मुख्य लेखों पर जाएँ
आवतीकालAIटेकविज्ञानराजनीति
आवतीकाल/ विज्ञान
कैपिटल क्रांति समाचार
आवतीकालAIटेकविज्ञानराजनीति
खोजेंकौन लिखता हैकैपिटल क्रांति समाचारसंपादक का पन्ना

रूप

ગુજરાતીEnglishहिन्दी

कोल्ड फ्यूजन प्रक्रिया: क्या विज्ञान वास्तव में असंभव को संभव बना सकता है?

1989 में विवादों में घिरी 'कोल्ड फ्यूजन' तकनीक आज 'लो-एनर्जी न्यूक्लियर रिएक्शन' के रूप में नए स्वरूप में वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित कर रही है।

आवतीकाल AI डेस्क31 अक्टूबर 2026 · 6 मिनट का पाठ
प्रयोगशाला में स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सेटअप, जिसका उपयोग पदार्थों की परमाणु संरचना की जांच के लिए किया जाता है।
प्रयोगशाला में स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सेटअप, जिसका उपयोग पदार्थों की परमाणु संरचना की जांच के लिए किया जाता है।
WhatsApp पर भेजें

परमाणु संलयन (nuclear fusion) ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली प्रक्रिया है, जो सूर्य और तारों को ऊर्जा प्रदान करती है। सामान्य तौर पर, यह प्रक्रिया लाखों डिग्री तापमान पर ही संभव हो पाती है, जिसे हम 'हॉट फ्यूजन' के रूप में जानते हैं। लेकिन, क्या होगा यदि यही प्रक्रिया कमरे के तापमान या सामान्य गर्मी में की जा सके? इस विचार को 'कोल्ड फ्यूजन' (cold fusion) कहा जाता है। विकिपीडिया के डेटा के अनुसार, यह एक ऐसी परिकल्पित परमाणु प्रक्रिया है जो सामान्य तापमान पर ऊर्जा उत्पन्न कर सकती है, जो मानव जाति के लिए ऊर्जा की समस्या का स्थायी समाधान ला सकती है।

यह विषय 1989 में तब चर्चा में आया जब यूनिवर्सिटी ऑफ उटाह के दो रसायनशास्त्रियों, मार्टिन फ्लेशमैन और स्टेनली पोंस ने एक आश्चर्यजनक दावा किया। उन्होंने बताया कि पैलेडियम (palladium) धातु के इलेक्ट्रोड का उपयोग करके भारी पानी (heavy water) के विद्युत अपघटन (electrolysis) के दौरान उन्होंने असाधारण गर्मी उत्पन्न होते देखी है। यह गर्मी इतनी अधिक थी कि इसे केवल रासायनिक प्रक्रिया के रूप में नहीं समझाया जा सकता था। उनके अनुसार, यह ऊर्जा परमाणु प्रक्रिया का परिणाम थी, जिसने पूरी दुनिया में सनसनी मचा दी थी।

कोल्ड फ्यूजन अनुसंधान में प्रयुक्त कांच का प्रयोगशाला उपकरण।
कोल्ड फ्यूजन अनुसंधान में प्रयुक्त कांच का प्रयोगशाला उपकरण। (StevenBKrivit, CC BY-SA 3.0, Wikimedia Commons)
कोल्ड फ्यूजन प्रयोगों में प्रयुक्त सिल्वर ड्यूअर कैलोरीमीटर
कोल्ड फ्यूजन प्रयोगों में प्रयुक्त सिल्वर ड्यूअर कैलोरीमीटर (Wikimedia Commons, Public domain, Wikimedia Commons)

इतिहास और प्रारंभिक अनुसंधान

कोल्ड फ्यूजन का विचार नया नहीं है। विकिपीडिया के इतिहास अनुभाग के अनुसार, 1920 के दशक में फ्रेडरिक पेनेथ और कुर्ट पीटर्स ने पैलेडियम द्वारा हाइड्रोजन का हीलियम में रूपांतरण करने का दावा किया था, हालांकि बाद में उन्होंने इसे वापस ले लिया था। 1927 में स्वीडिश वैज्ञानिक जॉन टेंडबर्ग ने भी हाइड्रोजन को हीलियम में बदलने के लिए पेटेंट आवेदन किया था, लेकिन भौतिक प्रक्रिया समझाने में विफल रहने के कारण उसे अस्वीकार कर दिया गया था। 'कोल्ड फ्यूजन' शब्द का सर्वप्रथम उपयोग 1956 में न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में लुईस अल्वारेज़ के काम के संदर्भ में हुआ था।

फ्लेशमैन और पोंस के प्रयोग में पैलेडियम धातु की हाइड्रोजन सोखने की अद्भुत क्षमता का उपयोग किया गया था। पैलेडियम अपने आकार से सैकड़ों गुना अधिक हाइड्रोजन सोख सकता है। वैज्ञानिकों ने धारणा बनाई थी कि पैलेडियम के भीतर हाइड्रोजन के आइसोटोप (isotopes) इतने करीब आ जाएंगे कि वे प्राकृतिक रूप से जुड़कर ऊर्जा मुक्त करेंगे। इस प्रयोग के लिए उन्होंने कैलोरीमीटर (calorimeter) नामक उपकरण का उपयोग किया था, जो प्रक्रिया के दौरान पैदा होने वाली गर्मी को मापता है।

फ्लेशमैन-पोंस प्रयोग की कार्यपद्धतिस्रोत: विकिपीडिया
  1. इलेक्ट्रोलाइट की तैयारीएक पात्र में भारी पानी (D2O) भरकर उसमें पैलेडियम का कैथोड रखा जाता है।
  2. विद्युत प्रवाहलगातार कई हफ्तों तक कम विद्युत प्रवाह प्रवाहित किया जाता है।
  3. ड्यूटेरियम का अवशोषणड्यूटेरियम के आयन पैलेडियम धातु के अंदर जमा होने लगते हैं।
  4. गर्मी का मापनकैलोरीमीटर द्वारा उत्पन्न ऊर्जा और तापमान में होने वाले परिवर्तन को नोट किया जाता है।
फ्लेशमैन-पोंस प्रयोग की कार्यपद्धति
  1. इलेक्ट्रोलेसिस की शुरुआतपैलेडियम कैथोड और भारी पानी का उपयोग करके विद्युत प्रवाह प्रवाहित किया जाता है।
  2. ड्यूटेरियम अवशोषणड्यूटेरियम के अणु पैलेडियम की जालीदार संरचना में जमा होते हैं।
  3. गर्मी का मापनकैलोरीमीटर द्वारा प्रक्रिया में उत्पन्न अतिरिक्त गर्मी को मापा जाता है।

प्रयोग की पद्धति और विज्ञान

फ्लेशमैन-पोंस प्रयोग में भारी पानी यानी ड्यूटेरियम ऑक्साइड का उपयोग किया गया था। ड्यूटेरियम (deuterium) हाइड्रोजन का एक भारी प्रकार है। जब पैलेडियम कैथोड (cathode) पर विद्युत प्रवाह दिया जाता है, तब ड्यूटेरियम के अणु पैलेडियम की जालीदार संरचना (lattice structure) में जमा हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने गौर किया कि शुरुआत में तापमान 30 °C पर स्थिर था, लेकिन अचानक वह बढ़कर 50 °C हो गया, जो दो दिनों तक चला था।

वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि इस प्रक्रिया में न्यूट्रॉन (neutron) और ट्रिटियम (tritium) जैसे परमाणु उप-उत्पाद भी देखे गए थे। सामान्यतः, जब परमाणु संलयन होता है तब ऐसे कण मुक्त होते हैं। हालांकि, इन कणों की संख्या इतनी कम थी कि अन्य वैज्ञानिकों ने इस पर संदेह व्यक्त किया था। विकिपीडिया के अनुसार, प्राकृतिक स्रोतों और कॉस्मिक किरणों के कारण भी वातावरण में न्यूट्रॉन और ट्रिटियम के अंश पाए जाते हैं, जो प्रयोग में त्रुटि पैदा कर सकते हैं।

विवाद और वैज्ञानिक प्रतिक्रिया

मार्च 1989 में जब यह घोषणा की गई, तब दुनिया भर के भौतिकशास्त्रियों ने इसे दोहराने का प्रयास किया। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर नाथन लुईस और CERN के वैज्ञानिक डगलस मॉरिसन जैसे विशेषज्ञों को इस प्रयोग को दोहराने में विफलता मिली। अधिकांश प्रयोगों में कोई अतिरिक्त गर्मी नहीं देखी गई। इसके कारण वैज्ञानिक समुदाय में भारी रोष देखा गया और कोल्ड फ्यूजन को 'पैथोलॉजिकल साइंस' (pathological science) यानी भ्रामक विज्ञान के रूप में पहचाना गया।

यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी (DOE) ने 1989 में एक समीक्षा की और निष्कर्ष निकाला कि अतिरिक्त गर्मी के प्रमाण विश्वसनीय नहीं हैं। 2004 में एक और समीक्षा की गई थी, लेकिन उसमें भी कोई ठोस परिणाम नहीं मिला। परिणामस्वरूप, मुख्यधारा की वैज्ञानिक पत्रिकाओं में इस विषय पर लेख छपना बंद हो गए। फ्लेशमैन और पोंस पर व्यवस्थित त्रुटियों और जल्दबाजी में घोषणा करने का आरोप लगा, जिसके कारण उन्हें अमेरिका छोड़कर फ्रांस में अपना शोध स्थानांतरित करना पड़ा।

आधुनिक शोध: LENR और गूगल का प्रयास

भले ही 1989 में इस विषय को नकार दिया गया था, लेकिन शोधकर्ताओं का एक छोटा समूह अभी भी इस पर काम कर रहा है। अब इस क्षेत्र को 'लो-एनर्जी न्यूक्लियर रिएक्शन' (low-energy nuclear reactions - LENR) या 'कंडेंस्ड मैटर न्यूक्लियर साइंस' (CMNS) के रूप में जाना जाता है। Quanta Magazine की रिपोर्ट के अनुसार, कोल्ड फ्यूजन में विफलता और धोखाधड़ी के अलावा भी क्या कुछ और है, यह जानने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

2019 में 'Nature' पत्रिका में गूगल द्वारा वित्तपोषित एक शोध प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अत्यंत सटीकता के साथ फ्लेशमैन-पोंस के प्रयोग को दोहराने का प्रयास किया था। हालांकि इस प्रयास में भी परमाणु संलयन के कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिले, लेकिन इसने धातुओं के भीतर हाइड्रोजन के व्यवहार के बारे में नई समझ प्रदान की। यह शोध बताता है कि भले ही पुराने दावे गलत हों, लेकिन परमाणु स्तर पर कुछ अज्ञात प्रक्रियाएं हो रही हो सकती हैं।

लोहे के क्रिस्टल का माइक्रोस्कोपिक दृश्य, जो धातु की आंतरिक जालीदार संरचना को दर्शाता है।
लोहे के क्रिस्टल का माइक्रोस्कोपिक दृश्य, जो धातु की आंतरिक जालीदार संरचना को दर्शाता है। (NASA)

भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां

यदि कोल्ड फ्यूजन या LENR सफल हो जाता है, तो यह दुनिया को एक सस्ता, स्वच्छ और अटूट ऊर्जा स्रोत प्रदान कर सकता है। इसमें ईंधन के रूप में केवल समुद्री जल का उपयोग होता है और कोई हानिकारक रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न नहीं होता है। हालाँकि, अब तक कोई भी स्वीकृत सैद्धांतिक मॉडल (theoretical model) नहीं है जो यह समझा सके कि कमरे के तापमान पर परमाणु नाभिकों के बीच के प्रतिकर्षण बल को कैसे दूर किया जा सकता है।

भौतिकी के मूलभूत नियमों के अनुसार, दो परमाणु नाभिकों को जोड़ने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है क्योंकि दोनों धनात्मक आवेशित होते हैं और एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं। हॉट फ्यूजन में यह ऊर्जा लाखों डिग्री तापमान द्वारा प्रदान की जाती है। कोल्ड फ्यूजन के समर्थकों का मानना है कि धातु की जालीदार संरचना में क्वांटम प्रभावों के कारण यह संभव हो सकता है, लेकिन यह बात अभी सिद्ध होनी बाकी है।

आधुनिक LENR अनुसंधान के चरणस्रोत: Quanta Magazine / Nature 2019
  1. सटीक मापनअत्यंत संवेदनशील सेंसर का उपयोग करके ऊर्जा के छोटे परिवर्तनों को मापना।
  2. सामग्री का विश्लेषणपैलेडियम और अन्य धातुओं की सतह पर होने वाले प्रभावों का नैनो स्तर पर निरीक्षण।
  3. डेटा शेयरिंगगूगल जैसी संस्थाओं द्वारा डेटा को खुला रखकर वैश्विक सहयोग स्थापित करना।

निष्कर्ष में, कोल्ड फ्यूजन का इतिहास विज्ञान की दुनिया के लिए एक सबक के समान है। यह दर्शाता है कि कैसे जल्दबाजी में की गई घोषणाएँ और बिना प्रमाण के दावे वैज्ञानिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकते हैं। फिर भी, LENR के नाम पर चल रहे शोध इस आशा को जीवित रखते हैं कि शायद भविष्य में हम परमाणु ऊर्जा प्राप्त करने की कोई नई और सरल पद्धति खोज सकेंगे। विज्ञान हमेशा प्रश्न पूछने और प्रयोग करने के बारे में है, और कोल्ड फ्यूजन उस प्रक्रिया का एक विवादास्पद लेकिन दिलचस्प हिस्सा है।

स्रोत

  1. Quanta Magazine
  2. Wikipedia
  3. Wikipedia

विज्ञान

सब देखें
कॉर्नियल ट्रांसप्लांट के एक दिन बाद मानव आंख का क्लोज-अप दृश्य, जिसमें सर्जिकल टांके स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।

आंख की खिड़की बदलने की चिकित्सा क्रांति: कॉर्नियल ट्रांसप्लांट और दृष्टि बहाल करने का विज्ञान

जब प्राकृतिक लेंस धुंधला पड़ जाए, तो आधुनिक विज्ञान कैसे किसी और की आंख के टुकड़े या कृत्रिम तरीके से दृष्टि वापस लाता है, इसकी गहरी समझ।

आवतीकाल AI डेस्क6 नव.7 मिनट का पाठ
दक्षिण कोरिया की आधुनिक सबमरीन ROKS Dosan Ahn Changho बंदरगाह छोड़ रही है, जो देश की बढ़ती नौसैनिक शक्ति का प्रतीक है।

दक्षिण कोरिया का 'जंग बोगो N' मिशन: परमाणु शक्ति से लैस सबमरीन तकनीक का नया अध्याय

दक्षिण कोरिया ने 2027 से अपनी पहली स्वदेशी परमाणु-संचालित सबमरीन बनाने की योजना को मंजूरी दी है, जो समुद्र में उसकी रणनीतिक क्षमताओं को कई गुना बढ़ा देगी।

आवतीकाल AI डेस्क6 नव.6 मिनट का पाठ
नासा लैंग्ली विंड टनल फैसिलिटी में छोटे विमान मॉडल के साथ मैरी जैक्सन। नासा के एरोनॉटिक्स अनुसंधान का इतिहास दशकों पुराना है।

नासा का नया X-70 फ्रैक्कल: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एयरोस्पेस डिज़ाइन के नए युग का आरंभ

नासा ने अपने नए प्रायोगिक विमान X-70 फ्रैक्कल की घोषणा की है, जो उन्नत फ्लाइट कंट्रोल और मॉड्यूलर डिज़ाइन के माध्यम से विमान निर्माण की पद्धतियों को बदल देगा।

आवतीकाल AI डेस्क6 नव.6 मिनट का पाठ
आवतीकाल
AIटेकविज्ञानराजनीतिकैपिटल क्रांति समाचार
हमारे बारे मेंसंपादकीय नीतिहम कैसे जाँचते हैंसंपर्क
© 2026 कैपिटल क्रांति