ट्रांसजेंडर एक्ट के विरुद्ध की गई अर्जी पर नाराजगी व्यक्त की गई
महिला संगठनों और ट्रांस समुदाय ने नई अर्जी के सामने आपत्ति जताई है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, दोपहर 2:29 · अपडेट दोपहर 3:41 · 8 मिनट का पाठ
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हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर पर्सन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट से संबंधित अर्जियों को लेकर सुनवाई चल रही है। इस मामले में वुमंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल (डब्ल्यूडीआई) इंडिया चैप्टर द्वारा सर्वोच्च अदालत में दाखिल की गई एक नई अर्जी के कारण नारीवादी संगठनों में भारी आश्चर्य और नाराजगी फैल गई है तथा ट्रांसजेंडर समुदाय के वर्गों में भी चिंता का माहौल छा गया है। इस अर्जी में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (नालसा) और अन्य के विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया केस के ऐतिहासिक फैसले द्वारा दिए गए लिंग की स्व-पहचान के कानूनी अधिकार को रद्द किया जाए। इसके अलावा, लिंग पहचान या चिकित्सीय हस्तक्षेप को ध्यान में रखे बिना, केवल महिलाओं के लिए उपलब्ध सभी लाभों, सुरक्षाओं और हकों को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को न देने के लिए निर्देश देने की भी मांग की गई है।
इस प्रतिनिधि फाइल फोटो से जुड़ी नई अर्जी में कई प्रकार की राहतें मांगी गई हैं। अर्जी में बताए अनुसार, आवेदक नालसा के फैसले में स्व-घोषित लिंग पहचान की मान्यता के संवैधानिक अधिकार पर पुनर्विचार करने की मांग करता है और ऐसी स्पष्टता मांगता है कि महिलाओं के लिए सभी संरक्षण और हक केवल जैविक लिंग के आधार पर ही तय होने चाहिए। डब्ल्यूडीआई इंडिया द्वारा यह अर्जी १०वीं अक्टूबर को दाखिल की गई थी, लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जज की बेंच द्वारा २८वीं अक्टूबर को इसे अन्य चुनौतियों के साथ जोड़ दिया गया था।
इस नई अर्जी में ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट की धारा ७ और १८ (डी) को गैर-संवैधानिक यानी अल्ट्रा वायर्स घोषित करने की भी मांग की गई है। धारा ७ लिंग पुष्टि की सर्जरी के बाद पुरुष या स्त्री लिंग प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया से संबंधित है, जबकि धारा १८ (डी) ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ शारीरिक, यौन, भावनात्मक, मौखिक और आर्थिक शोषण के कृत्यों के लिए छह महीने से दो साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान करती है।
शुक्रवार को एक बयान जारी करके ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमंस एसोसिएशन (एआईडब्लूए), जो एक स्वतंत्र वामपंथी झुकाव रखने वाला नारीवादी संगठन है, उसने इस अर्जी को पूरी तरह से गुमराह करने वाली करार दिया था। बयान में यह दलील दी गई है कि यह अर्जी ऐसा गलत विचार फैलाती है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता देने से सिस-जेंडर महिलाओं के साथ भेदभाव होता है और उनके अधिकार तथा स्वतंत्रताएं कमजोर होती हैं। यह अर्जी सुप्रीम कोर्ट से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उपलब्ध थोड़ा-बहुत संरक्षण वापस लेने और उनकी पहचान को मिटा देने की मांग कर रही है, जिससे वे भेदभाव और हिंसा के खिलाफ अधिक असुरक्षित बन जाते हैं।
डब्ल्यूडीआई इंडिया की अर्जी में जानकी कौशिक नामक एक ट्रांस महिला शिक्षक द्वारा कोर्ट में लाए गए केस का भी उल्लेख किया गया है। अर्जी में दलील दी गई थी कि सिस-जेंडर महिलाओं, जिन्होंने ट्रांस महिला को जैविक पुरुष कहा था, उन्हें बॉडी-शेमिंग करने वाली माना गया था और ऐसा माना गया था कि संस्था को इसे रोकना चाहिए था। अर्जी में यह दलील दी गई है कि यह मामला उनके चुप रहने के अधिकार का उल्लंघन है और यह जबरन बोलने के खिलाफ विरोध है।
जानकी कौशिक, जिन्होंने खुद दो स्कूलों में रोजगार प्राप्त करते समय लिंग आधारित भेदभाव का सामना किया था, उन्होंने डब्ल्यूडीआई की इस अर्जी के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया है क्योंकि इसमें उनके केस का संदर्भ टांका गया था। वर्ष २०२५ के अक्टूबर में कोर्ट की दो जज की बेंच ने जानकी कौशिक विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक केस में फैसला दिया था कि संघ और राज्यों की सकारात्मक जिम्मेदारी है कि वे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव रोकें। इस केस में ट्रांस व्यक्तियों की आजीविका और रोजगार के विकल्पों का अध्ययन करने के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आशा मेनन की अध्यक्षता में एक समिति का भी गठन किया गया था।
जानकी कौशिक ने अपने बयान में बताया था कि यह अर्जी मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत अपमानजनक है, क्योंकि इसमें बार-बार मुझे पुरुष के रूप में संबोधित किया गया है और 'जैविक पुरुष' जैसे घृणास्पद शब्द का उपयोग किया गया है। मेरी पहचान न तो डब्ल्यूडीआई इंडिया के व्यापार का विषय है और न ही इसके वकीलों द्वारा उस पर टिप्पणी की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद मेरे केस के फैसले में मुझे ट्रांसजेंडर महिला के रूप में स्वीकार किया है और मेरा ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र भी इसे मान्यता देता है। यह स्पष्ट है कि डब्ल्यूडीआई इंडिया और उसके वकील मेरे लिए कोई आदर नहीं रखते हैं, लेकिन यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि वे सुप्रीम कोर्ट के लिए भी कोई आदर नहीं रखते हैं।
डब्ल्यूडीआई इंडिया की अर्जी में दावा किया गया है कि लिंग पहचान और जैविक लिंग का मिश्रण सभी लोगों को लिंग पहचान में विश्वास रखने या जैविक पुरुषों को 'महिलाओं' के रूप में पहचानने के लिए मजबूर करता है, जो वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। अर्जी में जानकी कौशिक विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया केस का हवाला देकर बताया गया है कि जैविक रूप से महिला स्टाफ सदस्यों, जिन्होंने ऐसा आवाज उठाया था कि शिक्षक जैविक रूप से पुरुष है, उन्हें बॉडी-शेमिंग करने वाले के रूप में दर्शाया गया था। महिलाओं को केवल जैविक पुरुष के साथ घनिष्ठ रहने की जगहें साझा करने के लिए ही नहीं बल्कि संस्थागत मंजूरी के जोखिम पर उस व्यक्ति की स्त्री पहचान की पुष्टि करने के लिए भी कहा जाता है, जो धारा २१ के तहत महिला की गरिमा और स्वराज का सीधा उल्लंघन है।
इस मामले को लेकर जानकी कौशिक ने आगे बताया था कि यह अर्जी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मेरे केस की वास्तविकताओं को जानबूझकर विकृत करती है, क्योंकि इसमें ऐसा दर्शाया गया है कि मैंने केस के सामने वाले स्कूलों में से एक स्कूल की महिला हॉस्टल के अन्य रहने वालों की अस्वस्थता के कारण बॉडी-शेमिंग और दुर्व्यवहार का अनुभव किया था। प्रश्नगत स्कूल ने कभी ऐसी कोई दलील नहीं दी थी और न ही सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई निष्कर्ष निकाला था। मैंने स्कूलों के अन्य स्टाफ और विद्यार्थियों की तरफ से ट्रांसफोबिक दुर्व्यवहार का सामना किया था जिसके खिलाफ मैंने अर्जी दाखिल की थी, लेकिन डब्ल्यूडीआई की अर्जी ने ट्रांस महिलाओं और सिस-जेंडर महिलाओं के अधिकारों के बीच कृत्रिम संघर्ष खड़ा करने के लिए मेरे अनुभव को प्रभावी ढंग से फिर से लिखा है।
सर्वोच्च अदालत इस साल की शुरुआत में ट्रांसजेंडर पर्सन्स प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट में किए गए संशोधनों के खिलाफ राहत मांगने वाली अर्जियों के समूह पर सुनवाई कर रही है। वर्ष २०१४ में लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और नालसा सहित मुट्ठीभर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने व्यापक भेदभाव, सामाजिक कलंक और हिंसा का दावा करके सुप्रीम कोर्ट में अर्जी की थी। उस समय कोर्ट ने जिसे 'तीसरा लिंग' कहा था उसे कानूनी मान्यता दी थी और लिंग की स्व-पहचान को मौलिक अधिकार घोषित किया था।
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