दवाओं के भाव में बड़ा अंतर: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए
दवा उत्पादकों को मददगार साबित होने वाली पूरी व्यवस्था और कैंसर की दवाओं के आसमान छूते दामों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सरकार पर फटकार
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
29 अक्टूबर 2026, शाम 6:34 · 4 मिनट का पाठ
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दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और खुदरा विक्रेताओं को मिलने वाली कीमतों के बीच के भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़े शब्दों में फटकार लगाई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पूछा कि ऐसा क्यों लगता है कि पूरी व्यवस्था दवा निर्माताओं की मदद कर रही है? कोर्ट ने दवाओं के दामों पर नियंत्रण न रखने के लिए नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को निष्क्रिय करार दिया। अदालत ने सवाल किया कि सरकार की नजरों के सामने यह सब हो रहा है, तो क्या इसे इस तरह बेलगाम चलने देना चाहिए?
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुद्दे पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट ने गौर किया कि कई दवाओं की लागत कीमत मात्र १०-२० रुपये होती है, जो खुदरा विक्रेता को ३० रुपये में मिलती है, लेकिन उसकी MRP १५०-२०૦ रुपये छपी होती है। यह बड़ा अंतर कोर्ट को चिंताजनक लगा है। भारत में अस्पताल में भर्ती होने पर होने वाले कुल खर्च में दवाओं का बड़ा हिस्सा होता है। ग्रामीण इलाकों में कुल इलाज खर्च का १९% और शहरी इलाकों में १५% खर्च दवाओं के पीछे होता है, यानी औसतन कुल खर्च का १७% दवाओं के पीछे खर्च होता है।
कैंसर की दवाओं के दामों को लेकर भी कोर्ट ने भारी नाराजगी जताई थी। टीवी९ गुजराती की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने एक चौंकाने वाला उदाहरण देते हुए कहा कि जिस कीमोथेरेपी इंजेक्शन की मूल कीमत ₹११,००० है, उसे निजी अस्पताल ₹१.१૦ लाख से लेकर ₹१.३० लाख तक में बेचते हैं। इससे पहले २९ सितंबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ₹२,७०० की कैंसर की दवा पर ₹२७,००० की MRP होने पर सवाल उठाते हुए इसे 'नरसंहार' समान करार दिया था। कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि यह तो दिन दहाड़े लूट है; क्या सरकार लोगों के लिए है?
केंद्र सरकार की ओर से पेश अडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि सरकार की नीति के मुताबिक पूरा इकोसिस्टम नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। उन्होंने दलील दी कि भारत में दवाओं के दाम दुनिया में सबसे कम हैं और सरकार को दवाओं की सस्ती उपलब्धता तथा फार्मा उद्योग के व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। हालांकि, कोर्ट ने इन दलील पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ये बदलाव मनमाने हैं क्योंकि वे ₹११,००० से ₹१,३०,००० तक के भारी-भरकम कीमत के अंतर को दूर करने में विफल रहे हैं।
कैंसर की दवाओं के 'ट्रेड मार्जिन' को लेकर केंद्र ने बताया था कि उन्होंने एंटी-कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को MRP के ३०% तक सीमित करने का महत्वपूर्ण फैसला लिया है। केंद्र के मुताबिक, इस फैसले से मरीजों को सालाना अनुमानित ₹२,५०० करोड़ की बचत होने की उम्मीद है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने १२ अक्टूबर की सुनवाई में कहा था कि केंद्र का यह जवाब संतोषजनक नहीं है और सरकार ने अन्य दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर सीमा क्यों नहीं लगाई, इसे लेकर सवाल किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया है कि ९०% दवाएं 'ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' (DPCO) के दायरे से बाहर हैं। DPCO के तहत 'नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिंस' (NLEM) में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत सरकार तय करती है, लेकिन जो दवाएं इस सूची में नहीं हैं, उन पर सरकार का सीधा नियंत्रण कम होता है। अदालत ने आगे कहा कि सरकार 'आयुष्मान भारत' जैसी योजनाओं के तहत ₹५ लाख तक का खर्च पूरा करती है, लेकिन दवाओं की इस अंधी मुनाफाखोरी के कारण आर्थिक बोझ आम मरीज और उसके परिवार पर ही आता है। दवा कंपनियों से ₹८,००० करोड़ की वसूली अभी भी पेंडिंग है, ऐसा भी नोट किया गया। कोर्ट ने सभी पक्षों को दो हफ्तों में लिखित दलील दाखिल करने का आदेश दिया है।
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