डीपफेक और चुनाव: नकली वीडियो से मतदाता कैसे सावधान रहें
नेता का अवाज़, चेहरा और हाव-भाव अब कुछ मिनटों में नकली बनाए जा सकते हैं। लोकतंत्र में सबसे बड़ा रक्षाकवच तकनीक नहीं, जागरूक मतदाता है।

चुनाव से ठीक पहले की रात WhatsApp पर एक वीडियो आता है: जाने-माने नेता कैमरे के सामने ऐसी बात कहते हैं जो उन्होंने कभी कही ही नहीं। आवाज़ वही, चेहरा वही, होंठ भी शब्दों के साथ हिलते हैं। इसे 'डीपफेक' कहते हैं: AI की मदद से बनाया गया नकली वीडियो या आवाज़।
कुछ साल पहले ऐसा वीडियो बनाने के लिए विशेषज्ञ और महंगे कंप्यूटर चाहिए थे। आज मुफ्त ऐप्स भी मिनटों में यह कर देती हैं। भारत सहित कई देशों के चुनावों में ऐसे वीडियो घूम रहे हैं, और चुनाव आयोग ने दलों को ऐसी सामग्री सामने आते ही हटाने के निर्देश दिए हैं।
पहचानने के पाँच सरल तरीके
पहला, स्रोत देखें: क्या वीडियो किसी जाने-माने समाचार संस्थान या नेता के आधिकारिक खाते पर है या केवल फॉरवर्ड होकर आया है? दूसरा, आँख, दाँत, कान की लौ और बालों के किनारे ध्यान से देखें; नकली वीडियो में वहाँ अक्सर धुंधलापन या टिमटिमाहट दिखाई देती है। तीसरा, आवाज़ में साँस और रुकावट प्राकृतिक है या यंत्र जैसी सपाट?
चौथा, बात बहुत चौंकाने वाली हो और कहीं और उसका कोई समाचार न हो, तो रुक जाइए। पाँचवाँ, शंका हो तो फॉरवर्ड न करें। नकली वीडियो की ताकत यह है कि वह हमारे ही हाथों से फैलता है।
ज़िम्मेदारी किसकी
प्रौद्योगिकी कंपनियाँ AI से बनी सामग्री की पहचान के तरीके विकसित कर रही हैं, और सरकारें कानूनों पर विचार कर रही हैं। लेकिन कोई भी उपकरण सौ प्रतिशत पहचान नहीं सकता। लोकतंत्र में अंतिम रक्षाकवच वह मतदाता है जो जल्दबाजी में विश्वास नहीं करता और पूछता है: यह कहाँ से आया?
