UPI पर MDR शुल्क लगाने के फैसले का केंद्र सरकार ने किया बचाव
सरकार ने कोर्ट में बताया कि व्यापारियों को यह भरोसा नहीं दिया गया था कि UPI सेवा हमेशा मुफ्त रहेगी
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 4:41 · 3 मिनट का पाठ
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यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के माध्यम से किए जाने वाले ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लगाने के प्रस्ताव को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। गुरुवार को कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने इस फैसले का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि व्यापारियों को कभी ऐसा आश्वासन नहीं दिया गया था कि UPI भुगतान की सुविधा हमेशा के लिए बिना किसी शुल्क के उपलब्ध रहेगी।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि यह नई MDR व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता की संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरती है। सरकार के अनुसार, MDR का यह ढांचा वित्तीय समावेशन (financial inclusion), सस्ते डिजिटल भुगतान और देश के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
सरकार ने अपने जवाब में आगे स्पष्ट किया कि संशोधित MDR व्यवस्था पर काफी समय से विचार किया जा रहा था। इस अंतिम ढांचे को विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श के बाद ही तैयार किया गया है। सरकार ने अपने हलफनामे में जोर देकर कहा कि व्यापारियों को शून्य MDR व्यवस्था हमेशा जारी रहने का कोई विशेष आश्वासन नहीं दिया गया था। इसके साथ ही, सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी कोई अनिवार्य मामला नहीं था, बल्कि यह सरकार के विवेक पर निर्भर था।
यह पूरा मामला वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) के परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। इस याचिका में संशोधित MDR व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि यह नई व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह शुल्क लगाना कानूनी रूप से उचित नहीं है और इससे व्यावसायिक अधिकारों पर असर पड़ता है।
केंद्र सरकार ने कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों में कहा है कि डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम में स्थिरता लाने के लिए ऐसे सुधार अनिवार्य हैं। सरकार का मानना है कि यदि भुगतान प्रदाताओं को उचित मुआवजा नहीं मिलेगा, तो लंबे समय में इस सिस्टम की दक्षता प्रभावित हो सकती है। इसलिए, ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर MDR शुल्क लगाने का निर्णय लिया गया है, ताकि डिजिटल लेनदेन का ढांचा अधिक मजबूत और स्थिर बन सके।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सरकार के जवाब और याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार कर रहा है। सरकार के इस रुख से स्पष्ट होता है कि वह डिजिटल भुगतान के मुफ्त मॉडल से अब एक व्यवस्थित शुल्क-आधारित मॉडल की ओर बढ़ना चाहती है, ताकि तकनीकी बुनियादी ढांचे की लागत निकाली जा सके और सेवाओं की गुणवत्ता बनी रहे।
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