फाजिल्का के खेतों में जलभराव के कारण पराली प्रबंधन में मुश्किल
भूजल स्तर बढ़ने से खेतों में फंस रही हैं ट्रैक्टर और बेलर मशीनें
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 5:53 · 3 मिनट का पाठ
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पंजाब के सीमावर्ती जिले फाजिल्का के किसान वर्तमान में एक अनोखी भौगोलिक समस्या का सामना कर रहे हैं, जिसके कारण धान की पराली के प्रबंधन में भारी कठिनाई हो रही है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में भूजल स्तर सतह के बहुत करीब आ गया है और ऊपर की ओर रिसाव (seepage) के कारण खेतों में पानी भर रहा है। इस स्थिति में पराली के निस्तारण के लिए उपयोग किए जाने वाले ट्रैक्टर, बेलर और अन्य विशिष्ट कृषि यंत्र खेतों में काम नहीं कर पा रहे हैं, जिससे किसानों के पास पराली को जलाए बिना निस्तारण करने के बहुत कम व्यावहारिक विकल्प बचे हैं।
यह समस्या तब सामने आई जब कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) की एक टीम फाजिल्का के दौरे पर आई थी। दिल्ली-एनसीआर में हवा की घटती गुणवत्ता के बीच पंजाब में जांच तेज कर दी गई है। CAQM की टीम ने विभिन्न गांवों का दौरा कर पराली प्रबंधन की व्यवस्थाओं का मूल्यांकन किया, कृषि यंत्रों के उपयोग की जांच की और कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में किसानों को पराली प्रबंधन में क्यों कठिनाई हो रही है, इसे समझने का प्रयास किया।
जलभराव वाले गांवों के किसानों के लिए मुख्य चुनौती मशीनरी की उपलब्धता की नहीं, बल्कि उसे चलाने की असमर्थता की है। दीपनवली गांव के किसान ठाकर सिंह भुल्लर ने विजिटिंग टीम को बताया कि क्षेत्र में भूजल स्तर इतना ऊंचा है कि कृषि उपकरण बार-बार खेतों में फंस जाते हैं। ऐसी स्थिति में धान की पराली के बंडल (bales) बनाना और उन्हें खेत से बाहर ले जाना भी अत्यंत कठिन हो जाता है।
पंजाब के कई क्षेत्रों में ऊपर की ओर रिसाव की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें सतह के करीब स्थित भूजल जमीन में ऊपर आता है, जिसके परिणामस्वरूप निरंतर जलभराव (waterlogging) की समस्या उत्पन्न होती है। जमीन लगातार पानी से संतृप्त रहने के कारण ट्रैक्टर और भारी कृषि उपकरण खेतों में आवाजाही नहीं कर पा रहे हैं। यह समस्या केवल पराली के निस्तारण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बुवाई और कटाई के बाद की अन्य कृषि प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर रही है। कुछ प्रभावित क्षेत्रों में भूजल सतह से मात्र कुछ फीट नीचे पाया गया है।
किसानों ने CAQM की टीम को स्पष्ट रूप से बताया कि पराली प्रबंधन के लिए जिन पारंपरिक समाधानों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वे उनकी भौगोलिक स्थिति के अनुकूल नहीं हैं। उन्होंने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार से अपील की है कि ऐसे गांवों के लिए एक अलग रणनीति तैयार की जाए। किसानों ने यह मांग भी की कि इन असाधारण परिस्थितियों में उन्हें पराली जलाने की अनुमति दी जाए या इसके निस्तारण के लिए कोई वैकल्पिक पद्धति उपलब्ध कराई जाए।
CAQM के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. टी.एस. पवार के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ाने में पराली जलाना एक महत्वपूर्ण कारण है। इसीलिए आयोग पंजाब के चिन्हित हॉटस्पॉट्स का दौरा कर स्थिति का मूल्यांकन कर रहा है। टीम किसानों से बातचीत कर रही है, इन-सीटू (in-situ) और एक्स-सीटू (ex-situ) पराली प्रबंधन उपायों की जांच कर रही है और पंजाब सरकार तथा जिला प्रशासन द्वारा किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा कर रही है।
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