बिहार के शिवहर में डीएम की अचानक जांच में मिड-डे मील में बड़ी अनियमितताएं उजागर
सरकारी स्कूल के बच्चों ने कहा कि उन्हें अंडे की जगह बिस्कुट मिलते हैं, जबकि कागजों में अंडे का हिसाब और बिल मौजूद थे.
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 2:22 · 5 मिनट का पाठ
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आज तक न्यूज आउटलेट की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के शिवहर जिले में एक सरकारी स्कूल में मिड-डे मील योजना के तहत बच्चों को मिलने वाले भोजन को लेकर चौंकाने वाला मामला सामने आया है. बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिड-डे मील के अंतर्गत भोजन दिया जाता है, जिसमें मेनू में अंडा भी शामिल होता है और इसके लिए अलग से पैसे आते हैं. शिवहर जिले के कटसरी जागीर स्थित राजकीय मध्य विद्यालय में जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) द्वारा औचक जांच की गई.
आज तक के मुताबिक, जब डीएम प्रतिभा रानी इस स्कूल में औचक निरीक्षण करने पहुंची थीं, तब उन्होंने वहां की पढ़ाई और खाने की व्यवस्था का जायजा लिया था. इस दौरान उन्होंने बच्चों से बातचीत की थी और मिड-डे मील में मिलने वाले अंडे के बारे में पूछताछ की थी. डीएम ने जब बच्चों से पूछा कि उन्हें अंडा मिलता है या नहीं, तो बच्चों का जवाब सुनकर अधिकारी भी चौंक गए थे. बच्चों ने स्पष्ट बताया था कि उन्हें मेनू के मुताबिक अंडा नहीं दिया जाता है, बल्कि इसके बदले बिस्कुट दिए जाते हैं. बच्चों के इस जवाब के बाद अधिकारियों ने स्कूल के शिक्षकों से सवाल किए, लेकिन शिक्षक इस बारे में किसी भी प्रकार का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके.
आज तक द्वारा बताए अनुसार, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ कि जब बच्चों को अंडा दिया ही नहीं जाता था, तो स्कूल के कागजों और रिकॉर्ड में उसका हिसाब किस तरह दर्शाया गया था. इस बात की सत्यता जांचने के लिए डीएम ने स्कूल की फाइलें मंगवाकर जांची थीं. रिकॉर्ड की जांच के दौरान स्कूल में अंडे का बिल भी मिल गया था. यानी कागजों पर अंडा देने का हिसाब साफ दिख रहा था, जबकि वास्तविकता में बच्चों का कहना उससे बिल्कुल अलग था. यह विसंगति सामने आने के बाद डीएम ने तत्काल प्रभाव से सभी जरूरी फाइलें और दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए थे और जांच के अर्तथ साथ ले गए थे.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस निरीक्षण के दौरान स्कूल में उपस्थित बच्चों की संख्या भी कम देखने को मिली थी. इस बात पर भी डीएम ने सवाल उठाए थे. उन्हें आशंका हुई थी कि स्कूल के रिकॉर्ड में दर्ज बच्चों की संख्या और वास्तविकता में स्कूल में हाजिर रहने वाले बच्चों की संख्या के बीच बड़ा अंतर हो सकता है. इसी वजह से स्कूल का हाजिरी रजिस्टर भी जब्त किया गया है. हालांकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि हाजिरी में कोई गड़बड़ की गई थी या नहीं. इस बात की वास्तविकता दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड के मिलान के बाद ही बाहर आएगी. इसके अलावा डीएम ने स्कूल में साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान देने का आदेश दिया था और स्पष्ट किया था कि बच्चों के भविष्य तथा उनकी पढ़ाई और भोजन की व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
आज तक न्यूज के अनुसार, डीएम प्रतिभा रानी ने बताया है कि स्कूल से सभी जरूरी फाइलें जब्त कर ली गई हैं और इन सभी दस्तावेजों की गहराई से जांच की जाएगी. इस जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर उचित और कड़ी कार्रवाई का निर्णय लिया जाएगा. फिलहाल के लिए डीएम ने कैमरे के सामने इस मामले में अधिक विस्तार से कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है. अब आगामी जांच में इस बात की भी पराकाष्ठा पर जांच होगी कि बच्चों को अंडे की जगह क्यों बिस्कुट दिए जाते थे, अंडे के नाम पर जो बिल बनाए गए थे वे किस आधार पर बने थे और स्कूल के रिकॉर्ड में दर्ज बच्चों की संख्या सही है या नहीं.
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि बच्चों के खाने के लिए सरकारी स्तर पर पैसे आते थे और बच्चों को अंडे नहीं मिलते थे, तो वे पैसे आखिर कहां जाते थे? क्या वास्तव में अंडे की खरीदी की गई थी? यदि खरीदी हुई थी तो वे बच्चों तक क्यों नहीं पहुंचे? और यदि कोई खरीदी ही नहीं हुई थी, तो स्कूल के रिकॉर्ड में उसका गलत हिसाब किसने और क्यों दर्ज किया था? इन तमाम सवालों के जवाब केवल गहरी जांच के बाद ही मिल सकेंगे. फिलहाल तो इतना तय है कि डीएम के एक ही सवाल पर बच्चों द्वारा दिए गए जवाबों ने पूरी स्कूली व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत बच्चों को मिलने वाला भोजन केवल एक सुविधा नहीं है, बल्कि उनकी सेहत और पढ़ाई से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था है. ऐसे में यदि कागजों पर कुछ अलग ही दिखाया जाता हो और बच्चों की थाली में कुछ अलग ही आता हो, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी निश्चित रूप से तय होनी ही चाहिए.
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