मृत्युदंड के मामलों में उचित प्रक्रिया के लिए उच्चतम न्यायालय ने दिशा-निर्देश निर्धारित किए
1980 के बचन सिंह मामले के आधार पर मृत्युदंड केवल विशेष कारणों से ही दिया जा सकता है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, सुबह 1:11 · 2 मिनट का पाठ
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10 अक्टूबर को 'डे अगेंस्ट द डेथ पेनल्टी' के अवसर पर, उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदंड के मामलों में लागू की गई सुरक्षात्मक दिशा-निर्देशों के पिछले अध्ययन पर ध्यान केंद्रित किया। पिछले चार दशकों में ये दिशा-निर्देश कैसे कार्य कर रहे हैं, इसे देखने का यह एक उपयुक्त अवसर था।
द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1980 में बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, इस निर्णय के साथ ही न्यायिक विवेक के उपयोग के लिए कुछ विशिष्ट शर्तें और दिशा-निर्देश भी लागू किए गए थे। इन दिशा-निर्देशों का मुख्य उद्देश्य मृत्युदंड के कार्यान्वयन में उचित प्रक्रिया सुनिश्चित करना था।
कानूनी ढांचे के दृष्टिकोण से देखें तो, पहले CrPC की धारा 354(3) के तहत जो प्रावधान किए गए थे, उन्हें अब नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 393(3) में शामिल किया गया है। इस कानूनी व्यवस्था के अनुसार, आजीवन कारावास सामान्य नियम या मानक माना जाता है। मृत्युदंड की सजा केवल "विशेष कारणों" के लिए ही लगाई जा सकती है।
जब अदालतों को ऐसे गंभीर मामलों में निर्णय लेना होता है, तो उन्हें अपराध की परिस्थितियों के साथ-साथ आरोपी की परिस्थितियों का भी संतुलित मूल्यांकन करना चाहिए। न्यायाधीशों को अपराध की गंभीरता और आरोपी की व्यक्तिगत स्थिति दोनों को ध्यान में रखना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के इन नियमों के अनुसार, मृत्युदंड की सजा तभी दी जा सकती है जब आजीवन कारावास की संभावना पूरी तरह से या "निश्चित रूप से खारिज" (unquestionably foreclosed) होने की स्थिति हो।
इस प्रकार, पिछले चार दशकों से ये दिशा-निर्देश मृत्युदंड के मामलों में न्यायिक विवेक के उपयोग के लिए एक महत्वपूर्ण ढांचा प्रदान करते हैं।
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