पोलैंड में संवैधानिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष को निलंबित करने के निर्णय के खिलाफ भारी विरोध
राष्ट्रपति कारोल नावरोकी सेनेगल की यात्रा अधूरी छोड़कर वॉर्सा लौटे और आपातकालीन बैठक बुलाई
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
31 अक्टूबर 2026, रात 8:39 · अपडेट रात 9:43 · 5 मिनट का पाठ
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पोलैंड में संवैधानिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान स्वेचकोवस्की को निलंबित करने के निर्णय के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता और भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। यह विवाद इतना बढ़ गया है कि राष्ट्रपति कारोल नावरोकी ने सेनेगल की अपनी विदेश यात्रा बीच में ही छोड़कर तत्काल वॉर्सा वापस लौटने का निर्णय लिया है। इस दौरान ट्रिब्यूनल के मुख्यालय के बाहर पुलिस तैनात की गई है और विरोध प्रदर्शनकारियों द्वारा सरकार पर 'प्राकृतिक तख्तापलट' (कूप) करने का आरोप लगाया जा रहा है।
NDTV के रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरी संकट तब शुरू हुई जब संवैधानिक ट्रिब्यूनल के एक सहकर्मी जज द्वारा दो वरिष्ठ न्यायाधीशों को निलंबित कर दिया गया था। जज एना कोर्विन-पियोट्रोवस्का ने ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान स्वेचकोवस्की और वाइस प्रेसिडेंट बार्टलोमिय सोचानस्की को उनके कर्तव्यों से निलंबित करने का आदेश जारी किया था। कोर्विन-पियोट्रोवस्का ने इन दोनों न्यायाधीशों पर आरोप लगाया था कि वे संसदीय बहुमत द्वारा चुने गए न्यायाधीशों के काम में बाधा डाल रहे हैं, न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन कर रहे हैं और अदालत को ठीक से काम करने से रोक रहे हैं।
इस आदेश के खिलाफ ट्रिब्यूनल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रिब्यूनल ने अपनी वेबसाइट पर स्पष्ट किया है कि अध्यक्ष बोगदान स्वेचकोवस्की और वाइस प्रेसिडेंट बार्टलोमिय सोचानस्की अभी भी अपने पदों पर ही हैं। ट्रिब्यूनल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा है कि, "इन गतिविधियों में भाग लेने वाले सभी व्यक्ति तख्तापलट का अपराध कर रहे हैं।" रिपोर्टों के अनुसार, सरकार इन दोनों न्यायाधीशों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने की तैयारी भी कर रही है।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रिब्यूनल के मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन बहुत ही तीव्र था। विपक्षी दक्षिणपंथी पार्टी 'लॉ एंड जस्टिस पार्टी' (PiS) के समर्थक बाहर एकत्र हुए थे। पुलिस के दर्जनों अधिकारियों ने इमारत की रक्षा की। कुछ प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ने का प्रयास किया, जबकि अन्य लोग "तुस्क देशद्रोही है" के नारे लगा रहे थे। इस दौरान पुलिस द्वारा तीन प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किए जाने की भी खबर है।
राष्ट्रपति कारोल नावरोकी ने X पर लिखा था कि, "ऐसे समय में, राष्ट्रपति को पोलैंड में होना चाहिए।" उन्होंने इस घटना को "आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा" बताया है और शनिवार को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ तत्काल चर्चा करने का निर्णय लिया है। वे सुप्रीम कोर्ट के पहले प्रमुख ज़्बिएग्नेव कापिंस्की के साथ भी मुलाकात करने की संभावना रखते हैं।
यह विवाद मूल रूप से प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और पिछली PiS प्रशासन के बीच के पुराने विवाद को फिर से चर्चा में ले आया है। इस विवाद की शुरुआत २०१५ में हुई थी जब दक्षिणपंथी लॉ एंड जस्टिस पार्टी सत्ता में आई थी। उस समय PiS के संसदीय बहुमत ने संवैधानिक ट्रिब्यूनल में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कदम उठाए थे। ये नियुक्तियां विवादास्पद बन गई थीं क्योंकि PiS बहुमत ने ऐसे तीन न्यायाधीशों की नियुक्ति की थी जिनके पद पिछली संसद द्वारा पहले ही भर दिए गए थे। इसके कारण अदालत की नियुक्तियों की वैधता और उसकी स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े हुए थे।
यूरोपियन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स और यूरोपियन यूनियन की कोर्ट ऑफ़ जस्टिस द्वारा बाद में ऐसा फैसला दिया गया था कि इन तीनों न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुचित तरीके से की गई थी। यूरोपीय अदालतों ने यह भी ठहराया था कि पोलैंड की संवैधानिक ट्रिब्यूनल को अब "स्वतंत्र और निष्पक्ष ट्रिब्यूनल" के रूप में नहीं माना जा सकता है। २०२३ में सत्ता में आने के बाद, प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने कानून का शासन पुनर्जीवित करने और पिछली PiS सरकार के तहत न्यायपालिका में किए गए परिवर्तनों को उलटने का वादा किया था।
तुस्क सरकार की दलीलें हैं कि पिछली सरकार ने अदालतों और न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की पद्धति बदलकर न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर कर दिया था। तुस्क सरकार ने यूरोपीय अदालत के फैसलों का उपयोग संवैधानिक ट्रिब्यूनल की वैधता को चुनौती देने के लिए किया है और ट्रिब्यूनल के फैसलों को प्रकाशित करना भी बंद कर दिया है। दूसरी ओर, नावरोकी और उनके पूर्ववर्ती एंड्रेज़ डूडा ने तुस्क के प्रस्तावित सुधारों को रोकने के लिए अपने राष्ट्रपति के वीटो पावर का उपयोग किया है। इसके कारण सरकार न्यायिक सुधार करने के लिए संघर्ष कर रही है।
प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने X पर लिखा था कि, "कानून का शासन बहाल करना हमारा कर्तव्य है।" उन्होंने आगे जोड़ा था कि, "PiS के नेतृत्व के वर्षों के कानूनी अराजकता के बाद, यह एक कठिन प्रक्रिया है, जो कभी-कभी दर्दनाक भी होती है और इसके लिए निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है। दूसरा कोई रास्ता नहीं है।" तुस्क सरकार पिछले कुछ हफ्तों से अदालत के ऐसे न्यायाधीशों को हटाने का प्रयास कर रही है जिनकी नियुक्ति २०१५ से २०२३ के दौरान शासन करने वाली PiS सरकार द्वारा की गई थी। यह अदालत बार-बार यूरोपीय यूनियन के कानूनों पर पोलैंड के कानूनों को प्राथमिकता देती थी, जिसके कारण यूरोपीय यूनियन ने पोलैंड की सर्वोच्च अदालत पर उस समय की राष्ट्रवादी राजनीतिक सत्ता के बहुत करीब होने का आरोप लगाया था।
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