आपकी जानकारी, आपका अधिकार: डेटा सुरक्षा कानून आम आदमी के लिए क्या बदलता है
ऐप डाउनलोड करते समय 'सहमति' बटन दबाते हैं, लेकिन किस बात की सहमति? २०२३ का कानून कंपनियों पर नई जिम्मेदारियां डालता है।

फोन नंबर, आधार, बैंक का विवरण, आप कहां गए और क्या खरीदा: आज हमारे बारे में जानकारी सोने जितनी कीमती है। अगस्त २०२३ में संसद ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून पारित किया, जो यह तय करता है कि कंपनियां और सरकारी संस्थाएं इस जानकारी का उपयोग कैसे कर सकती हैं।
कानून के मुख्य बिंदु
कंपनी को आपकी जानकारी लेने से पहले स्पष्ट भाषा में यह बताना होगा कि वह क्या ले रही है और क्यों। यह सूचना गुजराती सहित संविधान की अनुसूची की भाषाओं में भी मांगी जा सकती है। आप दी गई सहमति वापस भी ले सकते हैं, और काम पूरा होने के बाद जानकारी हटानी होगी।
बच्चों की जानकारी के लिए माता-पिता की सहमति जरूरी है। जानकारी चोरी हो या लीक हो तो कंपनी को सूचना देनी होगी। नियम तोड़ने वाले पर ₹२५० करोड़ तक का जुर्माना हो सकता है, और शिकायतें सुनने के लिए डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड का गठन किया जाएगा।
आलोचना और सवाल
कानून की कुछ बातों पर चर्चा जारी है। सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कारणों से बड़ी छूट मिलती है, और सूचना का अधिकार कानून में हुए बदलाव से पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को चिंता है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि नियम कैसे बनाए जाते हैं और बोर्ड कितना स्वतंत्र रहता है।
आपके लिए व्यावहारिक बात: कोई ऐप जरूरत के बिना आपके संपर्कों, फोटो या स्थान की अनुमति मांगे तो मना करें। कानून अधिकार देता है, लेकिन उसका उपयोग जागरूक नागरिक को ही करना पड़ता है।
