केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कोयला क्षेत्र में सुधार और गैसीकरण पर जोर दिया
गोवा में आयोजित चौथे माइनिंग मिनिस्टर्स कॉन्फ्रेंस में प्रौद्योगिकी-आधारित खनन और केंद्र-राज्य सहयोग पर बल
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, रात 11:56 · अपडेट सुबह 12:09 · 7 मिनट का पाठ
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केंद्रीय कोयला और खान मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी ने गोवा में आयोजित 'खान और कोयला क्षेत्र में सुधार' पर चौथे माइनिंग मिनिस्टर्स कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत के कोयला और खनन क्षेत्रों की परिवर्तनकारी यात्रा पर प्रकाश डाला। मंत्री ने कहा कि निरंतर किए गए सुधारों के कारण इन क्षेत्रों में पारदर्शिता, दक्षता और व्यावसायिकता में वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा में इन क्षेत्रों का योगदान और मजबूत हुआ है।
कोयला क्षेत्र की प्राथमिकताओं के बारे में बात करते हुए श्री जी. किशन रेड्डी ने भारत के प्रचुर कोयला संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए कोल गैसीकरण (कोयला गैसीकरण) की प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कोल गैसीकरण के माध्यम से घरेलू कोयले के आर्थिक मूल्य को उजागर किया जा सकता है, जिससे औद्योगिक विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और मजबूत होगी।
वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में बदलते समीकरणों के बीच 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिजों) के रणनीतिक महत्व पर जोर देते हुए मंत्री ने कहा कि भारत को अपनी घरेलू खोज, खनन, प्रसंस्करण, रिफाइनिंग और रीसाइक्लिंग क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आयात पर निर्भरता कम करने और भारत की रणनीतिक तथा आर्थिक लचीलापन बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर खनिज पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।
प्रौद्योगिकी की परिवर्तनकारी भूमिका पर चर्चा करते हुए श्री रेड्डी ने राज्य सरकारों से अपील की कि वे खनिजों की खोज, खनन कार्यों और खनिज प्राप्ति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटलीकरण और उन्नत तकनीकी समाधानों का उपयोग करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रौद्योगिकी-आधारित पद्धतियों को अपनाने से खनन और कोयला क्षेत्र में उत्पादकता, परिचालन दक्षता और स्थिरता में सुधार होगा।
केंद्रीय मंत्री ने राज्यों से विनम्र अनुरोध किया कि वे नीलामी की गई खानों को जल्द से जल्द चालू करें, नए ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया में तेजी लाएं, खोज गतिविधियों का विस्तार करें और खनिज संसाधनों की पूर्ण क्षमता का लाभ उठाने के लिए प्रौद्योगिकी-आधारित पद्धतियां अपनाएं। उन्होंने आगे कहा कि खनन क्षेत्र के सुधारों ने राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है, निवेश आकर्षित किया है, रोजगार के अवसर पैदा किए हैं और राजस्व उत्पन्न किया है, साथ ही खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा दिया है।
सहकारी संघवाद की भावना की पुष्टि करते हुए श्री जी. किशन रेड्डी ने भारत की खनिज और कोयला क्षमता को अनलॉक करने, खनन पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और टिकाऊ तथा समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच अधिक मजबूत समन्वय रखने का आह्वान किया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सामूहिक प्रयासों और एक साझा रोडमैप के माध्यम से भारत के खनन और कोयला क्षेत्र नई ऊंचाइयों को छुएंगे, जो 'विकसित भारत 2047' के विजन में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
इस कॉन्फ्रेंस में कोयला और खान मंत्रालय के राज्य मंत्री श्री सतीश चंद्र दुबे ने भी संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि खनन क्षेत्र देश की आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा का मुख्य स्तंभ है। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे व्यापक सुधारों पर प्रकाश डाला, जिसमें पारदर्शी नीलामी प्रक्रियाएं, निवेश को प्रोत्साहन, नए रोजगार के अवसरों का सृजन और खनन गतिविधियों को गति देने के प्रयास शामिल हैं।
श्री दुबे ने टिकाऊ और जिम्मेदार खनन, पर्यावरण सुरक्षा, खान पुनर्स्थापना और खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के कल्याण को प्राथमिकता देने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय और सामाजिक हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए, खनन कार्यों की शुरुआत से ही खान-पश्चात पुनर्स्थापना और स्थानीय समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर पैदा करने की योजनाओं को शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने सुरक्षित और आधुनिक खनन तकनीक, कोल गैसीकरण, कोयले के उपयोग में नवाचार और 'फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी' जैसी पहलों को बढ़ावा देकर कोयला उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने राज्यों से अपने अनुभव और सर्वोत्तम प्रथाएं साझा करने और खनन क्षेत्र की चुनौतियों के समाधान के लिए मिलकर काम करने का अनुरोध किया।
कोयला मंत्रालय के सचिव श्री विक्रम देव दत्त ने भारत के कोयला क्षेत्र में हुई उल्लेखनीय प्रगति और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने तथा आर्थिक विकास को गति देने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बात की। उन्होंने एक महत्वपूर्ण जानकारी दी कि भारत का घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष एक अरब टन से अधिक रहा है, जो ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भारत की यात्रा और आयातित कोयले पर निर्भरता कम करने में एक बड़ी उपलब्धि है।
श्री विक्रम देव दत्त ने कोयला क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी, कुशल और निवेश-अनुकूल बनाने के लिए निरंतर संरचनात्मक सुधारों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने 'कमर्शियल कोल माइनिंग', संशोधित 'शक्ति' (SHAKTI) फ्रेमवर्क और 'कोल सेतु' (Coal SETU) जैसी मुख्य पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने, प्रक्रियाओं को सरल बनाने और कोयला खदानों के संचालन में तेजी लाने की आवश्यकता पर बल दिया।
सचिव ने कोल गैसीकरण को मूल्यवर्धन, औद्योगिक विविधीकरण और रोजगार सृजन के एक बड़े अवसर के रूप में पहचाना। उन्होंने कोयला समृद्ध राज्यों से निवेश की सुविधा प्रदान करने, बुनियादी ढांचे के विकास का समर्थन करने और क्षेत्र की विशाल क्षमता का लाभ उठाने के लिए परियोजना कार्यान्वयन में तेजी लाने का अनुरोध किया।
प्रौद्योगिकी, डिजिटलीकरण, टिकाऊ खनन पद्धतियों और कुशल लॉजिस्टिक्स के महत्व पर जोर देते हुए सचिव ने भारत के कोयला और खनिज संसाधनों की पूर्ण क्षमता का उपयोग करने के लिए मजबूत केंद्र-राज्य सहयोग की अपील की। उन्होंने दोहराया कि कोयला क्षेत्र के विकास का अगला चरण केवल निष्कर्षण (extraction) से आगे बढ़कर मूल्य सृजन (value creation) की ओर जाना चाहिए, ताकि इस क्षेत्र को औद्योगिक विकास, मजबूत राज्य राजस्व, रोजगार सृजन और विकसित भारत के विजन के लिए उत्प्रेरक के रूप में स्थापित किया जा सके।
इस कॉन्फ्रेंस के दौरान, कोयला मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव सुश्री रुपिंदर बरार ने कोयला क्षेत्र में हाल ही में किए गए सुधारों, 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (व्यापार करने की सुगमता) बढ़ाने में उनकी भूमिका के साथ-साथ राज्यों से जुड़ी मुख्य चुनौतियों और अपेक्षाओं पर एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया। इस प्रेजेंटेशन में दिखाया गया कि ये सुधार प्रक्रियाओं को सरल बना रहे हैं, पारदर्शिता बढ़ा रहे हैं, निवेश को सुविधाजनक बना रहे हैं और हितधारकों के लिए अधिक व्यापार-अनुकूल वातावरण बना रहे हैं।
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