वेदांता लवाद के फैसलों को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश
विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू करने में अड़चन पैदा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की खिंचाई की।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, रात 8:07 · अपडेट रात 11:58 · 5 मिनट का पाठ
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द हिंदू के रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार यानी २ नवंबर २०२६ के दिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अर्जी खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ केंद्र की अर्जी खारिज की है जिसमें माइनिंग क्षेत्र की दिग्गज कंपनी वेदांता लिमिटेड और रवा ऑयल (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड को लगभग ९९ मिलियन डॉलर के दावों से जुड़े विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू करने की अनुमति दी गई थी। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने मध्यस्थता फैसलों के क्रियान्वयन के खिलाफ सरकार द्वारा लगातार विरोध किए जाने पर सवाल उठाए थे और चेतावनी दी थी कि इस तरह के दिखावे या देरी से अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए पसंद के स्थल के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने सरकार की दलीलों पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए यह नोट किया था कि मध्यस्थता फैसले को इस चरण पर यानी क्रियान्वयन के चरण पर इस तरह से क्यों विफल किया जा रहा है। बेंच ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की थी कि अगर इस प्रकार की कार्रवाई होगी तो कोई भी व्यक्ति आप पर भरोसा नहीं करेगा। बेंच ने इस विवाद के लंबे इतिहास का भी संज्ञान लिया था और स्पष्ट किया था कि पहला मध्यस्थता फैसला २००४ में आया था, जबकि आखिरी फैसला २०१६ में आया था। कोर्ट ने अंत में दिल्ली हाईकोर्ट के १ जुलाई के उस फैसले में दखल देने से साफ इनकार कर दिया था जिसमें फैसले के क्रियान्वयन के खिलाफ केंद्र की आपत्तियां खारिज कर दी गई थीं। ये फैसले मलेशिया के कुआलालंपुर स्थित मध्यस्थता ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए थे।
द हिंदू के रिपोर्ट के अनुसार, बेंच ने स्पष्ट किया था कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश और फैसले में कानून की कोई भी गलती नहीं की है और इसलिए यह अपील खारिज की जाती है। यह पूरा विवाद १९९४ के प्रोडक्शन-शेरिंग अनुबंध से जुड़ा हुआ है, जो कृष्णा-गोदावरी बेसिन में रवा ऑयलफील्ड के विकास के लिए किया गया था। यह अनुबंध केंद्र सरकार और ओएनजीसी, वीडियोकॉन पेट्रोलियम, रवा ऑयल तथा केर्न एनर्जी के कंसोर्टियम के बीच हस्ताक्षरित किया गया था। समय के साथ केर्न एनर्जी का इस प्रोजेक्ट में हिस्सा केर्न इंडिया और उसके बाद वेदांता को मिला था।
द हिंदू के बताए अनुसार, इस पूरे विवाद की जड़ इस बात पर थी कि ऑयल उत्पादन से कंपनियों के हिस्से की आय की गणना करते समय ओएनजीसी द्वारा पहले ऑयलफील्ड के विकास के पीछे किए गए खर्चों का भुगतान का हिसाब कैसे रखा जाए। यह मामला मलेशियाई कानून और यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड लॉ यानी युनिट्रल मध्यस्थता नियमों के तहत कुआलालंपुर में लवाद में भेजा गया था। अक्टूबर २००४ में मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने आंशिक फैसला दिया था, जिसमें ६ प्रश्नों में से २ प्रश्न कंपनियों के पक्ष में और ४ प्रश्न सरकार के पक्ष में तय किए थे, जबकि ओएनजीसी के पिछले खर्च पेटे चुकाने योग्य रकम बाद में तय करना छोड़ दिया था।
द हिंदू के रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने मलेशिया में इस फैसले को चुनौती दी थी। हालांकि २००९ में कुआलालंपुर हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था, लेकिन अपील पर यह निर्णय पलट दिया गया था और २०११ में मलेशिया की फेडरल कोर्ट ने यह फैसला मान्य रखा था। इसके बाद २०१४ में सरकार ने वेदांता से लगभग ६४ मिलियन डॉलर और रवा ऑयल से ३५ मिलियन डॉलर वसूलने का प्रयास किया था। कंपनियों ने इन मांगों पर आपत्ति जताई और फिर से मध्यस्थता के समक्ष पहुंची थी। इस प्रक्रिया में पुनर्गठित ट्रिब्यूनल ने अक्टूबर २०१६ में अपना आखिरी फैसला दिया था। केंद्र सरकार ने फिर से इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन फरवरी २०१९ में मलेशिया की फेडरल कोर्ट ने इसे भी मान्य रखा था।
द हिंदू के बताए अनुसार, इसके बाद वेदांता और रवा ऑयल ने भारत में इन फैसलों के क्रियान्वयन के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। केंद्र सरकार ने सीमा कानून, सार्वजनिक नीति और पिछला फैसला देने के बाद ट्रिब्यूनल फंक्टस ऑफिसियो हो गई होने जैसे विभिन्न आधार पर इस अर्जी का विरोध किया था। जुलाई महीने में हाईकोर्ट ने ये तमाम आपत्तियां खारिज कर दी थीं और स्पष्ट किया था कि क्रियान्वयन की कार्रवाई का उपयोग अंतर्गत विवाद को फिर से खोलने या ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों पर पुनर्विचार करने के लिए नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह भी बताया था कि यह कार्रवाई सीमा अवधि के अंदर ही है और इसके साथ कंपनियों की बैंक गारंटी आठ हफ्तों में मुक्त करने का आदेश दिया था।
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