त्योहारों में बढ़ते हवाई किराए को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार
एयरलाइंस द्वारा लिए जाने वाले अत्यधिक ऊंचे किराए के खिलाफ याचिका पर कोर्ट ने कहा, 'हवाई मार्ग से यात्रा न करें'
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
3 नवंबर 2026, सुबह 7:42 · अपडेट सुबह 7:50 · 4 मिनट का पाठ
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त्योहारों के दौरान एयरलाइंस द्वारा लिए जाने वाले अत्यधिक ऊंचे किराए के संबंध में चिंता व्यक्त करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपालेश सिंह की खंडपीठ के समक्ष यह मामला रखा गया था, जिस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता से संक्षेप में कहा, 'हवाई मार्ग से यात्रा न करें'।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि एविएशन किराए में 700 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। याचिका में बताया गया था कि इस मामले की सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित की गई है, लेकिन तब तक दिवाली और छठ पूजा जैसे बड़े त्योहार समाप्त हो चुके होंगे। इसलिए, याचिकाकर्ता ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध किया था।
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मी नारायणन द्वारा पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका से जुड़ा है। उन्होंने तर्क दिया था कि एयरलाइंस त्योहारों के सीजन के दौरान बहुत अधिक किराया वसूलती हैं। इसी वर्ष जनवरी में इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एयरलाइंस द्वारा लिए जाने वाले ऊंचे किराए को 'शोषण' करार दिया था। कोर्ट ने तब टिप्पणी की थी कि, 'हम निश्चित रूप से हस्तक्षेप करेंगे। कुंभ मेला और अन्य त्योहारों के दौरान होने वाले शोषण को देखें। देखें कि दिल्ली से प्रयागराज और जोधपुर का किराया सामान्य से तीन गुना है।'
इससे पहले 15 मई को हुई सुनवाई में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सरकार को कहा था कि एयरलाइन टिकट की कीमतों में युक्तिकरण लाने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार और निदेशालय सामान्य नागरिक उड्डयन (DGCA) की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि सरकार नए भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत नियम बनाने पर काम कर रही है। हालांकि, खंडपीठ ने यात्रियों को तत्काल राहत देने की आवश्यकता पर जोर दिया था। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि, 'लोगों को थोड़ी राहत देने का प्रयास करें... एक ही दिन में, एक ही रूट के लिए... एक एयरलाइन इकोनॉमी क्लास के लिए ₹ 8,000 लेती है, जबकि दूसरी एयरलाइन ₹ 18,000 लेती है।'
एस. लक्ष्मी नारायणन की हालिया याचिका में मीडिया रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें दिखाया गया है कि देश के कई प्रमुख आंतरिक मार्गों पर हवाई किराया सामान्य दर से दो से सात गुना बढ़ गया है। एयरलाइंस द्वारा इस बढ़ते किराए के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की बढ़ती कीमतों को जिम्मेदार ठहराया गया है, जो उनके परिचालन खर्च को प्रभावित करती हैं। हालांकि, याचिका में यह तर्क दिया गया था कि भले ही ऐसे कारकों के कारण टिकट की कीमतों में थोड़ी वृद्धि उचित हो सकती है, लेकिन उसके आधार पर किराए को सामान्य दर से सात गुना बढ़ाना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि हवाई परिवहन एक आवश्यक सेवा है और इस तरह मूल्य वृद्धि करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है। वकील ने आगे कहा, 'कोई भी अन्य आवश्यक सेवा इस तरह कीमत निर्धारित नहीं करती है। रेलवे के फ्लेक्सी-फेयर को मूल किराए के डेढ़ गुना तक सीमित रखा जाता है, आवश्यक दवाओं की कीमतें ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 के तहत सीमित हैं, और बिजली के टैरिफ रेगुलेटरी कमीशन द्वारा तय किए जाते हैं। हवाई यात्रा एकमात्र अपवाद नहीं हो सकती।'
याचिकाकर्ता ने यह भी ध्यान दिलाया कि 'एसेंशियल सर्विसेज मेंटेनेंस एक्ट, 1981 के तहत हवाई परिवहन एक आवश्यक सेवा है'। उन्होंने तर्क दिया कि, 'जिस सेवा की निरंतरता बनाए रखने के लिए राज्य उसे आवश्यक सेवा मानता है, उसकी कीमत के मामले में उसे पूरी तरह से अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इससे उस सेवा को प्राप्त करने वाली जनता को नुकसान होता है।'
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में तत्काल सुनवाई करने से मना कर दिया है, जिससे त्योहारों के दौरान यात्रियों को महंगे हवाई किराए के खिलाफ तत्काल कानूनी राहत मिलने की संभावना फिलहाल कम नजर आती है।
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