डॉक्टरों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से राष्ट्रीय नीति मांगी
कर्नाटक के नियमों को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश में मेडिकल छात्रों के लिए समान नीति के अभाव पर खेद जताया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
29 अक्टूबर 2026, शाम 6:58 · अपडेट सुबह 7:56 · 7 मिनट का पाठ
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डॉक्टरों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर राष्ट्रीय ढांचा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उसके रुख के बारे में स्पष्टीकरण मांगा है। यह मामला कर्नाटक सरकार के अनिवार्य सेवा के नियमों को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान उठा। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल छात्रों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर राष्ट्रीय सहमति स्थापित करने में आ रही 'पॉलिसी डेफिसिट' यानी नीतिगत कमी पर खेद व्यक्त किया।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सुझाव दिया कि कोर्ट राज्यों को नियम बनाने में मार्गदर्शन देने के लिए संवैधानिक सिद्धांत तय कर सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डॉक्टर देश की वंचित ग्रामीण आबादी की सेवा कर सकें। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या सरकार राष्ट्रीय नीति बनाने का इरादा रखती है और यदि वह निर्णय लेती है तो किनके साथ परामर्श करने की उसकी योजना है।
यह मामला कर्नाटक सरकार द्वारा 2023 में जारी एक अधिसूचना को चुनौती देता है। इस अधिसूचना के तहत निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी एक साल की अनिवार्य सेवा देनी होगी, ऐसा नियम लागू किया गया है। बेंच ने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा केवल कर्नाटक की अधिसूचना की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नीति भारत की स्वास्थ्य सेवा वितरण प्रणाली के भविष्य पर बड़ा असर डालेगी।
बेंच ने टिप्पणी की, "जो सुझाव दिया जा रहा है वह कोई आदेश नहीं है। सिद्धांत के रूप में, क्या नीति निर्माता और संवैधानिक आवश्यकताएं इस सिद्धांत के साथ संगत हैं कि क्या भारत में डॉक्टरों के लिए ग्रामीण सेवा हमारे स्वास्थ्य और राष्ट्रीय स्वास्थ्य के सुधार के लिए आवश्यक कदम है या नहीं? यह मुख्य मुद्दा है।" कोर्ट ने आगे कहा कि सरकार को नीति निर्माण स्तर पर इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में संवैधानिक व्याख्या और इसके लिए राज्य की जिम्मेदारियां, अनिवार्य ग्रामीण सेवा की आवश्यकता की जांच करने का आधार बन सकती हैं।
कोर्ट ने भविष्य की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि, आने वाले समय में जहां अस्पतालों तक पहुंच का अर्थ व्यावहारिक रूप से निजी संस्थाओं द्वारा संचालित अस्पतालों तक पहुंच का होगा, वहां ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों से दूर जाना एक संवैधानिक सिद्धांत के रूप में जांचने योग्य विषय है। स्वास्थ्य सेवा वितरण में निजी संस्थाओं का बढ़ता योगदान इस मामले को गंभीर बनाता है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ये टिप्पणियां उस समय आईं जब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बेंच को बताया कि पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल छात्र रोटेशनल आधार पर अनिवार्य सेवा के लिए पात्र हैं, लेकिन अंडरग्रेजुएट स्तर पर ऐसी कोई राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है और कई राज्यों ने मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद डॉक्टरों को सेवा देने के लिए बॉन्ड के प्रावधान पेश किए हैं। भाटी ने यह भी बताया कि एक समिति ने राज्यों द्वारा ऐसे बॉन्ड के समान स्वीकार्यता की सिफारिश की है। हालांकि, केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि वह कोर्ट द्वारा ऐसा आदेश देने के बजाय परामर्श प्रक्रिया शुरू कर सकती है जो देशभर के मेडिकल संस्थानों को प्रभावित कर सकती है।
कोर्ट के एमिकस क्यूरी के रूप में मदद कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने सुझाव दिया कि कोर्ट को कानूनी खामियों को दूर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 21, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का उपयोग करके उचित दिशा-निर्देश तय करने चाहिए। इसके जवाब में बेंच ने स्पष्ट किया कि कोर्ट अनिवार्य ग्रामीण सेवा के कार्यान्वयन के लिए समान पद्धति तय करने के बजाय उसके पीछे के संवैधानिक सिद्धांतों की जांच कर रही है। बॉन्ड या नियमों के माध्यम से यह आवश्यकता लागू करनी है या नहीं, जैसी पद्धतियां अलग से तय की जा सकती हैं।
बेंच ने कहा, "हम इसे मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इसकी संवैधानिक आवश्यकता के स्वरूप में तैयार करेंगे। इसकी संरचनाएं नेशनल मेडिकल कमीशन के साथ परामर्श करके राज्यों द्वारा की जाएंगी।" कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए पोस्ट की है और केंद्र से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या वह नीति बनाने का प्रस्ताव रखती है और वह किन हितधारकों के साथ परामर्श करना चाहती है।
यह मामला 'कर्नाटक कंपल्सरी सर्विस ट्रेनिंग बाय कैंडिडेट्स कंप्लीटेड मेडिकल कोर्सेज एक्ट, 2012' और इसके तहत 2015 में बनाए गए नियमों को चुनौती देने से उत्पन्न हुआ है। इस कानून के अनुसार एमबीबीएस ग्रेजुएट्स, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और डिग्री धारक, और सुपर-स्पेशियलिटी उम्मीदवार जिन्होंने सरकारी संस्थानों में पढ़ाई की है या निजी या डीम्ड विश्वविद्यालयों में सरकारी सीटें प्राप्त की हैं, उन्हें एक साल की अनिवार्य सार्वजनिक ग्रामीण सेवा देनी आवश्यक है। इस सेवा को पूरा करना नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है, जो उम्मीदवारों को कर्नाटक मेडिकल काउंसिल में स्थायी पंजीकरण प्राप्त करने में मदद करता है।
28 जुलाई, 2023 को जारी अधिसूचना के माध्यम से निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर पंजीकृत छात्रों के लिए भी यह आवश्यकता बढ़ा दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने इस विस्तार को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि जो छात्र निजी सीटों के लिए काफी अधिक फीस चुकाते हैं, वे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत एक अलग वर्ग बनाते हैं और उन्हें समान अनिवार्य सेवा शर्तों के अधीन नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने कर्नाटक स्वास्थ्य अधिकारियों को अनिवार्य ग्रामीण सेवा की गारंटी मांगे बिना आवश्यक NOC देने और राज्य मेडिकल काउंसिल को उन्हें स्थायी पंजीकरण देने के लिए निर्देश मांगे हैं।
यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के 2019 के 'एसोसिएशन ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशियलिटी एस्पिरेंट्स एंड रेजिडेंट्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' के फैसले के साथ भी जुड़ा है। उस मामले में कोर्ट ने पोस्ट ग्रेजुएट और सुपर-स्पेशियलिटी मेडिकल कोर्स में प्रवेश लेने वाले उम्मीदवारों पर लगाए गए अनिवार्य बॉन्ड को वैध माना था। इन आवश्यकताओं की वैधता स्वीकार करते हुए भी, कोर्ट ने राज्यों द्वारा लगाई जाने वाली सख्त और बदलती शर्तों को संबोधित करने की आवश्यकता पर जोर दिया था और सुझाव दिया था कि केंद्र सरकार और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षित डॉक्टरों के लिए अनिवार्य सेवा के लिए समान नीति पर विचार करना चाहिए।
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