ईडी 'सुपर कॉप' बनकर पीएमएलए की सीमा से बाहर काम नहीं कर सकती: कर्नाटक उच्च न्यायालय
अदालत ने कांग्रेस विधायक के.वाई. नंजेगौड़ा और अन्य के खिलाफ ईसीआईआर और कार्यवाही रद्द की।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, दोपहर 3:07 · अपडेट शाम 4:59 · 3 मिनट का पाठ
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एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शक्तियों के संबंध में एक स्पष्ट रेखा खींचते हुए कहा है कि यह जांच एजेंसी "किसी भी मामले की जांच करने के लिए सुपर कॉप नहीं है" और वह मनी लॉन्ड्रिंग जांच की नींव खुद खड़ी करने के लिए वैधानिक ढांचे को दरकिनार नहीं कर सकती। अदालत ने फैसला सुनाया है कि ईडी को, एक सामान्य निजी व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत उसे स्पष्ट रूप से दी गई शक्तियों का ही उपयोग करना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ईडी की शक्ति "व्युत्पन्न (डेरिवेटिव) है और मौलिक नहीं है"।
न्यायाधीश एम.आई. अरुण ने कर्नाटक कांग्रेस के विधायक के.वाई. नंजेगौड़ा और उनसे जुड़े अन्य लोगों सहित कई याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ईडी द्वारा शुरू की गई ईसीआईआर और परिणामी कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने एजेंसी द्वारा दायर निजी शिकायत से उत्पन्न कार्यवाही को भी दरकिनार कर दिया है। इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने पीएमएलए अथॉरिटी के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें संपत्ति जब्त करने की पुष्टि की गई थी और याचिकाकर्ताओं में से एक से जब्त की गई वस्तुओं को वापस करने का निर्देश भी दिया है।
यह फैसला कोलार-चिक्काबल्लापुर डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड (कोमुल) में कर्मचारियों की भर्ती के आरोपों से जुड़ी ईडी की जांच से उत्पन्न याचिकाओं पर आया था। कांग्रेस विधायक के.वाई. नंजेगौड़ा से जुड़े याचिकाकर्ताओं सहित कुछ पक्षों की ओर से अधिवक्ता मयंक जैन ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने ईसीआईआर, पीएमएलए के तहत परिणामी कार्यवाही और ईडी द्वारा दायर निजी शिकायत को चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध के लिए कार्यवाही निर्धारित अपराध की वैधानिक आवश्यकता के बिना स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकती। वकील मयंक जैन द्वारा प्रस्तुत दलीलों पर गौर करते हुए, अदालत ने कहा कि पीएमएलए के तहत ईडी की भूमिका तब शुरू होती है जब कोई प्राथमिक कानून प्रवर्तन एजेंसी अनुसूचित अपराध के संबंध में एफआईआर या औपचारिक आपराधिक शिकायत दर्ज करे।
अदालत ने कहा कि ईडी की शक्ति "व्युत्पन्न है और मौलिक नहीं है", और एजेंसी केवल मनी लॉन्ड्रिंग के स्वतंत्र संदेह के आधार पर अपनी मर्जी से (सुओ मोटो) जांच शुरू नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब पीएमएलए के तहत नींव या अनुसूचित अपराध अस्तित्व में न रहे, तो उस कानून के तहत कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
इस प्रकार, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ईडी की शक्तियों के दायरे को स्पष्ट करते हुए जांच एजेंसी की सीमाएं तय कर दी हैं और पीड़ितों को राहत देते हुए मामले से संबंधित कार्यवाही रद्द कर दी है।
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