नागरिकों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकारा
अदालत ने याचिकाकर्ता को रिहा करने का आदेश दिया और राज्य सरकार को ₹20,000 जुर्माना भरने को कहा
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, रात 9:44 · अपडेट रात 9:52 · 3 मिनट का पाठ
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों के निरंतर उल्लंघन के लिए पुलिस प्रशासन की कड़ी आलोचना की है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने 3 नवंबर, 2026 को दिए गए आदेश में राज्य में नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति को अत्यंत शर्मनाक बताया। अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस प्रशासन संवैधानिक स्वतंत्रता के प्रति उदासीन प्रतीत होता है और ऐसा लगता है कि नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करना यूपी पुलिस के लिए एक सामान्य बात बन गई है। इस कड़ी टिप्पणी के साथ अदालत ने याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
यह पूरा मामला बिजनौर जिले के एक व्यक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के परिजनों ने आरोप लगाया था कि 5 सितंबर को नंगल पुलिस स्टेशन के बाहर से सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने इस व्यक्ति को जबरन उठा लिया था। हालांकि, पुलिस द्वारा उसकी औपचारिक गिरफ्तारी की प्रविष्टि 7 सितंबर को की गई थी, जिससे यह सामने आया कि उसे दो दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था।
जब अदालत ने इस मामले में सबूत मांगे, तो राज्य सरकार ने तर्क दिया कि सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है। सरकार के अनुसार, भारी बारिश के दौरान लैन (LAN) केबल के जरिए सिस्टम में पानी घुस गया था, जिससे सीसीटीवी सिस्टम विफल हो गया। हालांकि, हाईकोर्ट की बेंच ने इस बहाने को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अवैध हिरासत के मामलों में पुलिस सीसीटीवी खराब होने का तर्क नहीं दे सकती। अदालत ने नोट किया कि इस तरह के तर्क से अदालत यह मान सकती है कि व्यक्ति को वास्तव में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था और सच्चाई छिपाने के लिए जानबूझकर फुटेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।
पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी (SHO) द्वारा सीसीटीवी फुटेज पेश करने में विफलता पर अदालत ने गंभीर संज्ञान लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि इस संबंध में उनके सर्विस रिकॉर्ड में असंतोष दर्ज किया जाए और राज्य सरकार से उनकी वर्तमान पोस्टिंग में बने रहने पर पुनर्विचार करने को कहा है।
इसके अलावा, अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले के मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹20,000 की राशि सात दिनों के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
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