बेंगलुरु में आईटी कंपनियों के खिलाफ कन्नड़ कार्यकर्ताओं का आंदोलन, नौकरियों में आरक्षण की मांग
स्थानीय उम्मीदवारों की अनदेखी के आरोपों के साथ कर्नाटक रक्षण वेदिके द्वारा कंपनियों से कर्मचारियों का विवरण मांगा गया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
7 नवंबर 2026, दोपहर 3:39 · 4 मिनट का पाठ
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बेंगलुरु में आईटी क्षेत्र की कंपनियों के खिलाफ कन्नड़ कार्यकर्ताओं ने नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है। कर्नाटक रक्षण वेदिके (केआरवी) के सदस्यों ने सोमवार से शहर की विभिन्न प्रौद्योगिकी कंपनियों का दौरा करना शुरू कर दिया है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य कंपनियों में स्थानीय कन्नड़ भाषी उम्मीदवारों की भर्ती की स्थिति की जांच करना है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यकर्ताओं ने कंपनियों से उनके कुल कर्मचारियों की संख्या, पिछले तीन वर्षों में की गई भर्ती, और ग्रुप ए, बी, सी तथा डी श्रेणी में कन्नड़ भाषी कर्मचारियों का अनुपात जैसी जानकारियां मांगी हैं।
इसके अलावा, इस संगठन ने कंपनियों से स्थानीय कर्मचारियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं, भर्ती के मानकों, कौशल विकास कार्यक्रमों और प्रशिक्षण तथा इंटर्नशिप के अवसरों के बारे में भी जानकारी मांगी है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राज्य के योग्य उम्मीदवारों को नजरअंदाज कर बाहरी राज्यों के उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जा रही है। इस विवाद के कारण राज्य सरकार पर लंबे समय से लंबित नौकरियों में आरक्षण की मांग को पूरा करने का दबाव बढ़ गया है, विशेष रूप से जब २०२४ का नौकरी आरक्षण विधेयक वर्तमान में स्थगित है।
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कन्नड़ संगठनों से आईटी-बीटी कंपनियों के पास सीधे जाकर दबाव न बनाने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि ऐसे मुद्दों को कानून के दायरे में रहकर और बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। बुधवार को विधानसभा में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने उद्योगपतियों को आश्वासन दिया कि कन्नड़ भाषा के नाम पर किसी भी प्रकार की धमकी या उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कंपनियों से निवेश जारी रखने और योग्य कन्नड़ उम्मीदवारों को उचित अवसर प्रदान करने का आग्रह किया। इसके बावजूद, ४ नवंबर को कार्यकर्ताओं ने महादेवपुरा स्थित गूगल के कार्यालय का दौरा किया और अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।
मुख्यमंत्री ने २५ अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर कहा था कि यदि यह पाया जाता है कि निजी संस्थान जानबूझकर कन्नड़ भाषियों को किनारे कर रहे हैं, तो सरकार उचित कदम उठाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार स्थानीय उम्मीदवारों की अनदेखी की शिकायतों को गंभीरता से ले रही है और उनके अधिकारों तथा सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
कन्नड़ भाषियों के लिए नौकरियों में आरक्षण की मांग का इतिहास १९८३ से शुरू होता है। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने सरकारी संस्थानों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) और निजी कंपनियों में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसरों की जांच करने के लिए सरोजिनी महिषी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने १९८४ और १९८६ में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें ५८ सिफारिशें की गई थीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने उनमें से ४५ सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था, जिसमें सरकारी संस्थानों में १०० प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान मुख्य था। हालांकि, इन सिफारिशों का पूर्ण कार्यान्वयन आज तक नहीं हो सका है।
सरोजिनी महिषी समिति का गठन १९८३ में किया गया था। इस समिति ने सिफारिश की थी कि राज्य के उद्योगों में कार्मिक अधिकारी कन्नड़ भाषी होने चाहिए और स्थानीय उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। समिति ने केंद्र सरकार के विभागों में भी ग्रुप सी और डी की नौकरियों में १०० प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा था, जिसका उद्देश्य राज्य के युवाओं को रोजगार में समान अवसर प्रदान करना था।
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