जलवायु परिवर्तन के कारण भारत की खाद्य सुरक्षा खतरे में, 6 राज्यों में सूखा
खराब भंडारण व्यवस्था और अत्यधिक गर्मी के कारण देश को वार्षिक 13 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, शाम 4:10 · 4 मिनट का पाठ
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भारत की कृषि व्यवस्था वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव के अधीन है। बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं फसल उत्पादन को भारी नुकसान पहुँचा रही हैं। 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, देश को हर साल लगभग 13 अरब अमेरिकी डॉलर का खाद्य नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस नुकसान के लिए मुख्य रूप से कमजोर भंडारण क्षमता, परिवहन और कोल्ड चेन व्यवस्था जिम्मेदार है।
देश के 6 राज्यों में सूखे की घोषणा की गई है। इस स्थिति के कारण किसानों की आय, भोजन की उपलब्धता और बाजार की कीमतों पर सीधा असर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है, जिससे आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ रहा है।
'फ्रॉम रिस्क टू रेजिलिएंस: क्लाइमेट चेंज, इकोलॉजी एंड द फ्यूचर ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर' नामक रिपोर्ट में बताया गया है कि अत्यधिक गर्मी और मौसम की कठोरता के कारण फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान बढ़ा है। दिल्ली की आजादपुर मंडी इस संकट का जीवंत उदाहरण है। वर्ष 2024 भारत के लिए अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है। इस अवधि के दौरान एक फल विक्रेता को एक ही दिन में 1 लाख रुपये से अधिक का नुकसान हुआ, क्योंकि अत्यधिक गर्मी के कारण आम तेजी से खराब हो गए थे। सामान्य तौर पर दो दिनों तक टिकने वाले फल एक ही दिन में नष्ट हो गए थे।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बलयान बताती हैं कि एक तिहाई फल और सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। गर्मी का असर दूध उत्पादन पर भी पड़ रहा है और जमीन की उर्वरता बिगड़ रही है। सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के डॉ. जी.वी. रमनजनुलु के अनुसार, एक ही राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में सूखे की तीव्रता अलग हो सकती है और अनुभव बताता है कि यह संकट लंबे समय तक जारी रह सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण हर साल लगभग ₹2,661 करोड़ का दूध उत्पादन नुकसान होता है, जो लगभग 18 लाख टन दूध के बराबर है। देश की 40 प्रतिशत पशुधन आबादी मौसम की कठोरता के प्रति संवेदनशील है। खराब कोल्ड चेन व्यवस्था के कारण 40 प्रतिशत फल-सब्जियां और 5-6 प्रतिशत अनाज बर्बाद हो जाते हैं। केवल 4 प्रतिशत ताजे उत्पादों को ही कोल्ड स्टोरेज की सुविधा मिल पाती है।
सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, 20 मिलियन हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि बाढ़, सूखे और अन्य आपदाओं से प्रभावित हुई है। पिछले तीन दशकों में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग दोगुना हो गया है, जो 1990 में प्रति हेक्टेयर 73.5 किलोग्राम था, जो 2023 में बढ़कर 199 किलोग्राम हो गया है। वायु प्रदूषण के कारण फसलों को जो नुकसान हुआ है, यदि वह न हुआ होता तो उससे लगभग 9.4 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता था।
भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि क्षेत्र का योगदान 13.7 प्रतिशत है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के अनुसार, अल नीनो कमजोर मिट्टी और घटते भूजल स्तर पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है, जिसका असर बाजार और महंगाई तक पहुँच रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मौसम की भविष्यवाणी पर्याप्त नहीं है। बेहतर भंडारण, कृषि विस्तार सेवाओं, बाजार तक पहुँच और टिकाऊ खेती में निवेश आवश्यक है। जैविक खेती, फसल विविधीकरण, मौसम आधारित बीमा और पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है। पूर्व कृषि सचिव टी. नंदकुमार ने नीतिगत जोखिमों पर ध्यान देने और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की बात कही है। जलवायु वैज्ञानिकों ने सूखा प्रतिरोधी फसलों और सिंचाई सुविधाओं पर जोर दिया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि नुकसान होने के बाद मुआवजा देने के बजाय, जोखिम कम करने वाली नीतियों में निवेश किया जाना चाहिए। भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भूमि और जल संरक्षण, आधुनिक तकनीक और किसानों को समय पर सहायता प्रदान करना अनिवार्य है।
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