अदृश्य जगत का जीवंत दर्शन: स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की अद्भुत तकनीक और उसकी कार्यप्रणाली
प्रकाश की किरणों के बजाय इलेक्ट्रॉनों का उपयोग करके नैनोमीटर स्तर के विवरण देखने की क्षमता रखने वाला SEM विज्ञान जगत का एक शक्तिशाली उपकरण है।

मानव आंख की देखने की एक सीमा है। हम अपने आसपास की दुनिया को प्रकाश की किरणों के माध्यम से देखते हैं, लेकिन जब बात अति सूक्ष्म कणों की आती है तो सामान्य प्रकाश की तरंगें छोटी पड़ जाती हैं। इस सीमा को पार करने के लिए वैज्ञानिकों ने स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (Scanning Electron Microscope - SEM) नामक अद्भुत उपकरण विकसित किया है। यह माइक्रोस्कोप प्रकाश के बजाय इलेक्ट्रॉन के केंद्रित बीम (beam) का उपयोग करके नमूने की सतह को स्कैन करता है। इस प्रक्रिया द्वारा जो छवियां प्राप्त होती हैं, वे इतनी विस्तृत होती हैं कि उनमें पदार्थ की सतह की बनावट और उसकी संरचना के बारे में अभूतपूर्व जानकारी मिलती है।
स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का इतिहास काफी दिलचस्प है। मैक्स नॉल (Max Knoll) नामक वैज्ञानिक ने सबसे पहले इलेक्ट्रॉन बीम स्कैनर द्वारा फोटोग्राफ प्राप्त किया था, लेकिन 1937 में मैनफ्रेड वॉन आर्डेन (Manfred von Ardenne) ने अत्यंत छोटे रास्टर (raster) स्कैन का उपयोग करके उच्च रिज़ॉल्यूशन वाला माइक्रोस्कोप बनाया था। इसी वर्ष कनाडा में सेसिल ई. हॉल (Cecil E. Hall) द्वारा भी पहला एमिशन माइक्रोस्कोप तैयार किया गया था। आर्डेन का मुख्य उद्देश्य ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (TEM) की सीमाओं को दूर करना था। अंततः, 1965 में कैम्ब्रिज साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट कंपनी द्वारा 'स्टीरियोस्कैन' (Stereoscan) नाम से पहला व्यावसायिक मॉडल बाजार में उतारा गया, जिसने विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी।
| वर्ष | घटना/व्यक्ति |
|---|---|
| 1937 | मैनफ्रेड वॉन आर्डेन द्वारा उच्च रिजोल्यूशन माइक्रोस्कोप की खोज |
| 1937 | सेसिल ई. हॉल द्वारा प्रथम एमिशन माइक्रोस्कोप का निर्माण |
| 1965 | कैम्ब्रिज साइंटिफिक द्वारा प्रथम व्यावसायिक 'स्टीरियोस्कैन' मॉडल |
- इलेक्ट्रॉन उत्सर्जनइलेक्ट्रॉन गन द्वारा हाई-एनर्जी इलेक्ट्रॉन का बीम पैदा किया जाता है।
- फोकसिंगइलेक्ट्रॉन लेंस इस बीम को अत्यंत बारीक बिंदु पर केंद्रित करते हैं।
- स्कैनिंगडिफ्लेक्शन कॉइल्स इस बीम को नमूने की सतह पर रास्टर पैटर्न में घुमाते हैं।
- सिग्नल उत्सर्जनइलेक्ट्रॉन और नमूने के परमाणुओं के बीच की टक्कर से सेकेंडरी और बैक-स्कैटर इलेक्ट्रॉन छूटते हैं।
- डिटेक्शन और प्रोसेसिंगडिटेक्टर इन इलेक्ट्रॉनों को पकड़कर उसे इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलते हैं, जिससे कंप्यूटर पर छवि बनती है।
SEM कैसे काम करता है, यह समझने के लिए इसके आंतरिक भागों को समझना आवश्यक है। इस माइक्रोस्कोप में मुख्य रूप से एक इलेक्ट्रॉन गन (electron gun), इलेक्ट्रॉन लेंस (electron lenses) और वैक्यूम पंप (vacuum pumps) होते हैं। इलेक्ट्रॉन गन द्वारा 0.1 से 30 किलो इलेक्ट्रॉन वोल्ट (keV) की ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पैदा किए जाते हैं। इन इलेक्ट्रॉनों को इलेक्ट्रॉन लेंस द्वारा केंद्रित करके नमूने पर 10 नैनोमीटर से भी छोटी जगह पर फेंका जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान डिफ्लेक्शन कॉइल्स (deflection coils) इलेक्ट्रॉन बीम को नमूने पर रास्टर स्कैन (raster scan) पद्धति से घुमाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुराने टेलीविजन में चित्र बनता था।
जब ये हाई-एनर्जी इलेक्ट्रॉन नमूने की सतह से टकराते हैं, तो विभिन्न प्रकार के सिग्नल उत्पन्न होते हैं। इन सिग्नलों में सेकेंडरी इलेक्ट्रॉन (secondary electrons - SE), बैक-स्कैटर इलेक्ट्रॉन (back-scattered electrons - BSE), एक्स-रे (X-rays) और प्रकाश शामिल हैं। इन सिग्नलों को पकड़ने के लिए अलग-अलग डिटेक्टरों (detectors) का उपयोग किया जाता है। इन डिटेक्टरों द्वारा प्राप्त जानकारी को डिजिटल रूप में परिवर्तित करके कंप्यूटर स्क्रीन पर छवि तैयार की जाती है। SEM की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पदार्थ की सतह को त्रि-आयामी (3D) रूप देता है, जिससे उसकी गहराई और बनावट को समझना आसान हो जाता है।
सेकेंडरी इलेक्ट्रॉन (SE) इमेजिंग SEM में सबसे सामान्य पद्धति है। ये इलेक्ट्रॉन 50 इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) से कम ऊर्जा रखते हैं और ये नमूने की सतह के ऊपर के कुछ नैनोमीटर भाग से ही बाहर आते हैं। इस कारण यह सतह की टोपोग्राफी (topography), यानी सतह के ऊंचे-नीचे भागों की अत्यंत सटीक जानकारी देता है। इस सिग्नल को पकड़ने के लिए एवरहार्ट-थॉर्नली (Everhart–Thornley) डिटेक्टर का उपयोग किया जाता है। इस डिटेक्टर की खोज ने SEM की कार्यक्षमता में बड़ा इजाफा किया है, क्योंकि यह कम शोर (noise) के साथ उच्च गुणवत्ता वाले सिग्नल प्राप्त कर सकता है।
दूसरी ओर, बैक-स्कैटर इलेक्ट्रॉन (BSE) वे इलेक्ट्रॉन हैं जो नमूने के परमाणुओं से टकराकर वापस लौटते हैं। उनकी ऊर्जा सेकेंडरी इलेक्ट्रॉन से काफी अधिक होती है, इसलिए वे नमूने की थोड़ी अधिक गहराई से बाहर आते हैं। BSE सिग्नल की तीव्रता नमूने में मौजूद तत्वों के परमाणु क्रमांक (atomic number) पर निर्भर करती है। जिन तत्वों का परमाणु क्रमांक अधिक होता है, वे अधिक इलेक्ट्रॉन वापस फेंकते हैं और इमेज में अधिक चमकीले दिखाई देते हैं। इस पद्धति के द्वारा वैज्ञानिक नमूने में कौन-से अलग-अलग तत्व मौजूद हैं, उनका वितरण जान सकते हैं, हालांकि इससे तत्वों की पहचान सीधे तौर पर नहीं हो सकती।

SEM की क्षमता की बात करें तो, यह 10 गुने से लेकर 30,00,000 (तीस लाख) गुने तक का मैग्निफिकेशन (magnification) दे सकता है। यह आंकड़ा सामान्य प्रकाश माइक्रोस्कोप से लगभग 250 गुना अधिक है। इतनी उच्च क्षमता के कारण ही हम वायरस, बैक्टीरिया और पदार्थ की अणु-परमाणु स्तर की संरचना देख सकते हैं। नेचर (Nature) पत्रिका और विभिन्न शोध पत्रों के अनुसार, आधुनिक SEM 1 नैनोमीटर से भी कम का रेजोल्यूशन प्राप्त कर सकते हैं। रेजोल्यूशन यानी दो अत्यंत पास स्थित बिंदुओं को अलग-अलग देखने की क्षमता। जितना रेजोल्यूशन कम, उतनी छवि अधिक स्पष्ट।
| विवरण | सेकेंडरी इलेक्ट्रॉन (SE) | बैक-स्कैटर इलेक्ट्रॉन (BSE) |
|---|---|---|
| ऊर्जा स्तर | कम (50 eV से कम) | ज्यादा (बीम जितनी ही) |
| उत्पत्ति का स्थान | सतह के ऊपर के कुछ नैनोमीटर | नमूने की अधिक गहराई से |
| मुख्य उपयोग | सतह की रचना (Topography) | तत्वों का वितरण (Composition) |
| रिजोल्यूशन | अत्यंत उच्च (1 nm से कम) | SE से कम |
नमूने की तैयारी (sample preparation) SEM प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। SEM के अंदर का चैंबर उच्च निर्वात (high vacuum) वाला होता है, क्योंकि यदि वहां हवा हो तो इलेक्ट्रॉन हवा में मौजूद परमाणुओं से टकराकर बिखर जाएंगे। इस निर्वात में नमूना टिके रहना चाहिए। लकड़ी, हड्डियों या सूखे कीटों जैसे कठोर पदार्थों को सीधे देखा जा सकता है, लेकिन जीवित कोशिकाओं या नरम ऊतकों के लिए विशेष रासायनिक प्रक्रिया करनी पड़ती है। जैविक नमूनों को ग्लूटारेल्डिहाइड (glutaraldehyde) जैसे रसायनों से फिक्स (fixation) किया जाता है और उसके बाद उनका निर्जलीकरण (dehydration) किया जाता है।
निर्जलीकरण (dehydration) के दौरान पानी की जगह इथेनॉल या एसीटोन का उपयोग किया जाता है। यदि नमूने को सीधे हवा में सुखाया जाए, तो उसकी सतह सिकुड़ जाती है और आकार बिगड़ जाता है। इस समस्या से बचने के लिए 'क्रिटिकल पॉइंट ड्राइंग' (critical point drying) पद्धति का उपयोग किया जाता है, जिसमें तरल कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके नमूने को इस तरह सुखाया जाता है कि उसकी आंतरिक संरचना को नुकसान न पहुंचे। इसके अलावा, यदि नमूना विद्युत का कुचालक है, तो उस पर सोने (gold) या प्लैटिनम जैसी धातु की अत्यंत पतली परत चढ़ाई जाती है, जिसे स्पटर कोटिंग (sputter coating) कहा जाता है। यह परत चढ़ाने से नमूने पर विद्युत आवेश (charge) जमा नहीं होता और छवि स्पष्ट प्राप्त होती है।


गोल्डस्टीन और अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि नमूना चालक नहीं है तो वह इलेक्ट्रॉन के लिए दर्पण की तरह व्यवहार करता है, जिसे 'चार्जिंग' (charging) कहा जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए ही धातु की कोटिंग अनिवार्य है। कभी-कभी जैविक नमूनों को ऑस्मियम (osmium) के द्वारा भी चालक बनाया जाता है। आधुनिक तकनीक में अब क्रायो-एसईएम (Cryo-SEM) का भी उपयोग होता है, जिसमें नमूने को अत्यंत कम तापमान पर जमा दिया जाता है। यह पद्धति वसा (fats) या बर्फ जैसे तापमान के प्रति संवेदनशील पदार्थों के अध्ययन के लिए वरदान साबित हुई है।
SEM केवल चित्र लेने तक ही सीमित नहीं है। इसमें एनर्जी डिस्पर्सिव एक्स-रे स्पेक्ट्रोस्कोपी (EDS) जैसी सुविधाएं जोड़ी जा सकती हैं। जब इलेक्ट्रॉन बीम नमूने के परमाणु के भीतरी भाग से इलेक्ट्रॉनों को हटाती है, तब एक्स-रे उत्सर्जित होते हैं। इन एक्स-रे की तरंग दैर्ध्य को मापकर यह जाना जा सकता है कि नमूने में कौन से तत्व (जैसे कि लोहा, सिलिकॉन, कार्बन) कितनी मात्रा में मौजूद हैं। इस प्रकार SEM एक शक्तिशाली विश्लेषणात्मक उपकरण (analytical tool) बन जाता है, जिसका उपयोग फॉरेंसिक साइंस, मटेरियल साइंस और सेमीकंडक्टर उद्योग में व्यापक रूप से होता है।

भारत जैसे देशों में भी नैनोटेक्नोलॉजी और फार्मास्युटिकल अनुसंधान में SEM का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। नई दवाओं के कणों का आकार मापने के लिए या नई सामग्री के गुणों की जांच करने के लिए यह तकनीक अनिवार्य है। आम लोगों के लिए शायद यह एक जटिल मशीन लगे, लेकिन हम जो स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं, उसके अंदर की माइक्रोचिप्स की डिजाइन और गुणवत्ता की जांच करने में SEM का बड़ा योगदान है। यह हमें प्रकृति के ऐसे अजूबे दिखाता है जिन्हें हम कभी नग्न आंखों से नहीं देख पाते।

अंत में, SEM तकनीक अभी भी विकसित हो रही है। नए फील्ड एमिशन सोर्स (field emission sources) के कारण अब अधिक चमकदार और स्थिर इलेक्ट्रॉन बीम प्राप्त की जा सकती है, जो लंबे समय तक काम कर सकती है। जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ेगा, हम नैनोमीटर की इस अदृश्य दुनिया को और अधिक गहराई से और अधिक स्पष्टता के साथ देख पाएंगे। SEM ने यह साबित कर दिया है कि यदि देखने का नज़रिया बदल जाए (प्रकाश के बजाय इलेक्ट्रॉन), तो पूरी दुनिया बदल जाती है।


