यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस २०२६ असंतुलित हैं, आरएसएस की सरकार से न्यायसंगत निर्णय लेने की विनंती
यूजीसी के नए नियमों को लेकर आरएसएस ने चिंता जताई, सामाजिक एकता बनाए रखने का आग्रह किया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, सुबह 3:42 · 4 मिनट का पाठ
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा जारी किए गए इक्विटी रेगुलेशंस, २०२६ के प्रावधानों को "असंतुलित" करार दिया है। संघ ने केंद्र सरकार से विनंती की है कि इन नियमों को लेकर किए जाने वाले किसी भी फेरबदल या निर्णयों में न्यायसंगतता और सामाजिक सौहार्द बना रहे यह सुनिश्चित किया जाए।
आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर के अनुसार, संस्था ने इन नियमों को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में अधिकारियों को पहले ही अवगत करा दिया है। उन्होंने जोड़ा कि सरकार और यूजीसी दोनों ने इन आपत्तियों पर ध्यान दिया है। वर्तमान में यह मामला न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी है।
सुनील आंबेकर ने स्पष्ट करते हुए कहा कि, संघ ने अपना रुख स्पष्ट किया है कि यूजीसी का परिपत्र असंतुलित था। यह चिंता अधिकारियों के ध्यान में लाई गई थी और सरकार तथा यूजीसी दोनों ने इसे ध्यान में रखा है। कोर्ट ने भी इन नियमों पर रोक लगा दी है और फिलहाल यह मामला अदालत में लंबित है।
आंबेकर ने आगे बताया कि, आरएसएस का मानना है कि भविष्य में इस मुद्दे पर लिया जाने वाला कोई भी निर्णय संतुलित होना चाहिए। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि अंतिम ढांचा न्यायसंगत हो यह देखा जाए। उन्होंने कहा कि, भविष्य में जो कुछ भी हो वह संतुलित होना चाहिए और सरकार तथा कोर्ट को भी इस बात को उसी दिशा में ले जाना चाहिए।
सामाजिक संबंधों पर इस विवाद का असर न पड़े, इस बात को लेकर भी आंबेकर ने आगाह किया था। उन्होंने कहा कि, सरकार के केवल एक ही परिपत्र के कारण पैदा हुए विवाद के कारण सामाजिक संबंध बिगड़ने नहीं चाहिए। समाज की एकता बनाए रखना एक बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने आगे जोड़ा कि, समाज को एक परिपत्र के लिए अपनी सामाजिक एकता को खतरे में नहीं डालना चाहिए। हमें अपने समाज को मजबूत रखना चाहिए। यदि हम साथ रहेंगे, तो मुझे लगता है कि इस तरह की समस्याओं के समाधान भी निकलेंगे।
यूजीसी के २०२६ के इन नियमों को लेकर फिलहाल चर्चा चल रही है। उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए इन नियमों को पेश किया गया था, लेकिन भेदभाव की परिभाषा और उसमें आने वाले छात्रों के वर्गों को किस तरह से तय किया गया है, इस बात को लेकर विरोध और आपत्तियां उठी हैं।
यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस, २०२६ को १३ जनवरी के दिन जारी किया गया था। इस प्रक्रिया की शुरुआत २०१९ में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई एक जनहित याचिका के जरिए हुई थी। यह याचिका रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं, राधिका वेमुला और अबेदा सलीम तडवी द्वारा की गई थी।
रोहित वेमुला और पायल तडवी दोनों ने अपनी-अपनी यूनिवर्सिटी में जाति आधारित भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली थी। उनके परिवारों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में जातिगत भेदभाव को रोकने और इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस याचिका के परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा में भेदभाव के खिलाफ मौजूदा सुरक्षात्मक उपायों की जांच की गई थी।
वर्ष २०२५ की शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वे इस तरह की घटनाओं का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए "बहुत मजबूत और सटीक तंत्र" चाहते हैं। जब यूजीसी अपने नियमों का ड्राफ्ट तैयार कर रही थी, तब कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और अन्य हितधारकों को अपने सुझाव पेश करने की अनुमति भी दी थी।
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