सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल, पंजाब और हरियाणा के बीच दशकों पुराने बिजली विवाद को सुलझाया
आने वाले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 1:13 · अपडेट शाम 4:16 · 4 मिनट का पाठ
यह समाचार AI ने नीचे दिए स्रोतों से लिखा है; इसका हर दावा और आँकड़ा उन स्रोतों से मिलाकर ही प्रकाशित किया गया है। हम कैसे जाँचते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के बीच दशकों से चले आ रहे बिजली वितरण विवाद का अंत कर दिया है। भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली के बकाया के संबंध में इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अंतिम निर्णय दिया है। कोर्ट ने तय किया है कि अगले 20 वर्षों की अवधि के दौरान पंजाब और हरियाणा राज्य हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट (एमयू) बिजली उपलब्ध कराएंगे।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहनन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत कैशलेस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है, जिसके अनुसार बकाया राशि का भुगतान नकद के बजाय बिजली के रूप में किया जाएगा। यह व्यवस्था 2011 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर आधारित है, जिसमें 1966 से भाखड़ा-नांगल और ब्यास हाइड्रो परियोजनाओं के बिजली बकाया को हिमाचल प्रदेश के पक्ष में 7.19% की दर से निर्धारित किया गया था।
इस विवाद में सबसे बड़ा मुद्दा बिजली वितरण की समयसीमा का था। आजतक और द हिंदू की रिपोर्टों के अनुसार, तीनों पक्षों के बीच समय अवधि को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। हिमाचल प्रदेश की मांग थी कि उसे मिलने वाली बिजली का पूरा हिस्सा 10 वर्ष के भीतर पूरा किया जाए। दूसरी ओर, पंजाब सरकार ने शुरू में केंद्र के 15 वर्ष के प्रस्ताव का विरोध किया था और बाद में इस योजना के कार्यान्वयन के लिए 30 वर्ष का समय मांगा था। इस बीच, अटॉर्नी जनरल ने 15 वर्ष की समय अवधि का सुझाव दिया था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मध्यम मार्ग अपनाते हुए 20 वर्ष की समय अवधि तय की है, ताकि हिमाचल प्रदेश को उसका निर्धारित हिस्सा चरणबद्ध तरीके से मिल सके।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा की गई मूल गणना के अनुसार, हिमाचल प्रदेश का बिजली हिस्सा 13,066 मिलियन यूनिट आंका गया था। हालांकि, अब आपसी विवादों को सुलझाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 वर्षों में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली की आपूर्ति व्यवस्था पूरी करने का मार्ग प्रशस्त किया है। इस समझौते में बांधों के निर्माण के दौरान हुए ऐतिहासिक पूंजीगत व्यय के समायोजन के लिए ₹420 करोड़ की राशि को भी शामिल किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह व्यवस्था नकद भुगतान पर आधारित नहीं है, बल्कि बिजली के हिस्से के माध्यम से ही इसका समायोजन किया जाएगा, जिसके कारण हिमाचल प्रदेश को पंजाब या हरियाणा को कोई राशि नहीं चुकानी होगी।
2011 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार, बिजली के हिस्से का विभाजन स्पष्ट किया गया था। इसमें हिमाचल प्रदेश का हिस्सा 7.19% निर्धारित किया गया था, जबकि पंजाब का हिस्सा 51.80% और हरियाणा का हिस्सा 37.51% तय किया गया था। इसके अलावा, चंडीगढ़ का हिस्सा 3.50% निर्धारित किया गया था, जबकि राजस्थान के हिस्से में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ था। 2011 के इस निर्णय के अनुसार, हिमाचल प्रदेश को 1 नवंबर 1966 से भाखड़ा परियोजना में, नवंबर 1977 से देहर परियोजना में और जनवरी 1978 से पोंग बांध परियोजना में हिस्सा मिलना तय हुआ था।
भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाएं उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय जल और बिजली परियोजनाओं में गिनी जाती हैं। इन परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न बिजली के वितरण को लेकर संबंधित राज्यों के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही थी। हिमाचल प्रदेश का दावा था कि इन परियोजनाओं में उसका हिस्सा 7.19 प्रतिशत है। सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया फैसले से अब बिजली के हिस्से और उसके समायोजन से जुड़े सभी विवादों का निपटारा हो गया है।
आने वाले 20 वर्षों में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलने से हिमाचल प्रदेश को अपने निर्धारित हिस्से का लाभ मिलेगा और राज्य की ऊर्जा आवश्यकताओं में मदद मिलेगी। इस फैसले से पंजाब और हरियाणा की जिम्मेदारी स्पष्ट हो गई है और केंद्र सरकार के कैशलेस प्रस्ताव के कार्यान्वयन से वित्तीय जटिलताएं टल गई हैं। इस प्रकार, दशकों से चली आ रही कानूनी लड़ाई का अंत हुआ है और तीनों राज्यों के बीच बिजली वितरण का फॉर्मूला तय कर लिया गया है।
ખ્રિસ્તી સમુદાયના હુમલાઓના મુદ્દે આરએસએસ નેતા સાથે બેઠક યોજાઈ
બંગિયા ક્રિસ્તીય પરિસેબાના પ્રતિનિધિઓએ ચર્ચ અને પ્રાર્થના સભાઓ પર થયેલા હુમલાઓ અંગે ચિંતા વ્યક્ત કરી
स्कूलों में शौचालय की सुविधा के अभाव का बेटियों की शिक्षा पर बुरा असर
स्वच्छ और निजी शौचालय न होने के कारण मासिक धर्म के दौरान लड़कियां स्कूल जाने से बचती हैं।
यूपी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और आरएसएस बूथ स्तर पर आएंगे साथ
मिशन-2027 के तहत संयुक्त टीमों द्वारा घर-घर जाकर जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा