AI की अतृप्त भूख: आपके एक सवाल का जवाब देने के पीछे कितनी बिजली खर्च होती है?
जब आप AI से कोई सवाल पूछते हैं, तो पर्दे के पीछे हज़ारों प्रोसेसर अरबों गणनाएँ करते हैं। इस लेख में हम इस तकनीक की बिजली की खपत और उसके पर्यावरणीय प्रभाव के बारे में गहराई से जानेंगे।

जब हम स्मार्टफोन या कंप्यूटर पर ChatGPT या Google Gemini जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोग्राम का उपयोग करते हैं, तो हमें लगता है कि यह सब डिजिटल दुनिया में बहुत ही आसानी से हो रहा है। परंतु वास्तविकता यह है कि हर सवाल के जवाब के पीछे हजारों मील दूर स्थित विशाल डेटा सेंटरों में हजारों प्रोसेसर सेकंड के सौवें हिस्से में अरबों गणनाएं करते हैं। इन गणनाओं को करने के लिए प्रचुर मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है, जो आधुनिक तकनीक के युग में एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (artificial intelligence) यानी AI कंप्यूटेशनल प्रणालियों की वह क्षमता है जो आमतौर पर मानवीय बुद्धि से जुड़े कार्य कर सकती है। इसमें सीखना, तर्क करना, समस्या का समाधान निकालना और निर्णय लेने की प्रक्रिया शामिल है। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, AI अनुसंधान का उद्देश्य मशीनों को उनके वातावरण को समझने और निर्धारित लक्ष्य हासिल करने के लिए बुद्धिमान कदम उठाने में सक्षम बनाना है। परंतु यह बुद्धि मुफ्त में नहीं मिलती; इसके पीछे ऊर्जा का बड़ा खर्च छिपा हुआ है।
ऊर्जा की खपत और भौतिकी के नियम
कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब काम करता है, तब वह बिजली की खपत करता है। भौतिकी के नियमों के अनुसार, ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित किया जा सकता है। जब कोई कंप्यूटर प्रोसेसर AI के सवाल का जवाब देने के लिए गणना करता है, तब वह विद्युत ऊर्जा का उष्मीय ऊर्जा यानी गर्मी में रूपांतरण करता है। यही कारण है कि बड़े डेटा सेंटर बहुत अधिक गर्म हो जाते हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए अतिरिक्त बिजली खर्च करनी पड़ती है।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ऊर्जा की खपत को समझने के लिए दो मुख्य शब्दों को समझना आवश्यक है: पावर (power) और एनर्जी (energy)। पावर ऊर्जा खपत की दर है, जिसे वॉट (W) में मापा जाता है। जबकि एनर्जी वह समयावधि के दौरान उपयोग की गई कुल ऊर्जा है, जिसे वॉट-आवर (Wh) या किलोवॉट-आवर (kWh) में मापा जाता है। इसका सूत्र E = P × t है, जहाँ E ऊर्जा है, P पावर है और t समय है। AI मॉडल जितना लंबा समय और जितनी अधिक शक्ति के साथ काम करते हैं, उतना ही उनकी बिजली की खपत बढ़ती है।
- इनपुट प्रोसेसिंगआपके सवाल को टोकन में विभाजित करके प्रोसेसर तक पहुंचाया जाता है।
- न्यूरल नेटवर्क एक्टिवेशनGPU में मौजूद अरबों पैरामीटर्स सक्रिय होते हैं और गणनाएं शुरू होती हैं।
- डेटा रिट्रीवलमॉडल अपने ट्रेनिंग डेटा के आधार पर सबसे उपयुक्त शब्दों का चयन करता है।
- आउटपुट जनरेशनचयनित शब्दों को जोड़कर इंसानों द्वारा समझे जाने योग्य वाक्यों में रूपांतरित किया जाता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उदय और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स
AI क्षेत्र की शुरुआत 1956 में एक शैक्षणिक विषय के रूप में हुई थी। शुरुआती वर्षों में शोधकर्ताओं ने ऐसे एल्गोरिदम बनाए जो मानवीय तर्क की नकल करते थे। हालाँकि, 1980 और 1990 के दशक में ये पद्धतियाँ सीमित साबित हुईं क्योंकि वे जटिल समस्याओं को हल करने में बहुत धीमी थीं। 2012 के बाद इस क्षेत्र में बड़ी क्रांति आई जब न्यूरल नेटवर्क को तेज करने के लिए ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) का उपयोग होने लगा।
ग्राफीक्स प्रोसेसिंग युनिट (graphics processing unit) एक विशेष प्रकार का प्रोसेसर है जो एक साथ कई गणनाएँ करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। पहले इसका उपयोग केवल वीडियो गेम्स के ग्राफीक्स के लिए होता था, लेकिन अब यह AI की रीढ़ बन गया है। २०१७ में ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर (transformer architecture) की खोज हुई, जिसने AI को भाषा समझने और टेक्स्ट जनरेट करने में अभूतपूर्व सफलता दिलाई। इसी प्रगति के कारण आज हम ChatGPT जैसे मॉडल देख सकते हैं, लेकिन इस जटिल आर्किटेक्चर को चलाने के लिए पिछले मॉडलों की तुलना में कई गुना अधिक बिजली की आवश्यकता होती है।
| विशेषता | पावर (Power) | एनर्जी (Energy) |
|---|---|---|
| परिभाषा | ऊर्जा खपत की दर | कुल उपयोग की गई ऊर्जा |
| इकाई | वाट (W) या किलोवाट (kW) | वाट-अव्र (Wh) या किलोवाट-अव्र (kWh) |
| माप | तत्काल खपत दर्शाता है | समय अवधि के दौरान की खपत दर्शाता है |

ट्रेनिंग विरुद्ध इन्फरेंस: ऊर्जा कहाँ खपत होती है?
AI के जीवनचक्र में ऊर्जा खपत के दो मुख्य चरण हैं: ट्रेनिंग (training) और इन्फरेंस (inference)। ट्रेनिंग वह प्रक्रिया है जिसमें AI मॉडल को अरबों पुस्तकों, लेखों और वेबसाइटों का डेटा खिलाकर सिखाया जाता है। इस प्रक्रिया में हज़ारों GPUs महीनों तक लगातार चलते हैं। उदाहरण के लिए, बड़े भाषा मॉडल (LLMs) को ट्रेन करने के लिए इतनी बिजली खर्च होती है जो सैकड़ों घरों को पूरे साल के दौरान पावर दे सकती है। विकिपीडिया के स्रोतों के अनुसार, OpenAI, Google और Meta जैसी कंपनियाँ अब आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) बनाने का लक्ष्य रखती हैं, जो इंसानों जितनी ही कार्यक्षमता रखता हो। ऐसे मॉडलों की ट्रेनिंग का खर्च और ऊर्जा खपत लगातार बढ़ रही है।
दूसरा चरण है इन्फरेंस, जिसका अर्थ है मॉडल द्वारा यूज़र के सवाल का जवाब देने की प्रक्रिया। हालाँकि एक सवाल का जवाब देने में खर्च होने वाली बिजली ट्रेनिंग की तुलना में बहुत कम होती है, लेकिन जब करोड़ों लोग दिन में कई बार AI का उपयोग करते हैं, तो यह कुल खपत बहुत बड़ी हो जाती है। आम तौर पर, एक AI सर्च क्वेरी पारंपरिक गूगल सर्च की तुलना में लगभग १० गुना अधिक बिजली की खपत कर सकती है, क्योंकि सर्च इंजन केवल इंडेक्स से जानकारी ढूँढता है, जबकि AI उस जानकारी को समझकर नए सिरे से वाक्य बनाता है।
डेटा सेंटर: AI के विशाल पावर प्लांट्स
AI के ये सभी कार्य डेटा सेंटरों में होते हैं। डेटा सेंटर (data center) एक विशाल इमारत है जिसमें हज़ारों सर्वर्स और स्टोरेज डिवाइसेज रखे जाते हैं। इन सर्वर्स को चलाने के लिए केवल बिजली ही नहीं, बल्कि उन्हें ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी और एयर कंडीशनिंग सिस्टम्स की भी आवश्यकता होती है। अमेज़न वेब सर्विसेज (AWS), गूगल क्लाउड और माइक्रोसॉफ्ट एज्योर जैसे प्लेटफॉर्म्स दुनिया भर में ऐसे विशाल डेटा सेंटर चलाते हैं।
इन डेटा केंद्रों में सर्वर कैबिनेट्स की कतारें होती हैं, जिनमें प्रत्येक सर्वर निरंतर कार्य करता रहता है। बिजली की आपूर्ति बाधित न हो, इसके लिए वहाँ बैटरी बैंक और डीजल जनरेटर की भी व्यवस्था होती है। जैसे-जैसे AI का उपयोग बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे इन डेटा केंद्रों की संख्या और उनकी बिजली की माँग भी बढ़ रही है। कुछ अनुमानों के अनुसार, आगामी कुछ वर्षों में डेटा केंद्रों की बिजली की खपत दुनिया की कुल बिजली की खपत के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से जितनी हो सकती है।

पर्यावरण पर असर और भविष्य का मार्ग
AI की यह बढ़ती हुई भूख पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है। यदि यह बिजली कोयले या गैस जैसे जीवाश्म ईंधन से प्राप्त की जाए, तो यह कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि करती है, जो जलवायु परिवर्तन (climate change) के लिए ज़िम्मेदार है। इसीलिए कई टेक कंपनियाँ अब अपने डेटा केंद्रों को सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों द्वारा चलाने का प्रयास कर रही हैं।
भविष्य में AI को अधिक ऊर्जा-कुशल (energy-efficient) बनाने के लिए शोध हो रहे हैं। इसमें कम पावर पर चलने वाली नई चिप्स की डिज़ाइन और अधिक स्मार्ट एल्गोरिदम शामिल हैं जो कम से कम गणना करके सटीक जवाब दे सकें। मशीन लर्निंग (machine learning) की नई पद्धतियाँ, जैसे ट्रांसफर लर्निंग, मॉडल को पिछले ज्ञान का उपयोग करके कम डेटा और कम ऊर्जा के साथ सीखने में मदद करती हैं।
निष्कर्ष में, जब हम AI की सुविधा का आनंद लेते हैं, तब हमें इसके पीछे खर्च होने वाली ऊर्जा और संसाधनों के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए। तकनीक का विकास अनिवार्य है, लेकिन वह टिकाऊ (sustainable) होना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले समय में AI की सफलता केवल उसकी बुद्धिमत्ता पर ही नहीं, बल्कि वह कितनी कम बिजली में काम कर सकती है, इस पर भी निर्भर करेगी।


