न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग: मानव मस्तिष्क से प्रेरणा लेकर रची गई भविष्य की सिलिकॉन क्रांति
पारंपरिक कंप्यूटिंग की सीमाओं को तोड़कर मानव मस्तिष्क की तरह काम करने वाली न्यूरोमॉर्फिक चिप्स और स्पाइकिंग न्यूरल नेटवर्क तकनीक की दुनिया को कैसे बदल रहे हैं, इसका गहन विश्लेषण।

आज के डिजिटल युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग चरम पर है, लेकिन इसके पीछे इस्तेमाल होने वाली कंप्यूटिंग ऊर्जा और प्रोसेसिंग क्षमता एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। पारंपरिक कंप्यूटिंग सिस्टम 'वॉन न्यूमैन आर्किटेक्चर' पर आधारित होते हैं, जिसमें प्रोसेसर और मेमोरी अलग-अलग होते हैं। इस सीमा को दूर करने के लिए वैज्ञानिक अब मानव मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली से प्रेरणा ले रहे हैं। इस दृष्टिकोण को न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग (Neuromorphic computing) कहा जाता है। न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम्स कृत्रिम न्यूरॉन्स (artificial neurons) और सिनेप्स (synapses) का उपयोग करके सूचना का प्रसंस्करण करते हैं, जो मानव मस्तिष्क की तरह पर्यावरण को समझने, गति नियंत्रण और बहुविध संवेदनाओं को एकीकृत करने जैसे जटिल कार्य करते हैं।
ये सिस्टम्स एनालॉग (analog), डिजिटल (digital) या मिश्रित-मोड VLSI (वेरी लार्जेस्ट स्केल इंटीग्रेशन: बड़े पैमाने पर एकीकृत सर्किट) हार्डवेयर पर लागू किए जाते हैं। मस्तिष्क की तरह ही, ये सिस्टम्स छोटे कंप्यूटिंग तत्वों में वितरित प्रसंस्करण (distributed processing) करते हैं, जो ऊर्जा दक्षता और सीखने की क्षमता में काफी वृद्धि करता है। न्यूरोमॉर्फिक इंजीनियरिंग जीवविज्ञान, भौतिकी, गणित, कंप्यूटर विज्ञान और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग का समन्वय रखने वाला एक अंतःविषय क्षेत्र है।
- सिग्नल ग्रहणआने वाले स्पाइक्स (वीज आवेगों) न्यूरॉन के मेम्ब्रेन पोटेंशियल को ऊंचा या नीचा करते हैं।
- पोटेंशियल संचयसमय के साथ न्यूरॉन में वीजभार इकट्ठा होता है, जो लीकी इंटिग्रेट-एंड-फायर (LIF) मॉडल द्वारा गिना जाता है।
- थ्रेशोल्ड स्पर्श और फायरिंगजब मेम्ब्रेन पोटेंशियल निश्चित थ्रेशोल्ड मूल्य तक पहुंचता है, तब न्यूरॉन फायर हो स्पाइक उत्सर्जित करता है।
- सिग्नल प्रसारण और रिसेटउत्सर्जित संकेत आगे के न्यूरॉन्स की तरफ जाता है और मूल न्यूरॉन का पोटेंशियल नीचे मूल्य पर रिसेट होता है।

न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग का इतिहास और क्रांतिकारी पड़ाव
न्यूरोमॉर्फिक इंजीनियरिंग का विचार सबसे पहले 1980 के दशक के अंत में कार्वर मीड (Carver Mead) द्वारा प्रस्तावित किया गया था। इसके बाद इस क्षेत्र में तेजी से शोध शुरू हुए। 2006 में, जॉर्जिया टेक के शोधकर्ताओं ने एक फील्ड प्रोग्रामेबल न्यूरल एरे (Field Programmable Neural Array) विकसित किया, जो सिलिकॉन आधारित चिप पर न्यूरॉन के आयन चैनल लक्षणों की मॉडलिंग करता था। 2011 में, MIT के शोधकर्ताओं ने standard CMOS टेक्नोलॉजी और 400 ट्रांजिस्टर का उपयोग करके सिनेप्टिक कम्युनिकेशन की नकल करने वाली एक चिप बनाई।
2012 में HP लैब्स के शोधकर्ताओं ने दर्शाया कि मोट मेमरिस्टर्स (Mott memristors) कम तापमान पर अस्थिर व्यवहार दर्शाते हैं, जिससे न्यूरिस्टर्स बनाना संभव हुआ जो न्यूरॉन के व्यवहार की नकल कर सकते हैं। उसी साल पर्ड्यू यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने लेटरल स्पिन वाल्व और मेमरिस्टर्स का उपयोग करके ऊर्जा-कुशल चिप डिजाइन पेश की। 2013 में शुरू हुए ब्लू ब्रेन प्रोजेक्ट (Blue Brain Project) के जरिए चूहे के मस्तिष्क के विस्तृत डिजिटल मॉडल बनाए गए। 2014 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ब्रेइंस इन सिलिकॉन ग्रुप द्वारा 'न्यूरोग्रिड' (Neurogrid) विकसित किया गया, जिसमें 16 NeuroCore चिप्स का उपयोग करके 65,536 न्यूरॉन्स का उच्च ऊर्जा दक्षता के साथ अनुकरण किया गया। इसी वर्ष IBM की TrueNorth चिप और BRAIN इनीशिएटिव ने भी इस क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया।

२०१६ में हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी में विकसित किया गया 'ब्रेनस्केल्स' (BrainScaleS) हाइब्रिड सुपरकंप्यूटर जैविक न्यूरॉन्स से 864 गुना गति से काम करने में सक्षम था। २०१७ में Intel द्वारा अपनी 'लोइही' (Loihi) चिप घोषित की गई, जो असिंक्रोनस कृत्रिम न्युरल नेटवर्क का उपयोग करके ऑनलाइन लर्निंग और इन्फर्न्स के लिए अनुकूल थी। उसी वर्ष IMEC की ऑक्सआरएएम (OxRAM) आधारित सेल्फ-लर्निंग चिप ने मिन्यूएट्स से सीखकर संगीत कंपोज करके दिखाया।
२०१८ में ETH ज्यूरिख और ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने DYNAP-SE प्रोसेसर विकसित किया, जिसमें 4 कोर थे और प्रत्येक कोर में 256 एडेप्टिव एक्सपोनेंशियल इंटीग्रेट-एंड-फायर न्यूरॉन्स थे। २०२२ में MIT के शोधकर्ताओं ने एनालॉग डीप लर्निंग के लिए प्रोटॉन आधारित कृत्रिम सिनेप्स बनाए। २०१९ में यूरोपीय यूनियन ने न्यूरोमॉर्फिक क्वांटम कंप्यूटिंग के लिए फंडिंग प्रदान की, और २०२२ में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ने ऑर्गेनिक आर्टिफिशियल स्पाइकिंग न्यूरॉन विकसित किया। हाल ही में २०२४ में, तरल घोल में रासायनिक प्रणालियों द्वारा विभिन्न तरंग दैर्ध्य की आवाज को पहचानने में सफलता मिली है, जबकि फेरोइलेक्ट्रिक FETs (FeFETs) पर भी अति निम्न ऊर्जा खपत के लिए शोध हो रहे हैं।
| वर्ष | विकास / प्रोजेक्ट |
|---|---|
| २०१२ | HP लेब्स द्वारा मेमरिस्टर्स पर संशोधन |
| २०१४ | स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा 'न्युग्रिड' |
| २०१७ | Intel द्वारा 'लोइही' (Loihi) चिप जाहिर |
| २०१८ | ETH ज्यूरिख द्वारा DYNAP-SE प्रोसेसर |
जैविक प्रेरणा और स्पाइकिंग न्युरल नेटवर्क्स (SNN)
मानव मस्तिष्क में सूचना का आदान-प्रदान रासायनिक और बिजली के संकेतों द्वारा होता है। न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम्स में इस प्रक्रिया के लिए स्पाइकिंग न्युरल नेटवर्क्स (Spiking Neural Networks - SNN) का उपयोग किया जाता है। पारंपरिक आर्टिफिशियल न्युरल नेटवर्क्स (ANN) में प्रत्येक साइकिल पर सूचना ट्रांसमिट होती है, जबकि SNN में सूचना निश्चित समयावधि में आने वाले 'स्पाइक्स' (spikes: विद्युत आवेग) द्वारा भेजी जाती है।
SNN में प्रत्येक न्यूरॉन का एक आंतरिक 'मेम्ब्रेन पोटेंशियल' (membrane potential) होता है। जब आने वाले इनपुट्स के कारण यह पोटेंशियल निश्चित सीमा यानी 'थ्रेशोल्ड' (threshold) तक पहुंचता है, तभी न्यूरॉन फायर होता है और स्पाइक जनरेट करता है। इस मॉडल को लीकी इंटीग्रेट-एंड-फायर (Leaky Integrate-and-Fire - LIF) मॉडल कहा जाता है। जैविक दृष्टि से १९५२ में हॉजकिन-हक्सली (Hodgkin-Huxley) मॉडल प्रस्तुत हुआ था, उसके बाद फिट्झह्यूग-नागुमो (1961-1962) और हिंडमार्श-रोज़ (1984) मॉडल आए, लेकिन LIF गणना में सरल होने के कारण अधिक उपयोग किया जाता है।
जैविक अनुसंधान दर्शाते हैं कि मानव मस्तिष्क अद्भुत गति से प्रक्रिया करता है। उदाहरण के लिए, आँख की रेटिना से लेकर मस्तिष्क के टेम्पोरल लोब तक के स्तरों से गुजरकर छवि पहचानने का कार्य मानव न्यूरॉन प्रति स्तर मात्र १० मिलीसेकंड (ms) की समयावधि में कर लेता है। इतने कम समय में रेट-बेस्ड (rate-based) कोडिंग संभव नहीं है, इसलिए समय-आधारित टेम्पोरल कोडिंग (temporal coding) महत्वपूर्ण बनता है। SNN में सूचना को एनकोड करने के लिए विशिष्ट पद्धतियों का उपयोग किया जाता है, जैसे कि टेम्पोरल कोडिंग, रेट कोडिंग, डायरेक्ट कोडिंग, फेज कोडिंग और बस्ट कोडिंग।
SNN की एक मुख्य समस्या यह है कि स्पाइक-आधारित एक्टिवेशन डिफरेंशिएबल (differentiable) नहीं होता है, जिसके कारण पारंपरिक ग्रेडिएंट डिसेंट बैकप्रोपगेशन (backpropagation) का सीधा उपयोग नहीं किया जा सकता है। इस समस्या को हल करने के लिए शोधकर्ता लोकल लर्निंग रूल्स, सरोगेट ग्रेडिएंट (Surrogate Gradient - SG), और स्पाइक फ्रिक्वेंसी एडेप्टेशन (Spike Frequency Adaptation - SFA) का उपयोग करते हैं। SFA की मदद से हाई-परफॉर्मेंस डीप SNN प्रति न्यूरॉन मात्र 0.3 स्पाइक्स के साथ भी कुशलतापूर्वक काम कर सकते हैं।
हार्डवेयर आर्किटेक्चर, मेमरिस्टर्स और सेंसर्स
न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम्स के हार्डवेयर निर्माण के लिए ऑक्साइड-आधारित मेमरिस्टर्स (memristors), स्पिंट्रोनिक मेमोरी, थ्रेशोल्ड स्विच और विशेष ट्रांजिस्टर का उपयोग किया जाता है। न्यूरोमेमरिस्टिव सिस्टम्स न्यूरोप्लास्टिसिटी (neuroplasticity) को लागू करने के लिए मेमरिस्टर का उपयोग करते हैं। ये सिस्टम स्पीच रिकग्निशन, फेस रिकग्निशन और ऑब्जेक्ट रिकग्निशन में पारंपरिक डिजिटल लॉजिक गेट्स का स्थान ले सकते हैं।
हार्डवेयर के अलावा, न्यूरोमॉर्फिक तत्व सेंसर्स में भी उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, रेटिनोमॉर्फिक सेंसर या इवेंट कैमरा (event camera) मानव आँख की नकल करते हैं। सामान्य कैमरे की तरह लगातार पूरी फ्रेम रिकॉर्ड करने के बजाय, इवेंट कैमरा केवल उन्हीं पिक्सेल्स का डेटा प्रोसेस करता है जहाँ चमक (brightness) में बदलाव हुआ हो। इससे बिजली की खपत में भारी कमी आती है।
न्यूरोमॉर्फिक SNN को सिमुलेट करने के लिए विशिष्ट सॉफ्टवेयर टूल भी उपलब्ध हैं, जिनमें Brian (ENS द्वारा विकसित), GENESIS (Caltech), NEST, NEURON (Yale/Duke), RAVSim और snnTorch (PyTorch आधारित) शामिल हैं। हार्डवेयर प्लेटफॉर्म्स में यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर का SpiNNaker, IBM का TrueNorth, Intel का Loihi, और यूरोपीय BrainScaleS प्रमुख हैं।

नैतिक और कानूनी विवाद: मशीन चेतना और स्वामित्व के प्रश्न
जैसे-जैसे न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम मानव मस्तिष्क के अधिक करीब पहुँच रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ गंभीर नैतिक और कानूनी चर्चाएँ भी शुरू हो गई हैं। न्यूरोमॉर्फिक तकनीक से उन्नत AI सिस्टम में 'मशीन चेतना' (machine consciousness) उत्पन्न हो सकती है या नहीं, इस बारे में शोधकर्ता डेनियल लिम (Daniel Lim) द्वारा चिंता व्यक्त की गई है। यदि मशीन चेतना प्राप्त कर ले, तो क्या उन्हें नागरिक अधिकार या विशिष्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल दिए जाने चाहिए, यह प्रश्न उठता है।
कानूनी क्षेत्र में भी जटिल प्रश्न खड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, *Acohs Pty Ltd v. Ucorp Pty Ltd* जैसे कानूनी मामलों में यह विवाद हुआ था कि न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम द्वारा स्वतः जनरेट किए गए काम का स्वामित्व किसका माना जाए। यदि कोई सृजन मानव द्वारा नहीं किया गया हो, तो वर्तमान कानूनों के अनुसार उस पर कॉपीराइट का अधिकार मिल सकता है या नहीं, इस बारे में अभी वैश्विक स्तर पर स्पष्टता का अभाव है।


