भारत का रक्षा निर्यात पांच वर्षों में साढ़े चार गुना बढ़ा
देश का रक्षा निर्यात ₹38,000 करोड़ को पार कर गया है और इसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 45% दर्ज की गई है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
8 नवंबर 2026, सुबह 3:11 · 3 मिनट का पाठ
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भारत ने पिछले पांच वर्षों में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति दर्ज की है। देश के रक्षा निर्यात में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है, जो पांच वर्षों में साढ़े चार गुना बढ़ गई है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब हथियारों के आयात करने वाले शीर्ष 5 देशों में स्थान रखने के बावजूद, इस क्षेत्र में अपनी स्थिति बदल चुका है। पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत ने सेना के लिए हथियारों के आयात पर खर्च किए गए धन से अधिक राशि रक्षा निर्यात के माध्यम से कमाई है।
संसद में पेश किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि वर्ष 2025-26 के दौरान विदेशी पूंजी रक्षा खरीद पर ₹37,047.31 करोड़ खर्च किए गए थे। इसके मुकाबले, भारत की सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा किया गया रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ रहा। इस कुल निर्यात में निजी सैन्य उद्योगों का योगदान 45.2% दर्ज किया गया। निजी कंपनियों का निर्यात ₹17,353 करोड़ तक पहुंच गया है। निजी सैन्य उद्योग ने निर्यात में 138.7% की बड़ी वृद्धि दर्ज की है।
इस परिवर्तन के पीछे मुख्य कारण सैन्य तकनीक का निजी क्षेत्र के साथ साझा किया जाना माना जा रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) से प्राप्त तकनीक के आधार पर निजी कंपनियों का रक्षा निर्यात पांच वर्षों में ₹7,271 करोड़ से बढ़कर ₹17,353 करोड़ हो गया है। DRDO द्वारा निजी उद्योगों को मिसाइल से लेकर रडार, ड्रोन और कॉम्बैट उपकरणों तक कुल 2,372 तकनीकें हस्तांतरित की गई हैं।
रक्षा संस्थानों से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इस विकास से भविष्य में किसी भी बड़े सैन्य संकट के समय हथियारों और उपकरणों की आपूर्ति के लिए देश को केवल सरकारी कारखानों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इसके अलावा, रक्षा उत्पादन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए एक बड़ा निर्णय लिया गया है, जिसके तहत उद्योगों के साथ तकनीक सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड भी साझा किया जा सकेगा। आधुनिक रडार, ड्रोन, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में उपकरणों के साथ-साथ उनका सॉफ्टवेयर अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
वर्तमान वित्तीय वर्ष में रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 24% रही है। अनुमान है कि आगामी पांच वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन ₹3 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा। DRDO को निर्यात ऑर्डर पर 2% से 5% तक रॉयल्टी मिलती है। यदि निजी कंपनियां भारतीय सेनाओं को सामान बेचती हैं, तो उन्हें रॉयल्टी देने की आवश्यकता नहीं होती है। कंपनियों ने वर्ष 2025-26 में भारतीय सशस्त्र बलों को ₹42,000 करोड़ के रक्षा उत्पाद बेचे थे, जिस पर DRDO को कोई रॉयल्टी नहीं मिली।
दूसरी ओर, रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को तीनों सेनाओं के लिए ₹2.12 लाख करोड़ की खरीद को मंजूरी दी है। इस खरीद में मल्टीपर्पज हेलीकॉप्टर, लंबी दूरी के कामिकाजे ड्रोन सिस्टम और विभिन्न हथियारों को शामिल किया गया है। इस खरीद का लगभग 82% हिस्सा भारतीय उद्योगों से किया जाएगा।
DRDO भारत सरकार की एक प्रमुख संस्था है जो रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक और उपकरणों के अनुसंधान और विकास के लिए कार्यरत है। इसे भारत की सैन्य शक्ति को आधुनिक बनाने के लिए जिम्मेदार मुख्य संस्था के रूप में पहचाना जाता है।
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