ब्रह्मांड की धड़कन मापता यंत्र: LIGO और लेज़र इंटरफेरोमेट्री की अद्भुत कार्यप्रणाली
आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण तरंगों को पकड़ने के लिए मानवजाति द्वारा निर्मित सबसे संवेदनशील यंत्र LIGO कैसे काम करता है और इसके पीछे का विज्ञान क्या है, इसकी विस्तृत व्याख्या।

सितंबर 2015 में मानव इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना घटी थी। पृथ्वी से लगभग 1.3 अरब प्रकाश वर्ष दूर दो विशाल ब्लैक होल एक-दूसरे में विलीन हो गए और उसके कारण अंतरिक्ष के ताने-बाने में जो कंपन पैदा हुआ, वह पृथ्वी तक पहुँचा। इस कंपन यानी गुरुत्वाकर्षण तरंगों (gravitational waves) को पकड़ने के लिए वैज्ञानिकों ने दशकों तक मेहनत की थी। यह सफलता जिस यंत्र के द्वारा मिली उसका नाम है LIGO यानी लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्ज़र्वेटरी (Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory)। इससे पहले ब्रह्मांड के बारे में सभी जानकारी हमें प्रकाश या अन्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन के माध्यम से मिलती थी, लेकिन LIGO ने हमें ब्रह्मांड को 'सुनने' की एक नई क्षमता दी है।
LIGO भौतिकी का अब तक का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रयोग है। इसकी संरचना इतनी सटीक है कि यह प्रोटॉन के व्यास के दस-हजारवें हिस्से जितने अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तन को भी माप सकता है। इतनी सटीकता प्राप्त करने के लिए LIGO 'लेज़र इंटरफेरोमेट्री' (laser interferometry) नामक तकनीक का उपयोग करता है। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस तकनीक में प्रकाश की तरंगों को एक-दूसरे पर सुपरइम्पोज़ (superimpose) करके उनसे जानकारी प्राप्त की जाती है। जब दो तरंगें एक-दूसरे से मिलती हैं, तब उनके बीच की परस्पर क्रिया से जो पैटर्न बनता है उसे इंटरफेरेंस (interference) कहा जाता है।
| ऑब्जर्वेटरी | स्थान | आर्म की लंबाई (किमी) | संवेदनशीलता (Mpc) |
|---|---|---|---|
| LIGO | अमेरिका | 4 | 160-190 |
| Virgo | इटली | 3 | 80-115 |
| KAGRA | जापान | 3 | > 1 |
इंटरफेरोमेट्री का बुनियादी सिद्धांत
इंटरफेरोमेट्री को समझने के लिए हमें तरंगों के सुपरपोजिशन (superposition) के सिद्धांत को समझना होगा। जब समान आवृत्ति वाली दो तरंगें एक-दूसरे के साथ जुड़ती हैं, तब उनकी तीव्रता का आधार उनके बीच के फेज़ (phase) यानी चरण के अंतर पर होता है। यदि दो तरंगें एक-दूसरे के साथ सुसंगत (coherent) हों, यानी उनके शिखर एक-दूसरे पर आ रहे हों, तो इसे कंस्ट्रक्टिव इंटरफेरेंस (constructive interference) कहा जाता है और प्रकाश की तीव्रता बढ़ जाती है। इसके विपरीत, यदि एक तरंग का शिखर दूसरी तरंग के गर्त (trough) पर आता है, तो इसे डिस्ट्रक्टिव इंटरफेरेंस (destructive interference) कहा जाता है और प्रकाश एक-दूसरे को समाप्त कर देता है।
अधिकांश इंटरफेरोमीटर माइकलसन (Michelson) कॉन्फ़िगरेशन का उपयोग करते हैं। इसमें एक ही लेज़र स्रोत से आने वाले प्रकाश को बीम स्प्लिटर (beam splitter) के द्वारा दो भागों में विभाजित किया जाता है। ये दोनों बीम अलग-अलग रास्तों पर यात्रा करते हैं और अंत में फिर से एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं। यदि इन दोनों रास्तों की लंबाई में ज़रा भी परिवर्तन होता है, तो उनके फेज़ में अंतर आता है और डिटेक्टर पर दिखाई देने वाला प्रकाश का पैटर्न बदल जाता है। LIGO में इसी सिद्धांत का उपयोग करके गुरुत्वाकर्षण तरंगों के कारण अंतरिक्ष की लंबाई में होने वाले परिवर्तन को मापा जाता है।
- लेज़र स्प्लिटिंगएक लेज़र बीम को बीम स्प्लिटर द्वारा दो भागों में विभाजित करके अलग-अलग आर्म्स में भेजा जाता है।
- प्रकाश का परावर्तन4 किमी दूर स्थित दर्पणों से प्रकाश टकराकर वापस आता है, जो कई बार दोहराया जाता है।
- तरंगों का मिलनदोनों आर्म्स से वापस लौटे बीम फिर से मिलते हैं और एक-दूसरे को रद्द करते हैं।
- डिटेक्शनगुरुत्वाकर्षण तरंग आने पर लंबाई बदलती है और डिटेक्टर पर प्रकाश दिखाई देता है, जो सिग्नल के रूप में दर्ज होता है।
LIGO की अद्भुत संरचना
LIGO के दो मुख्य केंद्र अमेरिका में हैनफोर्ड और लिविंगस्टन में स्थित हैं। प्रत्येक केंद्र में 'L' आकार की दो विशाल पाइपें होती हैं, जिनकी लंबाई 4 किलोमीटर होती है। इन पाइपों के भीतर पूर्ण निर्वात (vacuum) रखा जाता है ताकि लेज़र बीम को कोई बाधा न आए। इन 4 किमी लंबे आर्म्स के छोर पर अत्यंत शुद्ध और भारी दर्पण लटकाए गए होते हैं। जब लेज़र बीम इन दर्पणों से टकराकर वापस लौटता है, तब तक वह हजारों किलोमीटर की यात्रा कर चुका होता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, LIGO के दर्पणों को इतना स्थिर रखा जाता है कि पृथ्वी की सामान्य कंपन या वाहनों का शोर भी उन्हें प्रभावित न करे। इसके लिए अत्यंत जटिल वाइब्रेशन आइसोलेशन सिस्टम का उपयोग किया जाता है। जब कोई गुरुत्वाकर्षण तरंग पृथ्वी से होकर गुजरती है, तो वह अंतरिक्ष को एक दिशा में खींचती है और दूसरी दिशा में सिकोड़ती है। इसके कारण LIGO के एक आर्म की लंबाई थोड़ी बढ़ती है और दूसरे की घटती है। यह अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तन लेज़र बीम के फेज़ में बदलाव लाता है, जिसे फोटोडिटेक्टर (photodetector) द्वारा पकड़ लिया जाता है।

कार्यपद्धति: स्टेप-बाय-स्टेप समझ
LIGO की कार्यपद्धति को समझने के लिए हमें लेज़र की यात्रा का अनुसरण करना पड़ता है। सबसे पहले, एक शक्तिशाली लेज़र स्रोत से प्रकाश छोड़ा जाता है। यह प्रकाश बीम स्प्लिटर पर पड़ता है, जो उसे दो समान भागों में विभाजित करके समकोण पर स्थित दो आर्म्स में भेजता है। प्रत्येक आर्म में दर्पणों के बीच प्रकाश कई बार टकराता है, जिससे उसकी प्रभावी यात्रा 1,120 किलोमीटर जितनी बढ़ जाती है। इससे यंत्र की संवेदनशीलता में कई गुना वृद्धि होती है।
- लेज़र का विभाजनएक शक्तिशाली लेज़र बीम स्प्लिटर द्वारा दो समान भागों में विभाजित होता है।
- यात्रा और परावर्तनदोनों लेज़र बीम 4 किमी लंबे आर्म्स में यात्रा करते हैं और दर्पणों से टकराकर वापस आते हैं।
- तरंगों की पहचानयदि गुरुत्वाकर्षण तरंग गुजरती है, तो आर्म्स की लंबाई में बदलाव होने से डिटेक्टर पर प्रकाश की चमक दिखाई देती है।
सामान्य स्थिति में, ये दोनों बीम जब वापस लौटते हैं तो वे इस तरह व्यवस्थित होते हैं कि एक-दूसरे को पूरी तरह नष्ट कर दें (destructive interference)। यानी डिटेक्टर पर कोई प्रकाश दिखाई नहीं देता। लेकिन जब गुरुत्वाकर्षण तरंग गुजरती है, तो आर्म्स की लंबाई में परिवर्तन होने के कारण यह संतुलन बिगड़ जाता है। परिणामस्वरूप, डिटेक्टर पर प्रकाश की चमक दिखाई देती है। इस चमक के पैटर्न से वैज्ञानिक यह निर्धारित कर सकते हैं कि ये तरंगें किस प्रकार की खगोलीय घटना से उत्पन्न हुई हैं।

आंकड़े और सटीकता की सीमाएं
LIGO की क्षमता आश्चर्यजनक है। यह 4 किमी लंबे आर्म में होने वाले परिवर्तन को 10^-18 मीटर की सटीकता से माप सकता है। तुलना के लिए कहें तो, यह माप एक परमाणु के न्यूक्लियस से भी हजारों गुना छोटा है। इतनी सटीकता प्राप्त करने के लिए अब तक करोड़ों डॉलर का खर्च किया गया है। शुरुआती LIGO प्रोजेक्ट में 2002 से 2010 के दौरान कोई तरंगें नहीं मिली थीं। इसके बाद 200 मिलियन डॉलर के खर्च से इसे अपग्रेड करके 'एडवांस्ड LIGO' (Advanced LIGO) बनाया गया, जिसकी संवेदनशीलता 4 गुना अधिक थी।
विकिपीडिया के डेटा के अनुसार, फरवरी 2026 तक LIGO ने कुल 4 ऑब्जर्वेशन रन पूरे किए हैं और 391 गुरुत्वाकर्षण तरंगों (gravitational waves) का पता लगाया है। चौथे रन (O4) के दौरान ही 250 संभावित घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें से 77 की पुष्टि हो चुकी है। इन प्रयोगों में न केवल अमेरिका, बल्कि इटली की Virgo और जापान की KAGRA ऑब्जर्वेटरी भी सहयोग करती हैं। इस वैश्विक नेटवर्क के कारण यह सटीक रूप से जाना जा सकता है कि तरंगें किस दिशा से आ रही हैं।
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| कुल संभावित घटनाएं (Candidates) | 250 |
| पुष्टि की गई घटनाएं | 77 |
| अंतिम विश्लेषण के तहत | 173 |

इतिहास और नोबेल पुरस्कार
गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1916 में अपने जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में की थी। हालाँकि, उस समय उन्हें मापने के लिए तकनीक उपलब्ध नहीं थी। 1960 के दशक में जोसेफ वेबर जैसे वैज्ञानिकों ने उन्हें खोजने के प्रयास शुरू किए। 1970 के दशक में रायनर वेइस (Rainer Weiss) ने लेजर इंटरफेरोमीटर का उपयोग करने का विचार प्रस्तुत किया। इसके बाद किप थॉर्न (Kip Thorne) और बैरी बैरिश (Barry Barish) के नेतृत्व में LIGO प्रोजेक्ट साकार हुआ।
LIGO प्रोजेक्ट को शुरुआत में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा था। 1994 में जब बैरी बैरिश डायरेक्टर बने, तब उन्होंने इस प्रोजेक्ट को नया जीवन दिया। 395 मिलियन डॉलर के बजट के साथ यह नेशनल साइंस फाउंडेशन (NSF) का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बना। 2015 में मिली पहली सफलता के बाद, 2017 में रायनर वेइस, किप थॉर्न और बैरी बैरिश को भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस खोज ने साबित कर दिया कि विज्ञान में धैर्य और सटीकता का कितना महत्व है।
भारत और सामान्य लोगों के लिए महत्व
LIGO की सफलता केवल वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है। इस तकनीक के विकास से अत्यंत सटीक लेजर, वैक्यूम सिस्टम और वाइब्रेशन कंट्रोल सिस्टम में क्रांति आई है। भारत भी अब इस क्षेत्र में बड़ा योगदान देने जा रहा है। महाराष्ट्र के हिंगोली में 'LIGO-India' प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, जो वैश्विक नेटवर्क को और अधिक मजबूत बनाएगा। इससे भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को दुनिया के सबसे उन्नत विज्ञान के साथ जुड़ने का अवसर मिलेगा।
सामान्य लोगों के लिए यह खोज ब्रह्मांड को देखने की एक नई खिड़की है। जिस तरह एक्स-रे के माध्यम से हम शरीर के अंदर देख सकते हैं, उसी तरह गुरुत्वाकर्षण तरंगों के माध्यम से हम ब्लैक होल और न्यूट्रॉन स्टार्स जैसी रहस्यमय वस्तुओं के अंदर की प्रक्रियाओं को जान सकते हैं। यह तकनीक भविष्य में हमें बिग बैंग (Big Bang) यानी ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय की तरंगों को खोजने में भी मदद कर सकती है। विज्ञान की यह यात्रा अभी शुरू ही हुई है, और LIGO इसमें आधारशिला साबित हुआ है।


