दुधारू पशुओं में कृमिनाशक दवा देने की आवृत्ति और महत्व पर मार्गदर्शन
वर्ष में कम से कम दो बार डीवर्मिंग कराने से पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन में सुधार होता है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, रात 10:10 · 4 मिनट का पाठ
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दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी दूध देने की क्षमता को प्रभावित करने वाले कारकों में पेट के कीड़े एक मुख्य कारण हो सकते हैं। अक्सर पशुपालक यह मानते हैं कि पशुओं द्वारा दूध उत्पादन में कमी या पशुओं का बार-बार बीमार पड़ना केवल चारे या बदलते मौसम के कारण होता है, लेकिन एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, इस समस्या का कारण पशुओं के पेट में मौजूद छोटे-छोटे कीड़े भी हो सकते हैं। ये कीड़े पशुओं के समग्र स्वास्थ्य को बिगाड़ते हैं और उनकी उत्पादकता में कमी लाते हैं।
यह समझना आवश्यक है कि ये कीड़े पशुओं के शरीर में कैसे प्रवेश करते हैं। विशेष रूप से मानसून के मौसम के दौरान जब पशुओं को हरा चारा दिया जाता है, तब इस हरे चारे के माध्यम से कई प्रकार के छोटे कीड़े और परजीवी पशुओं के पेट में पहुँच सकते हैं। ये परजीवी धीरे-धीरे पशु के लिवर (यकृत) और अन्य अंगों को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे पशु की स्वास्थ्य स्थिति खराब हो जाती है। इसलिए, हरा चारा देने के साथ-साथ पशुओं की नियमित निगरानी रखना अत्यंत आवश्यक है।
पेट में कीड़ों के संक्रमण से पशुओं की पाचन प्रक्रिया पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जब परजीवी पेट में घर बना लेते हैं, तो पाचन तंत्र गड़बड़ा जाता है। इसके कारण पशुओं को दस्त हो सकते हैं। यदि स्थिति अधिक गंभीर हो जाए, तो दस्त के साथ खून भी आ सकता है, जो पशु के स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा है। इस प्रक्रिया के दौरान पशु के शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और पशु धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
इन स्वास्थ्य समस्याओं का सीधा असर दूध के उत्पादन पर देखा जाता है। पेट में कीड़ों के कारण और शरीर में खून की कमी होने से पशु की शारीरिक क्षमता घट जाती है। परिणामस्वरूप, पशु पहले की तुलना में कम दूध देने लगता है। इस प्रकार, दूध उत्पादन में कमी के पीछे एक मुख्य कारण पेट के कीड़े हो सकते हैं, जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
इस समस्या के निवारण के लिए 'डीवर्मिंग' यानी पेट के कीड़े मारने की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है। एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, दुधारू पशुओं को वर्ष में कम से कम दो बार डीवर्मिंग की दवा देना अनिवार्य है। नियमित अंतराल पर डीवर्मिंग कराने से पशुओं के पेट में मौजूद हानिकारक कीड़ों का नाश होता है, जिससे पशु का पाचन सुधरता है और उनकी दूध देने की क्षमता पुनः स्थापित होती है।
कृमिनाशक दवाओं के उपयोग के संबंध में अलग-अलग पशुओं के लिए अलग-अलग दवाएं सुझाई गई हैं। बकरों के लिए फेनबेंडाजोल (Fenbendazole) और अल्बेंडाजोल (Albendazole) जैसी दवाओं का उपयोग किया जाता है। जबकि बड़े पशुओं के लिए ऑक्सीक्लोज़ेनाइड (Oxyclozanide) जैसी दवाओं की सलाह दी गई है। हालांकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी दवा देने से पहले पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। दवा का चयन और उसकी मात्रा पशु की उम्र, उसके वजन और उसकी वर्तमान स्थिति के आधार पर पशु चिकित्सक द्वारा ही तय की जानी चाहिए।
अक्सर पशुपालक डीवर्मिंग की प्रक्रिया में लापरवाही बरतते हैं और दवा देना भूल जाते हैं। ऐसी लापरवाही का नुकसान लंबे समय में पशु के स्वास्थ्य और दूध के उत्पादन में कमी के रूप में सामने आता है। इसलिए, पशुपालकों को समय पर पशु चिकित्सक से जांच करानी चाहिए और उनकी सलाह के अनुसार डीवर्मिंग का समय-सारणी तय कर उसका सख्ती से पालन करना चाहिए।
समय पर डीवर्मिंग कराने से पशुओं के बीमार पड़ने की संभावना कम हो जाती है और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। विशेष रूप से मानसून जैसे मौसमों में जब जोखिम अधिक होता है, तब अधिक सावधानी रखना जरूरी है। पशुओं की नियमित जांच और उचित दवाओं के उपयोग से पशुपालक अपने पशुओं के स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं और दूध के उत्पादन में होने वाली कमी को रोक सकते हैं।
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