बॉम्बे हाई कोर्ट ने मॉब लिंचिंग मामले में आरोपी शरद गोराने की जमानत याचिका खारिज की
अदालत ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के पिछले अपराध किसी समूह को मॉब लिंचिंग के जरिए सजा देने का अधिकार नहीं देते
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 3:23 · अपडेट दोपहर 3:57 · 4 मिनट का पाठ
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने 28 अक्टूबर को लिंचिंग के एक गंभीर मामले में शरद दिगंबर गोराने की जमानत याचिका खारिज कर दी। इस मामले में एक समूह ने एक व्यक्ति पर उसके अपने घर में हमला कर उसकी हत्या कर दी थी। यह आदेश जस्टिस मिलिंद जाधव द्वारा दिया गया था।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के अतीत या उसके आपराधिक इतिहास के कारण किसी समूह के पास उसे सजा देने या मॉब वायलेंस (भीड़ हिंसा) के जरिए न्याय लागू करने का अधिकार नहीं होता है। अदालत ने इस घटना को केवल हमले के मामले के रूप में नहीं, बल्कि कानून के शासन की पूरी तरह अनदेखी कर किए गए मॉब लिंचिंग के कृत्य के रूप में देखा।
अदालत के आदेश के अनुसार, शरद गोराने 15 सदस्यों वाले एक पारिवारिक समूह का हिस्सा था, जिसने पुरानी दुश्मनी के कारण पीड़ित पर हमला किया था। यह हमला पीड़ित के घर के अंदर ही किया गया था, जिसमें पीड़ित को 38 चोटें आईं। कहा जाता है कि इस समूह ने हमले के दौरान सरियों, लाठियों और चाकुओं का इस्तेमाल किया था।
इसके अलावा, आदेश में उल्लेख किया गया है कि शरद गोराने ने पीड़ित को "जीवन का पाठ सिखाने" के लिए समूह को हमला करने का निर्देश दिया था और समूह के सदस्यों से घर को आग लगाने के लिए भी कहा था। रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया है कि गोराने ने कुल्हाड़ी से पीड़ित पर हमला किया और उसे बचाने की कोशिश करने वाले पड़ोसियों को धमकी दी थी।
जब पीड़ित के परिवार के सदस्यों ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो उन्हें भी धमकी दी गई। पीड़ित की माँ अपने बेटे पर हो रहे हमले के दौरान लाचार होकर देखती रही, जबकि घर के बाहर इकट्ठा हुए पड़ोसियों को धमकियाँ देकर हस्तक्षेप करने से रोका गया। अदालत ने नोट किया कि हमले की गंभीरता और चोटों की संख्या दर्शाती है कि यह हमला कितना भयानक था।
जस्टिस जाधव ने टिप्पणी की कि इस तरह के कृत्य कानून के शासन की नींव पर प्रहार करते हैं और इन्हें व्यक्तिगत दुश्मनी से उपजे सामान्य मामलों के रूप में नहीं माना जा सकता। जब कोई समूह विवाद सुलझाने के लिए कानून अपने हाथ में लेता है और हिंसा का सहारा लेता है, तो उसके परिणाम केवल पीड़ित तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए भी खतरा पैदा करता है और कानून द्वारा मिलने वाले संरक्षण पर नागरिकों के विश्वास को कमजोर करता है।
जमानत देते समय पीड़ित के परिवार और समाज पर इस घटना के प्रभाव को भी ध्यान में रखा गया। अदालत ने यह भी नोट किया कि समूह ने पीड़ित पर वर्चस्व जमाने और दूसरों को हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए अपनी संख्यात्मक ताकत का इस्तेमाल किया। हिंसा की इस घटना का मौके पर मौजूद लोगों और पूरे समुदाय पर जो प्रभाव पड़ा है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आरोपी शरद गोराने की ओर से एडवोकेट सना रईस खान पेश हुईं। उन्होंने दलील दी कि पीड़ित एक हिस्ट्री-शीटर था और उसके तथा आवेदक के परिवार के बीच दुश्मनी थी। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि भले ही पीड़ित का आपराधिक इतिहास रहा हो, लेकिन गोराने या किसी अन्य को उसके व्यवहार के लिए उसे सजा देने का अधिकार नहीं है। किसी भी आरोप का सामना कानून के अनुसार ही होना चाहिए और अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार कानून प्रवर्तन एजेंसियों के पास है, न कि व्यक्तिगत असंतोष रखने वाले लोगों के पास।
एडवोकेट खान द्वारा यह दलील भी दी गई कि गोराने को गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए गए थे। इस संबंध में अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के कारण आवेदक को बताए गए थे और संबंधित फॉर्म भी उसे सौंपा गया था, जिस पर आवेदक के हस्ताक्षर भी थे।
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