स्थानीय जल आपूर्ति और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने के लिए पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करना पड़ता है, जिसमें बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। उत्तरी अफ्रीका के जिन क्षेत्रों में सौर और पवन ऊर्जा के स्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, वहीं पानी की सबसे अधिक कमी देखी जाती है। इन क्षेत्रों में भूजल पहले ही अत्यधिक घट चुका है, इसलिए अतिरिक्त खपत स्थिति को और भी विकट बना सकती है।
ग्रीन हाइड्रोजन एक प्रकार की नवीकरणीय ऊर्जा है, जिसका व्यापक उपयोग वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी ला सकता है। यह स्वच्छ और शून्य उत्सर्जन वाला ईंधन मुख्य रूप से स्टील उत्पादन और केमिकल रिफाइनिंग जैसे उद्योगों में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, समुद्री शिपिंग, विमानन और लंबी दूरी की ट्रकिंग जैसे भारी परिवहन क्षेत्रों में भी इसके उपयोग की संभावना है। हालांकि, इस ऊर्जा के उत्पादन के पीछे पर्यावरणीय कीमत चुकानी पड़ सकती है।
ग्रीन हाइड्रोजन पानी के विद्युत अपघटन (electrolysis) द्वारा प्राप्त किया जाने वाला स्वच्छ ईंधन है। अतीत में इस तकनीक को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता था, लेकिन अब इसके उत्पादन के लिए आवश्यक जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं।
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