आंख की खिड़की बदलने की चिकित्सा क्रांति: कॉर्नियल ट्रांसप्लांट और दृष्टि बहाल करने का विज्ञान
जब प्राकृतिक लेंस धुंधला पड़ जाए, तो आधुनिक विज्ञान कैसे किसी और की आंख के टुकड़े या कृत्रिम तरीके से दृष्टि वापस लाता है, इसकी गहरी समझ।

आंख मानव शरीर का सबसे जटिल और संवेदनशील अंग है, जो हमें बाहरी दुनिया से जोड़ता है। विज्ञान की दृष्टि से देखें तो, आंख एक ऐसी सेंसरी सिस्टम है जो प्रकाश को खोजकर उसे न्यूरॉन्स (neurons) में इलेक्ट्रो-केमिकल आवेग में परिवर्तित करती है। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च जीवों में आंख एक जटिल ऑप्टिकल सिस्टम है जो आसपास के वातावरण से प्रकाश एकत्रित करती है और उसे लेंस द्वारा फोकस करके रेटिना पर छवि बनाती है। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भाग 'कॉर्निया' (cornea) निभाता है, जो आंख का सबसे अगला पारदर्शी भाग है।
कॉर्निया आंख की पुतली, आइरिस और प्यूपिल को ढकने वाली एक सुरक्षात्मक खिड़की जैसी है। जब यह खिड़की किसी बीमारी, चोट या आनुवंशिक कारणों से धुंधली हो जाती है या उसका आकार बिगड़ जाता है, तब व्यक्ति की देखने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में 'कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन' (corneal transplantation) या 'केराटॉप्लास्टी' (keratoplasty) एक आशा की किरण बनकर आती है। यह एक ऐसी सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें क्षतिग्रस्त कॉर्निया को मृत दाता से प्राप्त स्वस्थ कॉर्नियल ऊतक यानी ग्राफ्ट (graft) द्वारा बदल दिया जाता है।
कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की आवश्यकता और उद्देश्य
कॉर्नियल ट्रांसप्लांट मुख्य रूप से चार कारणों से किया जाता है। प्रथम और सबसे सामान्य कारण ऑप्टिकल (optical) है, जिसमें दृष्टि सुधारने के लिए अपारदर्शी या विकृत ऊतक को बदला जाता है। इसमें केराटोकोनस (keratoconus) जैसी स्थिति शामिल है, जिसमें कॉर्निया का आकार शंकु जैसा हो जाता है। दूसरा कारण टेक्टोनिक या पुनर्रचनात्मक (tectonic/reconstructive) है, जिसका उद्देश्य आंख की शरीररचना बनाए रखना होता है, विशेषकर यदि कॉर्निया पतला हो गया हो या उसमें छेद हो गया हो।
तीसरा कारण उपचारात्मक (therapeutic) है, जिसमें एंटीबायोटिक्स से ठीक न होने वाली सूजन या संक्रमित ऊतक को हटा दिया जाता है। अंत में, कॉस्मेटिक (cosmetic) कारणों से भी यह सर्जरी की जा सकती है, ताकि कॉर्निया पर मौजूद सफेद दागों को दूर करके आंख का दिखावा सुधारा जा सके। सोर्स 1 के अनुसार, 2021 तक इस प्रक्रिया की सफलता दर कम से कम 41% दर्ज की गई है। यह सर्जरी ऑप्थालमोलॉजिस्ट (ophthalmologists) यानी आंख के विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा की जाती है।
- एनेस्थेसियामरीज को लोकल या जनरल एनेस्थेसिया देकर आंख को सुन्न किया जाता है।
- ट्रेफिनेशनट्रेफाइन नामक उपकरण से क्षतिग्रस्त कॉर्निया का गोलाकार हिस्सा काटकर हटा दिया जाता है।
- ग्राफ्ट प्लेसमेंटडोनर के स्वस्थ कॉर्निया से उसी माप का टुकड़ा काटकर मरीज की आंख में रखा जाता है।
- स्यूचरिंगनए कॉर्निया को अत्यंत बारीक टांकों (स्यूचर्स) से मूल स्थान पर सुरक्षित रूप से सी दिया जाता है।
सर्जरी के प्रकार: पेनिट्रेटिंग बनाम लेमेलर
केराटॉप्लास्टी के मुख्य दो प्रकार हैं: पेनिट्रेटिंग और लेमेलर। जब पूरे कॉर्निया को बदला जाता है, तो उसे पेनिट्रेटिंग केराटॉप्लास्टी (penetrating keratoplasty) कहा जाता है। इस पद्धति में ट्रेफाइन (trephine) नामक एक गोलाकार काटने वाले उपकरण का उपयोग करके रोगी के कॉर्निया का एक गोल टुकड़ा निकाल लिया जाता है और उसकी जगह दाता का उतना ही भाग रखकर सूचर्स (sutures) यानी सर्जिकल टांकों द्वारा सी दिया जाता है।
दूसरी ओर, लैमेलर केराटोप्लास्टी (lamellar keratoplasty) में कॉर्निया की केवल कुछ परतें ही बदली जाती हैं। कॉर्निया की कुल मोटाई केवल 500 μm (माइक्रोमीटर) होती है, इसलिए यह प्रक्रिया अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इस पद्धति का मुख्य लाभ यह है कि आंख की संरचनात्मक अखंडता बनी रहती है। इसमें 'डीप एंटेरियर लैमेलर केराटोप्लास्टी' (DALK) जैसी तकनीकें शामिल हैं, जिसमें कॉर्निया की ऊपरी परतें बदल दी जाती हैं लेकिन अंदरूनी एंडोथेलियम परत को सुरक्षित रखा जाता है।
સ્નેલન ચાર્ટ રેશિયો
एंडोथेलियल केराटोप्लास्टी: एक आधुनिक क्रांति
पिछले कुछ वर्षों में एंडोथेलियल केराटोप्लास्टी (endothelial keratoplasty) ने कॉर्निया के रोगों के उपचार में क्रांति ला दी है। इस प्रक्रिया में कॉर्निया की सबसे अंदरूनी परत, जिसे एंडोथेलियम (endothelium) कहा जाता है, उसे ही बदला जाता है। इसमें DSEK और DMEK जैसी पद्धतियां प्रचलित हैं। DSEK में दाता के ऊतक 100-150 μm मोटे होते हैं, जबकि DMEK में केवल एंडोथेलियम ही ट्रांसप्लांट किया जाता है।
इस पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें टांके लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती या बहुत कम टांके लगाने पड़ते हैं। मरीज केवल कुछ दिनों या हफ्तों में दृष्टि वापस पा सकते हैं, जबकि पूर्ण ट्रांसप्लांट में एक वर्ष तक का समय लग सकता है। सर्जरी के दौरान, नए ऊतक को स्थान पर रखने के लिए आंख के अंदर हवा का बुलबुला (air bubble) डाला जाता है, जो ऊतक को प्राकृतिक रूप से चिपकने में मदद करता है। हालांकि, ऑस्ट्रेलियाई अध्ययन के अनुसार, DSEK में एंडोथेलियल कोशिकाओं का नुकसान पूर्ण ट्रांसप्लांट की तुलना में अधिक हो सकता है।
CAIRS: केराटोकोनस के लिए नई आशा
2018 में डॉ. सुसान जैकब द्वारा 'कॉर्नियल एलोजेनिक इंट्रास्ट्रोमल रिंग सेगमेंट्स' (CAIRS) नामक नई तकनीक पेश की गई थी। यह पद्धति विशेष रूप से केराटोकोनस के मरीजों के लिए है। इसमें प्लास्टिक के बजाय दाता के कॉर्निया के ऊतकों से बने छोटे टुकड़ों को कॉर्निया की परतों के बीच बैठाया जाता है। यह जैविक पदार्थ होने के कारण संक्रमण या शरीर द्वारा इसे अस्वीकार किए जाने की संभावना कम रहती है।
CAIRS तकनीक अत्यंत लचीली है क्योंकि इसमें प्रत्येक मरीज की आंख के आकार के अनुसार ग्राफ्ट को कस्टमाइज किया जा सकता है। ब्रिसबेन स्थित विशेषज्ञों ने इस सर्जरी की योजना बनाने के लिए cairsplan.com जैसी मुफ्त वेबसाइट भी बनाई है। यह पद्धति अब ऑस्ट्रेलिया, यूके और जापान जैसे देशों में आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त है। यह कमजोर पड़ गए कॉर्निया को मजबूती देती है और दृष्टि की स्पष्टता में उल्लेखनीय सुधार करती है।
सर्जरी की प्रक्रिया और सावधानियां
सर्जरी के दिन मरीज को अस्पताल या आउटपेशेंट सेंटर में लाया जाता है। प्रक्रिया आमतौर पर लोकल एनेस्थीसिया (local anesthesia) और सेडेटिव देकर की जाती है, ताकि मरीज जागृत रहे लेकिन उसे दर्द न हो। बच्चों के मामले में जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है। सर्जरी के दौरान आंख को खुला रखने के लिए लिड स्पेकुलम (lid speculum) का उपयोग किया जाता है।
सर्जरी के बाद मरीज को एंटीबायोटिक आई ड्रॉप्स दी जाती हैं और आंख पर पट्टी बांधी जाती है। कॉर्निया में रक्त वाहिकाएं नहीं होती हैं, इसलिए यह शरीर के अन्य हिस्सों की तुलना में धीरे-धीरे ठीक होता है। इस अवधि के दौरान संक्रमण का खतरा बना रहता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार ड्रॉप्स डालना अत्यंत आवश्यक है। अधिकांश मामलों में मरीज को सर्जरी के अगले ही दिन जांच के लिए बुलाया जाता है।
- तैयारीमरीज को लोकल या जनरल एनेस्थेसिया देकर आंख के आसपास के हिस्से को तैयार किया जाता है।
- क्षतिग्रस्त ऊतक हटानाट्रेफाइन उपकरण का उपयोग करके मरीज के कॉर्निया का क्षतिग्रस्त हिस्सा गोलाकार रूप में काटकर अलग किया जाता है।
- ग्राफ्ट का प्रत्यारोपणडोनर से प्राप्त स्वस्थ कॉर्नियल ऊतक को उसी जगह रखकर सर्जिकल टांकों (sutures) से सी दिया जाता है।
जोखिम और ग्राफ्ट रिजेक्शन
किसी भी सर्जरी की तरह कॉर्नियल ट्रांसप्लांट में भी जोखिम होते हैं। सबसे बड़ा जोखिम ग्राफ्ट रिजेक्शन (graft rejection) का है, जो लगभग 10% मामलों में देखा जाता है। इसका अर्थ यह है कि मरीज का शरीर नए ऊतकों को स्वीकार नहीं करता है और उन पर हमला करता है। यह प्रतिक्रिया सर्जरी के वर्षों बाद भी हो सकती है। इसे रोकने के लिए साइक्लोस्पोरिन ए (cyclosporine A) जैसे इम्यूनोसप्रेसेंट्स का उपयोग किया जाता है।
दूसरा जोखिम संक्रामक रोगों के फैलने का है, हालांकि यह अत्यंत दुर्लभ है। सभी दाता के ऊतकों का HIV और हेपेटाइटिस जैसे वायरस के लिए कड़ाई से परीक्षण किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि 1994 से अमेरिका में उन पुरुषों के कॉर्निया दान पर प्रतिबंध है जिन्होंने पिछले 5 वर्षों में किसी अन्य पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाए हों, भले ही उनकी HIV रिपोर्ट नेगेटिव हो। यह नीति आज भी वहां लागू है।

कृत्रिम कॉर्निया: बोस्टन केराटोप्रोस्थेसिस
जब प्राकृतिक कॉर्निया ट्रांसप्लांट बार-बार विफल हो जाए या संभव न हो, तब कृत्रिम कॉर्निया का उपयोग किया जाता है। इसमें 'बोस्टन केराटोप्रोस्थेसिस' (Boston keratoprosthesis) सबसे अधिक प्रसिद्ध है। 2008 तक दुनिया भर में 900 से अधिक ऐसी सर्जरी की जा चुकी थीं। यह एक सिंथेटिक उपकरण है जो क्षतिग्रस्त कॉर्निया की जगह लेता है और प्रकाश को आंख के अंदर प्रवेश करने देता है।
भारत जैसे देश में जहां कॉर्नियल अंधापन अधिक है, वहां यह तकनीक और अंगदान के प्रति जागरूकता बहुत महत्वपूर्ण है। दाता किसी भी उम्र के हो सकते हैं, जैसे जेनिस बैब्सन नाम के 10 वर्षीय बच्चे ने भी मृत्यु के बाद आंखों का दान किया था। आधुनिक विज्ञान और मानवीय उदारता के संगम से आज लाखों लोग फिर से दुनिया देख पाने में सक्षम बने हैं।



