मणिपुर में सभी सशस्त्र समूहों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई की दिल्ली पैनल की मांग
जातीय पहचान को ध्यान में रखे बिना हथियार छुड़वाने और अवैध हथियारों को रिकवर करने पर जोर
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, रात 11:57 · अपडेट सुबह 12:05 · 6 मिनट का पाठ
यह समाचार AI ने नीचे दिए स्रोतों से लिखा है; इसका हर दावा और आँकड़ा उन स्रोतों से मिलाकर ही प्रकाशित किया गया है। हम कैसे जाँचते हैं
दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान, विशेषज्ञों के एक पैनल ने कहा कि मणिपुर में जन विश्वास बहाल करने और स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा, सशस्त्र समूहों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई और अवैध हथियारों की रिकवरी अत्यंत आवश्यक है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, पैनल ने स्पष्ट किया कि मणिपुर के संकट को केवल कानून और व्यवस्था या सुरक्षा के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता, न ही इसे केवल जातीय विभाजन के दृष्टिकोण से देखा जाएगा। इस संकट के समाधान के लिए व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है ताकि लंबे समय से चल रहे संकट के मूल कारणों की जांच की जा सके और संभावित समाधान खोजे जा सकें।
चर्चा के दौरान एक मुख्य चिंता मणिपुर में अवैध हथियारों और सशस्त्र समूहों की निरंतर उपस्थिति के बारे में व्यक्त की गई। पैनल ने मांग की कि जातीय पहचान या सामुदायिक जुड़ाव को ध्यान में रखे बिना सभी सशस्त्र संगठनों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही, लूटे गए और अवैध रूप से रखे गए हथियारों को रिकवर करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
चर्चा में भाग लेने वालों ने कहा कि किसी भी संकट के समाधान के लिए समझौता या सुलह केंद्र में होनी चाहिए। मणिपुर के समुदायों के पास उनकी अलग पहचान, ऐतिहासिक अनुभवों और राजनीतिक आकांक्षाओं के बावजूद, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए अन्य कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है। भारत की विविधता में एकता की संवैधानिक प्रतिबद्धता के साथ इस मुद्दे को जोड़ते हुए, प्रतिभागियों ने चेतावनी दी कि मणिपुर में सामुदायिक सह-अस्तित्व का क्षरण राज्य के बाहर भी प्रभाव डाल सकता है।
जातीय आधार पर क्षेत्रों को पुनर्गठित करने के प्रस्ताव के खिलाफ भी चर्चा में असहमति व्यक्त की गई। पैनल के सदस्यों ने तर्क दिया कि अलग क्षेत्र बनाने से पहचान और अन्य मामलों के मूल विवाद अपने आप हल नहीं होंगे। असम के अनुभव का उल्लेख करते हुए, उन्होंने अवलोकन किया कि ओवरलैपिंग क्षेत्रीय दावों और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक आकांक्षाओं से उत्पन्न संघर्षों के लिए क्षेत्रीय विभाजन हमेशा टिकाऊ समाधान नहीं होता है।
पैनल ने वर्तमान स्थिति पर ड्रग इकोनॉमी और सीमा पार के आपराधिक नेटवर्क के प्रभाव की भी जांच की। प्रतिभागियों ने आरोप लगाया कि म्यांमार से काम करने वाले व्यक्तियों सहित स्वार्थी हित नार्कोटिक्स नेटवर्क का उपयोग करके क्षेत्र के विकास को प्रभावित करने और अस्थिरता बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। इस समस्या का सामना करने के लिए, मीटिंग में अवैध अफीम की खेती को पहचानने और उसे निशाना बनाने के लिए ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और हवाई निगरानी के उपयोग की सिफारिश की गई। इसके अलावा, नार्कोटिक्स व्यापार को समर्थन देने वाले वित्तीय नेटवर्क, तस्करी के मार्गों और अन्य आपराधिक ढांचे के खिलाफ सघन कार्रवाई करने की भी सूचना दी गई।
चर्चा के दौरान कुकी विद्रोही समूहों के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) समझौते की समीक्षा करने की भी मांग की गई। पैनल ने प्रश्न उठाया कि क्या यह व्यवस्था अपने निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही है। इस समझौते के कार्यान्वयन, निगरानी तंत्र और इसकी समग्र प्रभावशीलता की पूरी जांच करने की भी मांग की गई। उल्लेखनीय है कि, यह त्रिपक्षीय SoO समझौता 2008 में केंद्र सरकार, मणिपुर सरकार और दो अंब्रेला संगठनों के तहत कार्यरत दो दर्जन से अधिक सशस्त्र समूहों के बीच किया गया था। इन दो अंब्रेला संगठनों में कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (KNO) और यूनाइटेड पीपल्स फ्रंट (UPF) शामिल हैं।
समझौते के नियमों के अनुसार, सदस्यों को निर्धारित कैंप में रहना आवश्यक था और उनके हथियारों को लॉक किए गए स्टोरेज में रखना था, जिसका समय-समय पर निरीक्षण होता था। एक संयुक्त निगरानी समूह को इसके कार्यान्वयन पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और समझौते के विस्तार के लिए हर साल इसकी समीक्षा की जाती थी। पुनर्वास व्यवस्था के भाग के रूप में, समझौते के तहत आने वाले सदस्यों को मासिक ₹6,000 स्टाइपेंड दिया जाता था। इस पहल का उद्देश्य पहाड़ी जिलों में हिंसा कम करना, विरोध प्रतिरोधी कार्रवाई का बोझ कम करना और राजनीतिक बातचीत तथा विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना था।
दिल्ली की इस मीटिंग में जोर दिया गया कि सशस्त्र संगठनों के साथ किसी भी समझौते में हथियार छुड़वाने और जवाबदेही की ओर प्रगति दिखाना आवश्यक है। प्रतिभागियों ने कहा कि केवल सुरक्षा कार्रवाई के माध्यम से मणिपुर में स्थायी शांति नहीं लाई जा सकेगी, यदि इसके साथ विश्वसनीय राजनीतिक प्रक्रिया न हो। कोई भी बातचीत जो जवाबदेही और कानून के निष्पक्ष कार्यान्वयन के बिना की जाए, वह जन विश्वास फिर से हासिल करने के लिए अपर्याप्त होगी।
इस चर्चा का आयोजन मेतेई एलायंस और मेतेई हेरिटेज सोसाइटी (MHS) द्वारा किया गया था। मेतेई एलायंस मणिपुर के मेतेई समुदाय के नागरिक समाज के संगठनों का वैश्विक अंब्रेला बॉडी है, जबकि MHS विकास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए कार्यरत समुदाय का नागरिक समाज का समूह है। इस पैनल की चर्चा में पत्रकार सुबीर भौमिक, लेफ्टिनेंट जनरल हिमालय सिंह (सेवानिवृत्त), प्रोफेसर आरंबम नोनी और एसी खारिंगपम, तथा मणिपुर के मुख्यमंत्री के पूर्व सलाहकार रजत सेठी उपस्थित रहे थे।
કરચી નજીક ચર્ના ટાપુ પર લશ્કર-એ-તૈયબા આતંકવાદીઓની ગુપ્ત દરિયાઈ તાલીમ
પર્યટકોના વેશમાં આતંકવાદીઓને સ્કુબા ડાઇવિંગ અને અન્ડરવોટર ઓપરેશનની તાલીમ આપવામાં આવી રહી છે
RBI દ્વારા ૨૦૨૫-૨૬ના વિદેશી જવાબદારીઓ અને અસ્કયામતોના કામચલાઉ પરિણામો જાહેર
ભારતીય સંસ્થાઓના સીધા રોકાણ સંબંધિત વાર્ષિક સેન્સસના આંકડા બહાર પાડવામાં આવ્યા
ન્યુઝીલેન્ડ સામે ટેસ્ટ શ્રેણી પૂર્વે બુમરાહ અને જાડેજા ઈન્ડિયા એ ટીમમાં સામેલ થશે
લિંકન ખાતે શનિવારથી શરૂ થતી ન્યુઝીલેન્ડ એ સામેની અંતિમ ચાર-દિવસીય મેચમાં દિગ્ગજ ખેલાડીઓ રમશે