सुप्रीम कोर्ट के मध्याह्न भोजन के आदेश ने स्कूल ड्रॉपआउट अनुपात को कम करने में मदद की
पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज द्वारा दायर मामले के बाद देशभर के सरकारी स्कूलों में भोजन योजना लागू हुई
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, सुबह 9:27 · 4 मिनट का पाठ
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भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2001 में दिए गए एक ऐतिहासिक आदेश ने पिछले दो दशकों में देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को नया आकार दिया है। टीवी9 गुजराती की रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) द्वारा दायर अकाल और भूख से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान आया था। कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि छह महीने की अवधि के भीतर सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त प्राथमिक स्कूलों के प्रत्येक बच्चे को पका हुआ दोपहर का भोजन उपलब्ध कराया जाए।
भूख से राहत देने के उपाय के रूप में शुरू हुई यह योजना समय के साथ बच्चों को कक्षा में बनाए रखने के भारत के सबसे बड़े और सबसे लंबे समय तक चलने वाले प्रयोगों में से एक बन गई है। यह विचार पूरी तरह से नया नहीं था, क्योंकि तमिलनाडु राज्य में 1960 के दशक की शुरुआत से ही इस योजना का एक स्वरूप लागू था। तमिलनाडु के शुरुआती अनुभवों पर हुए शोध से पता चला था कि इस योजना के कारण स्कूल में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में मापने योग्य सकारात्मक बदलाव आया था। विशेष रूप से गरीब परिवारों और लड़कियों की शिक्षा पर इसका अधिक प्रभाव देखा गया था।
गरीब परिवारों के लिए निश्चित भोजन की गारंटी यह निर्णायक कारक बन गई कि बच्चे को स्कूल भेजा जाए या घर के काम में मदद के लिए घर पर रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में तमिलनाडु के इस सफल प्रयोग को अपनाकर इसे पूरे देश में लागू किया था। तब से, शैक्षिक शोध और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्र पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययन पुष्टि करते हैं कि इस योजना ने प्राथमिक स्कूलों में बच्चों के नामांकन में उल्लेखनीय वृद्धि की है। जिन बच्चों के स्कूल छोड़ने या प्रवेश न पाने की संभावना सबसे अधिक थी, उन्हें इस योजना का सबसे अधिक लाभ मिला है। विशेष रूप से उन परिवारों के लिए यह योजना वरदान साबित हुई है, जहाँ बच्चे को घर पर भोजन कराने का खर्च उसे स्कूल भेजने के खर्च के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा करता था।
वर्तमान में इस योजना का नाम बदलकर 'पीएम पोषण' (PM POSHAN) कर दिया गया है। UDISE+ स्कूल गणना के हालिया आंकड़े दर्शाते हैं कि लगभग 10.9 लाख संस्थानों में करीब 10.32 करोड़ बच्चों को इस योजना के तहत भोजन दिया जाता है। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2021 से 2026 की अवधि के लिए इस योजना के लिए कुल 54,061 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। भोजन तैयार करने के दैनिक खर्च की बात करें तो, प्राथमिक विद्यालय के छात्रों के लिए 6.78 रुपये और उच्च प्राथमिक विद्यालय के छात्रों के लिए 10.17 रुपये निर्धारित किए गए हैं। करोड़ों बच्चों की पहुंच को देखते हुए यह दुनिया के सबसे बड़े स्कूली भोजन कार्यक्रमों में से एक है।
हालांकि, इन प्रभावशाली आंकड़ों के बीच एक बड़ी कमी भी है। यह योजना वर्तमान में भारत में कुल पंजीकृत छात्रों में से केवल 41.8 प्रतिशत बच्चों को ही कवर करती है। गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 9.58 करोड़ बच्चे, जो कुल छात्रों की संख्या का 39 प्रतिशत हैं, इस लाभ से पूरी तरह वंचित हैं। चूंकि योजना केवल सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए है, इसलिए कम फीस वाले निजी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब परिवारों के बच्चों को यह सुविधा नहीं मिलती, जिनकी आर्थिक स्थिति सरकारी स्कूल के बच्चों जैसी ही होती है।
कक्षा में इस भोजन का प्रभाव गहरा है। जिस बच्चे को सुबह उचित नाश्ता नहीं मिला, वह देर सुबह तक पढ़ाई में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता। चाहे शिक्षा की पद्धति या पाठ्यपुस्तकें कितनी भी श्रेष्ठ क्यों न हों, लेकिन भूख की समस्या को कोई पाठ्यक्रम दूर नहीं कर सकता। हर दिन मिलने वाला भरोसेमंद दोपहर का भोजन इस बाधा को दूर करता है। इसके अलावा, शोध में एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव भी देखा गया है, जिसमें अलग-अलग जाति और समुदाय के बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है।
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