दिवाली के बाद रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम बढ़ाने की कंपनियों की तैयारी
कच्चे माल और पैकेजिंग लागत में वृद्धि के कारण उपभोक्ताओं पर पड़ेगी महंगाई की मार
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 6:09 · अपडेट शाम 5:01 · 3 मिनट का पाठ
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दिवाली के त्योहार के बाद आम जनता के लिए रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। कच्चे माल की लगातार बढ़ती कीमतों और पैकेजिंग लागत में हुई वृद्धि के कारण विभिन्न कंपनियां अब अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने पर विचार कर रही हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL), ब्रिटानिया, डाबर और टाटा कंज्यूमर जैसी बड़ी कंपनियां चुनिंदा वस्तुओं की कीमतें बढ़ाने की योजना बना रही हैं। कुछ कंपनियां दिसंबर महीने से इस मूल्य वृद्धि को लागू कर सकती हैं।
इस मूल्य वृद्धि का सीधा असर साबुन, बिस्कुट, नूडल्स, डिटर्जेंट और पैकेट बंद खाद्य सामग्री पर देखा जा सकता है। अब तक कंपनियां कीमतें बढ़ाने के बजाय पैकेट का वजन घटाकर लागत के दबाव को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थीं, लेकिन अब इस विकल्प की संभावनाएं भी सीमित हो गई हैं। उदाहरण के लिए, 10 रुपये के पारले-जी बिस्कुट के पैकेट में अब वजन और अधिक घटाने की कोई खास जगह नहीं बची है। कंपनियों के लिए यह एक बड़ी दुविधा है क्योंकि वजन घटाने से ग्राहक नाराज हो सकते हैं, जबकि कीमतें बढ़ाने से ग्राहक अन्य ब्रांडों की ओर मुड़ सकते हैं।
कंपनियों ने पहले भी कीमतों में वृद्धि की है। ब्रिटानिया, HUL, डाबर और गोदरेज कंज्यूमर ने जून तिमाही में ही लगभग 2 से 5 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाई थीं। सितंबर तिमाही के लिए भी मूल्य वृद्धि पर विचार किया गया था। टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स की बात करें तो, कंपनी ने जून से सितंबर महीने के बीच चाय की कीमतों में 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि की थी। इसके अलावा, कंपनी ने मई में 30 रुपये वाले नमक के पैकेट की कीमत बढ़ाकर 32 रुपये की थी और उसके बाद अक्टूबर में इसे बढ़ाकर 34 रुपये कर दिया था।
उत्पादन लागत बढ़ने का एक मुख्य कारण प्लास्टिक पैकेजिंग की कीमतों में आया उछाल है। रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक पैकेजिंग 40 प्रतिशत तक महंगी हो गई है, जिससे उत्पादों की कुल लागत पर भारी दबाव पड़ा है। इस बढ़ी हुई लागत का बोझ अब उपभोक्ताओं पर डालने की तैयारी की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस महंगाई का सबसे ज्यादा असर कम आय वाले परिवारों पर पड़ेगा। क्योंकि ऐसे परिवार अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च करते हैं। बिस्कुट, नूडल्स, साबुन, डिटर्जेंट और खाद्य तेल जैसी सस्ती वस्तुओं की कीमतों में थोड़ा सा बदलाव भी उनकी क्रय शक्ति और खरीदारी की आदतों को प्रभावित कर सकता है।
डेटम इंटेलिजेंस के संस्थापक सतीश मीणा के अनुसार, कंपनियां शुरुआत में बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठाती हैं, लेकिन लंबे समय में वे इस बोझ को उपभोक्ताओं पर डालकर कीमतों में वृद्धि करती हैं। वर्तमान स्थिति में कच्चे माल और पैकेजिंग की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों को यह कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया है। इस प्रकार, दिवाली के बाद की अवधि में आम आदमी के घर का बजट बिगड़ सकता है क्योंकि जीवन रक्षक और आवश्यक वस्तुओं के महंगे होने की पूरी संभावना है।
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