जीव विज्ञान की 'मॉलिक्यूलर कैंची': CRISPR-Cas9 द्वारा आनुवंशिक रोगों का उपचार और भविष्य की क्रांति
बैक्टीरिया की रोग प्रतिरोधक क्षमता से जन्मी यह तकनीक अब मनुष्य के डीएनए में बदलाव करके असाध्य रोगों को ठीक करने में सक्षम बन रही है।

जीवविज्ञान के इतिहास में कुछ ऐसी खोजें होती हैं जो पूरी मानवता का भविष्य बदलने की क्षमता रखती हैं। CRISPR-Cas9 (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पालिंड्रोमिक रिपीट्स) ऐसी ही एक क्रांतिकारी तकनीक है, जिसे आम भाषा में 'मॉलिक्यूलर कैंची' के रूप में जाना जाता है। यह तकनीक वैज्ञानिकों को जीवित जीवों के डीएनए (DNA) में अत्यंत सटीकतापूर्वक फेरबदल करने की शक्ति देती है। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस खोज के लिए वर्ष 2020 में इमेनुअल शार्पेंटियर और जेनिफर डौडना को रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।
CRISPR मूल रूप से प्रकृति में पाई जाने वाली एक संरक्षण प्रणाली है। यह बैक्टीरिया और आर्किया (archaea) जैसे आदिकोषकेंद्रकीय जीवों के जीनोम में पाई जाने वाली डीएनए श्रृंखलाओं का एक परिवार है। जब कोई वायरस बैक्टीरिया पर हमला करता है, तो बैक्टीरिया उस वायरस के डीएनए का एक छोटा टुकड़ा अपनी इस CRISPR श्रृंखला में सहेज लेता है। यह प्रक्रिया बैक्टीरिया को भविष्य में उसी प्रकार के वायरस के खिलाफ लड़ने के लिए एक प्रकार की 'याददाश्त' या अधिग्रहित रोग प्रतिरोधक शक्ति (acquired immunity) प्रदान करती है। स्रोत 1 के अनुसार, लगभग 50% बैक्टीरिया और 90% आर्किया में यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच पाया जाता है।
- स्पेसर्स एक्विजिशनजब वायरस हमला करता है, तो बैक्टीरिया उसके डीएनए का टुकड़ा (स्पेसर्स) प्राप्त करके अपने जीनोम में सहेजता है।
- आरएनए प्रोसेसिंगसहेजे गए डीएनए से प्री-crRNA बनता है, जो छोटे मैच्योर crRNA टुकड़ों में विभाजित होता है।
- इंटरफेरेंसभविष्य में जब वही वायरस फिर हमला करे, तो Cas9 और crRNA मिलकर वायरस के डीएनए को काट देते हैं।
इस प्रणाली का इतिहास बहुत दिलचस्प है। 1987 में इचिनो और उनके साथियों ने सबसे पहले E. coli बैक्टीरिया में इन असाधारण पुनरावृत्ति वाली श्रृंखलाओं को देखा था। हालांकि, उस समय इसका कार्य अज्ञात था। 2001 में स्पेनिश माइक्रोबायोलॉजिस्ट फ्रांसिस्को मोजिका ने इन श्रृंखलाओं को 'CRISPR' नाम दिया था। 2005 में बेरेन्गो ने खोजा कि ये श्रृंखलाएं वायरस के खिलाफ प्रतिरोध करने में मदद करती हैं। 2012 में डौडना और शार्पेंटियर ने इस प्राकृतिक प्रणाली को प्रयोगशाला में एक सरल उपकरण के रूप में विकसित किया, जिसका उपयोग किसी भी डीएनए को काटने के लिए किया जा सकता है।
CRISPR-Cas9 कैसे कार्य करता है, यह समझने के लिए हमें इसके दो मुख्य भागों को समझना होगा। पहला है Cas9 (केस-9), जो एक एंडोन्यूक्लीज (endonuclease) एंजाइम है। यह डीएनए को काटने का काम करता है। दूसरा भाग है गाइड आरएनए (guide RNA), जो Cas9 को डीएनए के विशिष्ट हिस्से तक ले जाने का काम करता है। यह प्रक्रिया एक जीपीएस (GPS) सिस्टम जैसी है, जहाँ आरएनए लोकेशन तय करता है और Cas9 वहाँ जाकर कट लगाता है।
जब Cas9 और गाइड आरएनए के मिश्रण को कोशिका में डाला जाता है, तो यह डीएनए की लंबी श्रृंखला पर घूमता है। Cas9 विशेष रूप से PAM (प्रोटोस्पेसर एडजेसेंट मोटिफ) नामक छोटे संकेत को खोजता है। स्ट्रेप्टोकोकस पायोजीनिस (Streptococcus pyogenes) बैक्टीरिया से प्राप्त Cas9 के लिए यह संकेत 'NGG' है। एक बार PAM मिल जाने के बाद, Cas9 डीएनए को खोलता है और यदि गाइड आरएनए के साथ डीएनए का क्रम मैच होता है, तो वह वहाँ डबल-स्ट्रैंड ब्रेक (double-strand break) यानी डीएनए की दोनों पट्टियों को काट देता है।
ટકાવારી (%)
डीएनए में काट लगाने के बाद, कोशिका की अपनी सुधार प्रणाली (repair mechanism) सक्रिय हो जाती है। यहाँ दो मुख्य रास्ते हैं: प्रथम है नॉन-होमोलोगस एंड जॉइनिंग (NHEJ), जिसमें कोशिका कटे हुए सिरों को सीधा जोड़ देती है। इस प्रक्रिया में अक्सर छोटी भूलें होती हैं, जिससे वह जीन निष्क्रिय हो जाता है। दूसरा रास्ता है होमोलोगस रिकॉम्बिनेशन (HDR), जिसमें यदि वैज्ञानिक डीएनए का एक नया टुकड़ा साथ भेजें, तो कोशिका उस नए टुकड़े को कटे हुए भाग में जोड़ देती है। इस तरह हम ख़ामीयुक्त जीन को सुधार सकते हैं या नया जीन जोड़ सकते हैं।
| घटक | सामान्य आकार (bp) | सीमा (bp) |
|---|---|---|
| रिपीट्स (Repeats) | २८-३७ | २३-५५ |
| स्पेसर्स (Spacers) | ३२-३८ | २१-७२ |
| गाइड आरएनए (Spacer region) | २० | २० |
CRISPR तकनीक के आँकड़े उसकी सटीकता और क्षमता दर्शाते हैं। CRISPR रिपीट्स सामान्यतः २८ से ३७ बेस पेयर (base pairs) लंबे होते हैं, जबकि स्पेसर्स (spacers) २१ से ७२ बेस पेयर के हो सकते हैं। Cas9 प्रोटीन का वज़न आख़िरी १६० किलोडाल्टन (kilodalton) होता है। २०१३ में फेंग झांग और जॉर्ज चर्च की टीम ने सबसे पहले मानव कोशिकाओं में इस तकनीक का सफल उपयोग किया था। २०१५ में चीनी वैज्ञानिकों ने मानव भ्रूण (embryo) पर भी प्रयोग किए थे, जिसने नैतिक चर्चाएँ जगाई थीं।
- डिज़ाइनिंगटारगेट डीएनए के अनुरूप गाइड आरएनए तैयार किया जाता है।
- क्लीवेजCas9 एंजाइम निर्धारित स्थान पर डीएनए की दोनों पट्टियों में काट लगाता है।
- रिपेयरकोशिका कटे हुए हिस्से को जोड़ती है, जिसमें नया जीन जोड़ा जा सकता है या त्रुटिपूर्ण हिस्सा हटाया जा सकता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फ़ायदा जेनेटिक रोगों की उपचार में है। स्रोत २ के अनुसार, शोधकर्ताओं ने हेपेटाइटिस B (Hepatitis B) और HIV जैसे वायरस के डीएनए को काटकर संक्रमण घटाने में सफलता पाई है। इसके अलावा, सिकल सेल एनीमिया, कैंसर और अंधापन लाने वाले जीन रोगों के लिए भी клиниकल ट्रायल्स चल रहे हैं। खेतीबाड़ी में भी CRISPR का उपयोग करके अधिक उत्पादन देने वाली और रोगप्रतिकारक शक्ति रखने वाली फ़सल की किस्में विकसित की जा रही हैं।

हालांकि, CRISPR के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती 'ऑफ़-टारगेट इफ़ेक्ट्स' (off-target effects) है, जहाँ Cas9 भूल से डीएनए के ग़लत भाग को काट देता है। इससे कैंसर जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। वैज्ञानिक अब Cas9 nickase (कैस-९ निकेज़) जैसे नए वेंटिएंट्स विकसित कर रहे हैं जो अधिक सुरक्षित हैं। इसके अलावा, मानव भ्रूण में बदलाव करने के नैतिक प्रश्न भी बहुत जटिल हैं, क्योंकि ऐसे बदलाव आने वाली पीढ़ियों में भी उतर सकते हैं।

भारत जैसे देश के लिए, जहाँ जेनेटिक रोगों का प्रमाण उल्लेखनीय है, CRISPR एक आशा की किरण है। वह सस्ती और तेज़ तकनीक होने के कारण भविष्य में आम लोगों तक उसकी पहुँच बढ़ने की संभावना है। २०२५ तक इस क्षेत्र में नए अनुसंधान, जैसे apoNmeCas9 का उपयोग, इस प्रक्रिया को और अधिक कार्यक्षम बनाएँगे। अंत में, CRISPR यह सिर्फ़ एक वैज्ञानिक साधन नहीं है, बल्कि वह कुदरत के सबसे पुराने संरक्षण तंत्र को मानव कल्याण के लिए इस्तेमाल करने की एक अद्भुत कला है।


