बांग्लादेश में वस्त्र उद्योग के मजदूरों का आंदोलन उग्र, सरकार ने किया वेतन बोर्ड का गठन
बांग्लादेश में न्यूनतम मासिक वेतन को लेकर रविवार को आड़े १० लाख मजदूर हड़ताल पर रहे, जिसके कारण ५२९ फैक्टरियों में कामकाज प्रभावित हुआ।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, दोपहर 2:09 · अपडेट रात 8:41 · 9 मिनट का पाठ
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बीबीसी हिंदी के रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में वस्त्र उद्योग से जुड़े आड़े १० लाख मजदूरों का प्रदर्शन इतना बढ़ गया कि देश की ५२९ फैक्टरियों में काम ठप रहा था। बीबीसी न्यूज बाङ्ला के अनुसार, रविवार को देश के लगभग ९ लाख ८७ हजार मजदूरों ने कपड़ा फैक्टरियों में काम नहीं किया था। रविवार को बड़ी संख्या में कपड़ा मजदूर अपनी मांगें लेकर रास्ते पर उतरे, हालांकि उनकी निश्चित संख्या ज्ञात नहीं है। उद्योग मालिकों को आशंका है कि यदि परिस्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो सोमवार को भी उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ये प्रदर्शन राजधानी ढाका के अनेक इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में हो रहे हैं।
रविवार को हुए प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, रास्ता रोको और पुलिस के साथ झड़पों की घटनाएं भी सामने आईं। पुलिस ने आशु गैस के गोले भी छोड़े थे। वर्ष २०२४ में छात्र आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता पर से हटने, अंतरिम सरकार की रचना और फिर आम चुनावों के बाद तारिक रहमान की सरकार के सत्ता पर आने तक बांग्लादेश में एक के बाद एक अनेक हिंसक प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर देखा है। ताजा प्रदर्शन में कपड़ा फैक्टरी के मजदूर अपना न्यूनतम मासिक वेतन ३० हजार टका (लगभग २१ हजार रुपये) मासिक न्यूनतम वेतन तक बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। अभी उनका वर्तमान वेतन १२,५०० टका (लगभग ८,८०० रुपये) है। यानी वे इसे दोगुना करने की मांग कर रहे हैं।
मजदूरों का कहना है कि खाने-पीने की चीजों, मकान भाड़ा, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमत ने उनकी खरीद शक्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। उनकी मांग को ध्यान में रखते हुए रविवार को देश के श्रम और रोजगार मंत्री आरिफुल हक चौधरी ने रविवार को छह सदस्यों के एक वेतन बोर्ड का गठन किया है और मजदूरों को प्रदर्शन न करने की अपील की है। कुछ कपड़ा उद्योग के मजदूरों ने बीबीसी बाङ्ला को बताया कि सरकार भले ही वेतन बोर्ड का गठन कर दिया हो, परंतु उनका आंदोलन चालू रहेगा। उनका कहना है कि जब तक न्यूनतम वेतन की घोषणा नहीं की जाती है, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन चालू रखेंगे।
बीबीसी न्यूज बाङ्ला के अनुसार, प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर कपड़ा उद्योग के मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा पर आत्मीय बैठक की है। रविवार रात को सचिवालय में हुई इस बैठक में मंत्रियों और सलाहकारों ने भाग लिया। बैठक में कानून और व्यवस्था एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि रेडीमेड कपड़ा उद्योग की फैक्टरियों में उत्पादन चालू रखा जाए और लोगों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद और श्रम एवं रोजगार मंत्री आरिफुल हक चौधरी ने कहा कि बैठक में हिंसा से सख्ती से निपटने का फैसला लिया गया है।
गृह मंत्री ने कहा कि आंदोलन के दौरान पुलिस पर हमले हुए, वाहनों में तोड़फोड़ की गई और फैक्टरियों में आगजनी की घटनाएं हुईं। उन्होंने बताया कि कालियाकैर में एक जूट गोडाउन में भी आग लगा दी गई। गृह मंत्री ने दावा किया कि कुछ नकाबपोश लोग आंदोलन में घुसकर अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सीमा पार से उकसावे के जरिए देश के निर्यात व्यापार और कपड़ा उद्योग के उत्पादन को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, इसका मकसद देश में अस्थिरता पैदा करना है।
बैठक के बाद श्रम मंत्री आरिफुल हक चौधरी ने बीबीसी न्यूज बाङ्ला को कहा कि यह साफ है कि अवामी फासीवाद से जुड़े लोगों ने दिसंबर को ध्यान में रखकर ये गतिविधियां की हैं। उन्होंने कहा कि इसी प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित पक्षों को सतर्क रहने का निर्देश दिया है, जिससे कपड़ा उद्योग में उत्पादन प्रभावित न हो और देश में अस्थिरता पैदा न की जा सके। हालांकि इन आरोपों पर अवामी लीग की कोई प्रतिक्रिया ज्ञात नहीं है। उल्लेखनीय है कि दिसंबर २०२५ में बांग्लादेश में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद भयंकर राजनीतिक हिंसा देखने को मिली थी। साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री और भारत में निर्वासन में रहने वाली शेख हसीना के इस दिसंबर में बांग्लादेश वापस लौटने की भी संभावना है।
बीबीसी न्यूज बाङ्ला ने स्थानीय रिपोर्र्टों के हवाले से बताया कि बांग्लादेश में ३१ अक्टूबर से अचानक ये प्रदर्शन रिपोर्ट होने लगे जो मुख्यरूप से रेडीमेड गारमेंट्स फैक्टरी से जुड़े हैं। देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों सावर, अशुलिया, मीरपुर और गाजीपुर में रेडीमेड कपड़ा उद्योग के मजदूर अचानक प्रदर्शन पर उतर आए। वे ३० हजार टका न्यूनतम वेतन तय करने समेत अनेक मांगें लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें दर्ज की गई हैं। पुलिस की तरफ से आशु गैस के गोले छोड़े गए, लाठियां चलीं। साथ ही पुलिस के वाहनों में आग लगाने की घटनाएं भी हुईं।
इन प्रदर्शनों के कारण शुरुआत में तीस फैक्टरियों ने अपने यहां काम बंद करने की घोषणा की। रविवार को प्रभावित फैक्टरियों की संख्या तेजी से बढ़कर ५०० हो गई जहां प्रशासन ने ही एक दिन की छुट्टी घोषित कर दी। अचानक बढ़े असंतोष को लेकर बांग्लादेश की राष्ट्रीय मीडिया में सवाल भी उठ रहे हैं। बीबीसी न्यूज बाङ्ला के अनुसार, इन रिपोर्टों में कहा गया है कि इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि वर्तमान अचानक पैदा हुई अशांति के पीछे केवल तात्कालिक मांगें ही नहीं हैं। उनके अनुसार, मजदूरी और बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच बढ़ता अंतर और विभिन्न समूहों की तरफ से की जा रही उकसावे की कोशिशें भी इसकी वजह हो सकती हैं।
रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि आखिर मजदूरों में अचानक यह असंतोष क्यों बढ़ा है? क्या यह केवल वेतन बढ़ाने की मांग है, या इसके पीछे कोई दूसरा मकसद भी काम कर रहा है? ढाका से प्रकाशित होने वाले बांग्ला समाचार पत्र बोनिक बार्ता के हवाले से बीबीसी न्यूज बाङ्ला ने बताया है कि कानून और व्यवस्था एजेंसियों का कहना है कि ढाका और गाजीपुर में हुए हिंसक मजदूर प्रदर्शनों में प्रतिबंधित अवामी लीग और उससे जुड़े संगठनों के नेता तथा कार्यकर्ता शामिल हैं। एजेंसियों के अनुसार, प्रतिबंधित छात्र लीग की जगन्नाथ विश्वविद्यालय एका इकाई के संगठन सचिव सजमुल इस्लाम ने गाजीपुर के कालियाकैर में एक सरगम का नेतृत्व किया था। इससे जुड़ी तस्वीर सोशल मीडिया पर भी प्रसारित की गई है।
दूसरी तरफ, रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री के मालिकों का संगठन बीजीएमईए और बीकेएमईआर इस आंदोलन के दौरान हो रहे प्रदर्शनों, झड़पों और हिंसा को पूरी तरह सामान्य मानते नहीं हैं। इन दोनों संगठनों के नेताओं ने रविवार विभिन्न फैक्टरी मालिकों के साथ इस मुड्ढे पर बैठक की। बीकेएमईआर के अध्यक्ष मोहम्मद हातेम का मानना है कि तैयार कपड़ा उद्योग में अचानक पैदा हुई अशांति की मुख्य वजह वेतन का मुद्दा नहीं है। उनके अनुसार, इसके पीछे सरकार के विरुद्ध कोई साजिश हो सकती है। उन्होंने बीबीसी बाङ्ला को कहा कि इस आंदोलन में असली मजदूर शामिल नहीं हैं।
यदि असली मजदूर उसमें होते, तो यह पहले ही दिन खत्म हो जाता। इसके पीछे कोई दूसरा मकसद है। सरकार को उस मकसद का पता लगाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यह आंदोलन पिछले कुछ दिनों से चल रहा है। उनके अनुसार, बाहर के लोग वहां विभिन्न फैक्टरियों पर हमले कर रहे हैं। कपड़ा उद्योग के मालिक ३० हजार टका न्यूनतम वेतन की मांग को उचित मानते नहीं हैं। बीकेएमईआर के अध्यक्ष ने बीबीसी बाङ्ला को कहा कि २०१३ से २०२३ के बीच तीन चरणों में मजदूरी बढ़ाई गई है। उन्होंने कहा कि इसके बाद यदि न्यूनतम वेतन बढ़ाकर ३० हजार टका कर दिया जाता है, तो अनेक फैक्टरियां बंद हो जाएंगी।
उनके अनुसार, अनेक नियोक्ता इतनी अधिक मजदूरी देने में सक्षम नहीं होंगे। बीकेएमईआर के अध्यक्ष मोहम्मद हातेम ने बीबीसी बाङ्ला को कहा कि मजदूर ३० हजार टका न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया है। हम चाहते हैं कि यह बोर्ड सभी पक्षों की बातों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसा वेतन तय करे, जिसे वह उचित समझे।
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