क्वांटम डॉट्स: परमाणु जैसे कण जो डिस्प्ले तकनीक की दुनिया बदल रहे हैं
नैनो-तकनीक की मदद से बने ये सूक्ष्म क्रिस्टल टीवी और स्मार्टफोन की स्क्रीन को अधिक चमकीला और रंगीन बना रहे हैं।

आज के समय में जब हम हाई-डिफ़िनिशन टीवी या स्मार्टफोन की स्क्रीन देखते हैं, तब हमें मिलने वाले जीवंत रंगों के पीछे विज्ञान की एक अद्भुत खोज काम कर रही है: क्वांटम डॉट्स (quantum dots)। क्वांटम डॉट्स अर्धचालक पदार्थ के ऐसे अति सूक्ष्म कण हैं, जिनका आकार मात्र कुछ नेनोमीटर (nanometer) होता है। एक नेनोमीटर यानी मीटर का अरबोंवां भाग। ये कण इतने छोटे हैं कि उनके अंदर के इलेक्ट्रॉन क्वांटम मैकेनिक्स के नियमों के अनुसार व्यवहार करते हैं, जो बड़े पदार्थों में देखने को नहीं मिलता है। यही कारण है कि उन्हें 'कृत्रिम अणुओं' के रूप में भी जाना जाता है। जब इन कणों पर प्रकाश डाला जाता है या उनमें से बिजली गुजारी जाती है, तब वे एक निश्चित रंग का प्रकाश फेंकते हैं, जिसका उपयोग अत्याधुनिक डिस्प्ले बनाने में किया जाता है।
क्वांटम डॉट्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनका रंग उनके आकार पर आधारित होता है। सामान्य तौर पर पदार्थ का रंग उसकी रासायनिक संरचना से तय होता है, लेकिन क्वांटम डॉट्स में इसे केवल उसके आकार से बदला जा सकता है। Wikipedia की रिपोर्ट के अनुसार, यदि क्वांटम डॉट का आकार ५ से ६ नेनोमीटर जितना बड़ा हो, तो वह लाल या नारंगी रंग का प्रकाश उत्सर्जित करता है। यदि उसका आकार २ से ३ नेनोमीटर जितना छोटा हो, तो वह नीला या हरा प्रकाश देता है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए 'पार्टिकल इन अ बॉक्स' (particle in a box) नामक मॉडल का उपयोग किया जाता है। जैसे डब्बा छोटा, वैसे ही उसके अंदर मौजूद कण की ऊर्जा अधिक, और अधिक ऊर्जा यानी छोटी तरंगदैर्ध्य का नीला प्रकाश। इस सटीकता के कारण ही क्वांटम डॉट्स डिस्प्ले तकनीक में क्रांति ला रहे हैं।
| आकार (नैनोमीटर) | तरंग दैर्ध्य | उत्सर्जित रंग |
|---|---|---|
| २ से ३ nm | छोटी | नीला / हरा |
| ५ से ६ nm | लंबी | नारंगी / लाल |
ये कण कैसे काम करते हैं, यह समझने के लिए इसकी आंतरिक संरचना को देखना आवश्यक है। जब क्वांटम डॉट पर पराबैंगनी (UV) प्रकाश पड़ता है, तब उसके अंदर का इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर निचली ऊर्जा की सतह यानी वैलेंस बैंड (valence band) से ऊपरी सतह यानी कंडक्शन बैंड (conduction band) में छलांग लगाता है। इन दोनों सतहों के बीच की दूरी को बैंड गैप (band gap) कहा जाता है। जब यह इलेक्ट्रॉन वापस अपनी मूल जगह पर आता है, तब वह अतिरिक्त ऊर्जा को प्रकाश के रूप में मुक्त करता है। इस प्रक्रिया को फोटोलुमिनिसेंस (photoluminescence) कहा जाता है। इस उत्सर्जित प्रकाश का रंग बैंड गैप के आकार पर निर्भर करता है, जिसे क्वांटम डॉट के आकार द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

क्वांटम डॉट्स की बनावट के लिए 'कोर-शेल' (core-shell) ढाँचा सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बीच में एक मुख्य भाग (core) होता है और इसके आस-पास दूसरे अर्धचालक पदार्थ की परत (shell) चढ़ाई जाती है। उदाहरण के लिए, कैडमियम सेलेनाइड (CdSe) के कोर पर जिंक सल्फाइड (ZnS) की परत चढ़ाई जाती है। यह परत चढ़ाने का मुख्य कारण यह है कि यह सतह की कमियों को दूर करती है और प्रकाश उत्सर्जन की क्षमता में वृद्धि करती है। अगर यह परत न हो, तो इलेक्ट्रॉन प्रकाश देने के बजाय गर्मी के रूप में ऊर्जा खो सकते हैं। शोधों के अनुसार, डबल-शेल सिस्टम का उपयोग करने से प्रकाश की कार्यक्षमता में 70% तक की वृद्धि हो सकती है। इन कणों को स्थिर रखने के लिए उनकी सतह पर लिगांड (ligand) नामक कार्बनिक अणु भी लगाए जाते हैं, जो उन्हें एक-दूसरे के साथ चिपकने से रोकते हैं।
इन अद्भुत कणों को बनाने की मुख्य विधि कोलाइडल सिंथेसिस (colloidal synthesis) है। यह एक प्रकार की रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें घोल को ऊँचे तापमान पर गर्म किया जाता है। तापमान इतना होना चाहिए कि अणु व्यवस्थित हो सकें लेकिन क्रिस्टल बहुत बड़े न हो जाएँ। इस प्रक्रिया में 'फोकसिंग' (focusing) नाम का चरण आता है, जहाँ सभी कण लगभग एक जैसे आकार के बनते हैं। Wikipedia के अनुसार, 10 नैनोमीटर के व्यास वाले लगभग 30 लाख क्वांटम डॉट्स को यदि एक कतार में व्यवस्थित किया जाए, तो वह इंसान के अंगूठे की चौड़ाई जितनी जगह घेरते हैं। इतने सूक्ष्म स्तर पर काम करना नैनो-टेक्नोलॉजी की एक बड़ी उपलब्धि है।
- गर्म करनारासायनिक घोल को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है ताकि पूर्ववर्ती पदार्थ छूट जाएं।
- न्यूक्लिएशनछूट गए अणु एकत्र होकर छोटे क्रिस्टल बनाने की शुरुआत करते हैं।
- फोकसिंग ग्रोथमोनोमर की उच्च सांद्रता में छोटे कण तेजी से बढ़ते हैं, ताकि सभी कण समान आकार के बनें।
- डिफोकसिंगसमय के साथ सांद्रता घटने पर कणों के आकार में अंतर आने लगता है, जिसे उचित समय पर रोकना पड़ता है।

वर्तमान समय में क्वांटम डॉट्स का सबसे बड़ा उपयोग एलसीडी (LCD) टीवी में हो रहा है, जिसे कंपनियाँ 'QLED' के रूप में पहचान देती हैं। सामान्य एलसीडी टीवी में पीछे से आने वाला सफेद प्रकाश कलर फिल्टर से गुजरता है, जिसमें काफी ऊर्जा बर्बाद होती है। QLED टीवी में नीले रंग की एलईडी (LED) बैकलाइट का उपयोग होता है और उसके सामने क्वांटम डॉट एनहांसमेंट फिल्म (QDEF) रखी जाती है। यह फिल्म नीले प्रकाश के कुछ हिस्से को शुद्ध लाल और हरे रंग में बदल देती है। इस तरह मिलने वाले लाल, नीले और हरे रंग अत्यंत शुद्ध होते हैं, जिसके कारण टीवी पर दिखने वाले रंग अधिक प्राकृतिक और चमकीले लगते हैं। सैमसंग (Samsung), सोनी (Sony) और टीसीएल (TCL) जैसी कंपनियाँ इस तकनीक का व्यापक उपयोग कर रही हैं।
डिस्प्ले टेक्नोलॉजी में दूसरा बड़ा मोड़ QD-OLED के रूप में आया है। ओलेड (OLED) डिस्प्ले अपने आप प्रकाश पैदा करने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उनमें लाल और हरे रंग की शुद्धता में सीमा होती है। QD-OLED में नीले रंग की ओलेड पैनल का उपयोग किया जाता है और उसके ऊपर क्वांटम डॉट कलर कन्वर्टर (QDCC) लगाया जाता है। इस टेक्नोलॉजी से बने डिस्प्ले Rec. 2020 नामक कलर स्टैंडर्ड के 90% तक के रंग दिखा सकते हैं, जबकि सामान्य टीवी केवल 70-75% तक ही पहुँच सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि आप टीवी पर ऐसे रंग देख सकते हैं जो पहले कभी संभव नहीं थे।
भविष्य की बात करें तो, वैज्ञानिक अब 'इलेक्ट्रो-एमिसिव' क्वांटम डॉट्स (QDEL) पर काम कर रहे हैं। अभी के टीवी में क्वांटम डॉट्स को प्रकाश देने के लिए दूसरी लाइट की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन QDEL में हर पिक्सल बिजली मिलते ही खुद प्रकाश पैदा करेगा। यह टेक्नोलॉजी ओलेड जैसी ही होगी पर इसमें कार्बनिक पदार्थों के बजाय अकार्बनिक क्वांटम डॉट्स होंगे, जो लंबा समय चलेंगे और अधिक चमकदार होंगे। हालांकि, हाल में नीले रंग के क्वांटम डॉट्स की आयु कम होने के कारण यह टेक्नोलॉजी अभी प्रयोगशाला में ही है। Nanosys के अंदाज़ के मुताबिक, 2029 तक ऐसे सच्चे QLED डिस्प्ले बाज़ार में आ सकते हैं।

भारत जैसे देशों के लिए यह टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण है क्योंकि क्वांटम डॉट्स बनाने की प्रक्रिया इंकजेट प्रिंटिंग (inkjet printing) द्वारा भी संभव है। यह पद्धति पारंपरिक सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन की तुलना में सस्ती और तेज़ हो सकती है। केवल डिस्प्ले ही नहीं, बल्कि सोलर सेल (solar cells) में भी क्वांटम डॉट्स का उपयोग किया जा रहा है। यह सूर्यप्रकाश के अलग-अलग रंगों को सोखकर बिजली पैदा करने की क्षमता बढ़ाता है। मेडिकल इमेजिंग में भी इन कणों का उपयोग कैंसर के सेल्स को पहचानने के लिए किया जाता है, क्योंकि वे शरीर में सटीक जगह पर जाकर चमकदार तरीके से चमक सकते हैं।

हालांकि, क्वांटम डॉट्स के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। कई क्वांटम डॉट्स कैडमियम जैसे विषैले पदार्थों से बनते हैं, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। इसलिए अब इंडियम फॉस्फाइड (InP) जैसे कैडमियम-मुक्त पदार्थों पर शोध हो रहा है। साथ ही, बाज़ार में 'QLED' के नाम से बिकने वाले कई टीवी असल में केवल पुरानी एलसीडी टेक्नोलॉजी में एक फिल्म जोड़कर बनाए जाते हैं, जो ग्राहकों को गुमराह कर सकते हैं। हाल ही में जर्मनी की एक अदालत ने टीसीएल (TCL) के खिलाफ ऐसे ही एक मामले में फैसला दिया था। फिर भी, विज्ञान की दृष्टि से देखें तो, क्वांटम डॉट्स नैनो-स्केल पर मानवता की एक बड़ी जीत है, जो हमारे देखने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देगी।


