आगमिक मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर मद्रास हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
आगमिक मंदिरों में पारंपरिक रीति-रिवाजों को नहीं मानने वाले या श्रद्धा का आश्वासन नहीं देने वाले गैर-हिंदुओं को प्रवेश नहीं मिलना चाहिए।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, दोपहर 1:55 · 5 मिनट का पाठ
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मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि जो गैर-हिंदू पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करने से इनकार करते हैं या देवता के प्रति श्रद्धा दर्शाने वाला आवश्यक हलफनामा प्रदान नहीं करते हैं, उन्हें तमिलनाडु के आगमिक मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। Mint के रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी. मुरुगन शामिल हैं, उन्होंने अपने हालिया आदेश में यह नोट किया है कि यदि ऐसे गैर-हिंदुओं को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है जो अपने धार्मिक चिह्न पहनते हैं या देवता के प्रति आदरभाव दर्शाने का आश्वासन नहीं देते हैं, तो यह मंदिर की पवित्रता के साथ समझौता समान माना जाएगा।
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि यह फैसला केवल और केवल आगमिक मंदिरों को ही लागू होता है। आगमिक मंदिर यानी कि ऐसा हिंदू धाम जो आगम शास्त्रों के अनुसार बनाया गया हो, उसकी प्राणप्रतिष्ठा हुई हो और उसका रखरखाव होता हो। आगम शास्त्र ऐसे प्राचीन ग्रंथ हैं जो मंदिर के जीवन की प्रत्येक विवरण तय करते हैं। अदालत ने अधिकारियों को भी कड़ा निर्देश दिया है कि वे नियमों का कड़ाई से पालन करवाएं और यह सुनिश्चित करें कि राजनीतिक दबाव या सुविधा के सामने झुके बिना युगों पुरानी परंपराओं और मंदिर प्रवेश के नियमों का कड़ाई से पालन हो।
अदालत ने अवलोकन किया कि हाल के समय में इन नियमों के गंभीर उल्लंघन देखने को मिले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने उदाहरण देते हुए नोट किया कि विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा ने अपने चुनाव के बाद मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश किया था और सुविधाओं का निरीक्षण करने का दावा करके कुंभाभिषेक के वक्त मंदिर के शिखरों पर चढ़ गए थे, जबकि दूसरी ओर उन्होंने सनातन धर्म का नाश होना चाहिए ऐसी घोषणा भी की थी।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय का उदाहरण भी दिया था, जो धर्म से ईसाई होने के बावजूद, उचित रूप से अनिवार्य हलफनामे पर हस्ताक्षर करके प्रसिद्ध मदुरै मीनाक्षी अम्मान मंदिर में पूजा करने गए थे। न्यायाधीशों ने अवलोकन करते हुए बताया था कि, धर्म से ईसाई होने के बावजूद उन्हें हिंदू धर्म अपनाने के लिए कहा नहीं गया था। उन्हें केवल देवता के प्रति आदरभाव व्यक्त करने का अनुरोध किया गया था। बेंच ने कहा कि इसी को हम सर्वसमावेशक दृष्टिकोण कहते हैं।
यह अदालती आदेश के. थंगम वेंकटेश द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका (PIL) पर आया था, जिसमें तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकार अधिनियम (Tamil Nadu Temple Entry Authorisation Act) के कड़े अमल और कानूनी उल्लंघनों के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की गई थी। अंतरधार्मिक मंदिर मुलाकातों की विसंगतियों को संबोधित करते हुए, बेंच ने राजनीतिक हस्तियों के विरोधाभासी दृष्टिकोणों पर प्रकाश डाला था।
बेंच ने राजनीतिक दलंबदी और श्रद्धा के दिखावे को लेकर बिना कोई संकोच रखे कड़े शब्दों में आलोचना की थी। जिसे 'राजनीतिक चाटुकारिता' (Political Sycophancy) के रूप में बताते हुए न्यायाधीशों ने उन राजनीतिक नेताओं की तरफ ध्यान आकर्षित किया जो गैर-हिंदू धर्म के होने के बावजूद केवल राजनीतिक फायदे के लिए मंदिरों की मुलाकात लेते हैं और अपने माथे पर स्पष्ट रूप से धार्मिक चिह्न दर्शाते हैं।
बेंच ने राजनीतिक संस्कृति में देखने को मिलने वाली 'चमचागिरी' और दिखावे के सामने भी सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में बताए अनुसार, तिरुवन्नामलाई के अरुणाचलश्वर मंदिर में भक्तों के विरोध के बावजूद खोपड़ी की टोपियां (Skull Caps) पहने हुए कुछ लोग धड़ल्ले से घुस आए थे जबकि मंदिर का स्टाफ मूक प्रेक्षक बनकर खड़ा रहा था, ऐसी वीडियो क्लिप का उल्लेख भी अदालत ने किया था। इसके अलावा, गैर-हिंदू धर्म के राजनीतिक नेताओं द्वारा मत प्राप्त करने के उद्देश्य से धार्मिक चिह्न धारण करके मंदिरों की मुलाकात लेने की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया था।
बेंच ने भारतपूर्वक बताया था कि ऐसे दिखावे का मत मूल्य स्पष्ट है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मंदिर की रीति-रिवाजों और प्रथाएं ऐसे दिखावे और 'चमचागिरी' के आगे कभी भी घुटने नहीं टेकेंगी। Livemint के रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में न्यायाधीशों द्वारा दी गई टकोरों और आदेशों स्पष्ट रूप से आगमिक मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए कड़े कदम रूप हैं।
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