IBBI के नए नियमों से अब रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के समाधान में आएगी तेजी
वित्तीय रूप से मजबूत प्रोजेक्ट्स को दिवालिया प्रक्रिया से बचाने और ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए नियमों में संशोधन
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
31 अक्टूबर 2026, शाम 7:10 · अपडेट रात 10:57 · 6 मिनट का पाठ
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इन्सुल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) ने रियल एस्टेट क्षेत्र के तनावग्रस्त प्रोजेक्ट्स के समाधान की प्रक्रिया को तेज करने के लिए नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। इन नए संशोधनों का मुख्य उद्देश्य प्रोजेक्ट के अनुसार व्यवस्था, अधिक पारदशर्िता, होमबॉयर्स की मजबूत भागीदारी और विस्तृत लागत के आकलन के माध्यम से अधिक वास्तविक बिड्स प्राप्त करना है। इन बदलावों से ऐसे प्रोजेक्ट्स को संरक्षण मिलेगा जो वित्तीय रूप से स्वस्थ हैं, ताकि डेवलपर के अन्य दिवालिया प्रोजेक्ट्स के कारण ग्राहकों को परेशानी न हो।
IBBI ने शनिवार को एक रिलीज के माध्यम से बताया कि, इन संशोधनों का उद्देश्य रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के अधिक जानकारीयुक्त और व्यावहारिक समाधान की सुविधा प्रदान करना, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना तथा इन्सुल्वेंसी समाधान प्रक्रिया में होमबॉयर्स और अन्य हितधारकों के हितों को मजबूत करना है। वर्तमान में रियल एस्टेट क्षेत्र इन्सुल्वेंसी समाधान प्रक्रिया के तहत कुल मामलों का २२% हिस्सा रखता है, जो मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के ३६% के बाद दूसरे नंबर का सबसे बड़ा क्षेत्र है। वर्तमान में रहेजा डेवलपर्स, सुपरटेक, टुडे होम्स और अजनाला जैसे अनेक डेवलपर्स दिवालिया प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
नए नियमों के तहत, यदि कोई डेवलपर पूरी तरह से इन्सुल्वेंसी प्रक्रिया में जाता है, तो भी क्रेडिटर्स की समिति (CoC) ऐसे प्रोजेक्ट्स को कॉरपोरेट इन्सुल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में से बाहर रखने की सिफारिश कर सकती है जो वित्तीय रूप से मजबूत हैं। इस प्रकार के बाहर रखने के निर्णय के लिए कम से कम ६६% वोटिंग शेयर रखने वाले क्रेडिटर्स की मंजूरी और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मंजूरी अनिवार्य है। ३० अक्टूबर की नोटिफिकेशन के अनुसार, ये संशोधन तत्काल प्रभाव से लागू होते हैं, हालांकि पहले से दाखिल हुए मामले इन नए ढांचे के तहत अपने आप आएंगे या नहीं, यह कानूनी विशेषज्ञों के अदालतों के फैसलों पर निर्भर करेगा।
पूर्व के ढांचे में, जब किसी डेवलपर को CIRP में दाखिल किया जाता था, तब उसके सभी प्रोजेक्ट्स अपने आप इन्सुल्वेंसी प्रक्रिया के तहत आ जाते थे। इसके कारण जो प्रोजेक्ट्स पूर्ण हो गए थे या वित्तीय रूप से स्वस्थ थे, वहां भी मेंटेनेंस, रजिस्ट्रेशन और अन्य गतिविधियों में रुकावट आती थी। शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी के पार्टनर अनूप रावत ने बताया कि, मोरेटोरियम (मोरटोरियम) के कारण पेमेंट्स अटक जाते हैं, जिससे निर्माण रुक सकता है, मजदूर और ठेकेदार काम छोड़ सकते हैं, होम लोन का वितरण अटक सकता है और रजिस्ट्रेशन विलंबित हो सकता है। नए नियम इस मोरेटोरियम को केवल दिवालिया प्रोजेक्ट्स तक ही सीमित रखेंगे।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए, अब इन्सुल्वेंसी के तहत रहने वाले कॉरपोरेट देनदार के प्रत्येक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए अलग बैंक खाता रखना होगा। रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) को प्रत्येक प्रोजेक्ट के बारे में वित्तीय जानकारी CoC के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी और RERA एक्ट के तहत फंड के उपयोग की आवश्यकताओं का पालन करना होगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि एक प्रोजेक्ट के लिए एकत्रित हुआ फंड उसी प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल हो, जो होमबॉयर्स और क्रेडिटर्स का विश्वास बढ़ाएगा।
प्रोजेक्ट की डिटेल्स और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, RP को अपनी पहली मीटिंग में ही CoC के समक्ष प्रोजेक्ट के अनुसार सभी जानकारी प्रस्तुत करनी होगी। इस जानकारी में प्रोजेक्ट पूर्ण होने के चरण, कब्जा और ओक्यूपेंसी की स्थिति तथा RERA के साथ रजिस्ट्रेशन की डिटेल्स शामिल होंगी। इस जानकारी के आधार पर CoC यह तय कर सकेगा कि किस प्रोजेक्ट को इन्सुल्वेंसी प्रक्रिया से बाहर रखा जाना चाहिए। यदि किसी प्रोजेक्ट को बाहर रखने का निर्णय लिया जाता है, तो इसके कारणों के साथ NCLT को सिफारिश भेजनी होगी।
अधिक वास्तविक बिड्स प्राप्त करने के लिए, CoC की पूर्व मंजूरी के साथ, RP को प्रोजेक्ट के लिए रुचि रखने वाले पक्षों को आमंत्रित करने से पहले स्वतंत्र पेशेवरों की नियुक्ति करनी होगी। ये पेशेवर प्रत्येक प्रोजेक्ट का तकनीकी मूल्यांकन और प्रोजेक्ट पूर्ण करने के लिए आवश्यक लागत का आकलन करेंगे। इस आकलन को इंफॉर्मेशन मेमोरेंडम का हिस्सा बनाया जाएगा और संभावित बिडर्स को उपलब्ध कराया जाएगा। IBBI के अनुसार, इससे हितधारकों के बीच की जानकारी की असमानता घटेगी और गुणवत्तायुक्त बिड्स मिलेंगी।
होमबॉयर्स के हितों को मजबूत करने के लिए, होमबॉयर्स के अधिकृत प्रतिनिधियों को क्रेडिटर्स के साथ अपनी मीटिंग की मिनट्स (कार्यवृत्त) RP को सबमिट करनी होगी, जो इसके बाद CoC के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। CoC की मीटिंग की मिनट्स में होमबॉयर्स के प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों, चिंताओं और ओपिनियन का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और होमबॉयर्स की समस्याएं CoC के समक्ष पहुंचेंगी।
निरीक्षण और कार्यान्वयन बढ़ाने के लिए, रिजॉल्यूशन प्लान को लागू करने के लिए मॉनिटरिंग कमेटी में होमबॉयर्स के अधिकृत प्रतिनिधि और संबंधित RERA के प्रतिनिधि का प्रतिनिधित्व होना चाहिए (यदि प्राधिकारी सहमत हो तो)। IBBI ने बताया है कि होमबॉयर्स और नियामक प्राधिकारियों की भागीदारी से मंजूरियों, पालन और निर्माण के माइलस्टोन से जुड़ी समस्याएं समय पर सुलझेंगी, जिससे विलंब और विवाद घटेंगे। प्रत्येक रिजॉल्यूशन प्लान में प्रोजेक्ट के अनुसार, फेज के अनुसार या टावर के अनुसार निर्माण पूर्ण करने और कब्जा सौंपने की समय-सीमा की विस्तृत जानकारी होनी चाहिए और समय-समय पर प्रगति की रिपोर्ट मॉनिटरिंग कमेटी को देनी होगी। इससे होमबॉयर्स को निश्चितता मिलेगी और मंजूर हुए रिजॉल्यूशन के कार्यान्वयन को लेकर विवाद घटेंगे।
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