हाईकोर्ट ने बांग्लादेशी महिला और बच्ची को रिहा करने से किया इनकार
कोर्ट ने कहा कि निर्वासन तक पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में रखने का प्रशासनिक आदेश कानूनी है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 12:55 · अपडेट दोपहर 1:07 · 2 मिनट का पाठ
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गुजरात हाईकोर्ट ने भरूच में हिरासत में रखी गई एक बांग्लादेशी महिला और उसकी नवजात बेटी को रिहा करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस महिला और बच्ची की हिरासत को अवैध नहीं कहा जा सकता। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महिला के भारतीय पति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज कर दिया।
इस मामले में कोर्ट ने पाया कि महिला को डिपोर्ट (देशनिकाला) किए जाने तक शहर के पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में रखने का प्रशासनिक आदेश दिया गया है। इस आदेश के आधार पर की गई हिरासत कानूनी होने के कारण उसे रिहा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि जब तक यह प्रशासनिक आदेश प्रभावी है, तब तक महिला को रिहा नहीं किया जा सकता और याचिकाकर्ता पति ने इस आदेश को उचित फोरम के समक्ष चुनौती नहीं दी है।
अदालत ने भरूच के पुलिस अधीक्षक और फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर द्वारा दिसंबर 2025 में जारी आदेश का संज्ञान लिया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह आदेश 2025 इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट और 2025 इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स ऑर्डर्स के तहत दिया गया था। महिला और उसकी बच्ची को 6 मई को कोर्ट के समक्ष पेश किया गया था, हालांकि महिला को किस तारीख को हिरासत में लिया गया था, इसकी स्पष्टता नहीं की गई है।
महिला के पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी कि पुलिस ने उसकी पत्नी और उनकी 7 से 8 महीने की बेटी को अवैध रूप से हिरासत में रखा है। दूसरी ओर, गुजरात सरकार ने कोर्ट को बताया कि यह महिला बांग्लादेशी नागरिक है और उसकी हिरासत पूरी तरह से कानूनी है। राज्य सरकार के अनुसार, स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के मुताबिक महिला को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं और अन्य बुनियादी सुविधाएं प्रदान की गई हैं।
बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) एक ऐसी याचिका है जिसके माध्यम से अदालतें अधिकारियों को आदेश दे सकती हैं कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को कोर्ट के समक्ष लाया जाए, ताकि यह जांचा जा सके कि उसकी हिरासत कानूनी है या नहीं।
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