उपराष्ट्रपति ने पुराने कानूनों को निरस्त कर कानूनी सुधार का आह्वान किया
नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में केंद्र-राज्य सहयोग और अप्रासंगिक कानूनों की समीक्षा पर जोर दिया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
22 अक्टूबर 2026, रात 8:30 · अपडेट सुबह 9:53 · 3 मिनट का पाठ
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भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत के विधि आयोग द्वारा आयोजित 'सहकारी संघवाद और कानूनी सुधार: राष्ट्रीय और राज्य परिप्रेक्ष्य' सम्मेलन का उद्घाटन किया।
सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने 'टीम इंडिया' की भावना पर जोर देते हुए केंद्र और राज्यों के बीच अधिक परामर्श, समन्वय और साझा जिम्मेदारी का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि व्यापक जनहित के लिए साथ मिलकर काम करने में राजनीतिक मतभेद आड़े नहीं आने चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की ताकत विविधता में एकता में है। संविधान संघ की ताकत को राज्यों की जिम्मेदारियों और उचित स्वायत्तता के साथ संतुलित करने का ढांचा प्रदान करता है। भारतीय संघवाद की असली ताकत विविधता का सम्मान करते हुए समान राष्ट्रीय उद्देश्यों की दिशा में काम करने में है।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत @2047 के लिए मजबूत कानून, पारदर्शी संस्थाएं, कुशल प्रशासन और सभी के लिए न्याय आवश्यक है। उन्होंने पिछले 12 वर्षों में गुलामी के युग के 3 आपराधिक कानूनों को बदलने और 1,700 से अधिक पुराने अप्रासंगिक कानूनों को निरस्त करने को कानूनी ढांचे के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने राज्य विधि आयोगों से आग्रह किया कि वे जीवन की सुगमता और कुशल सुशासन के लिए पुराने कानूनों की पहचान करें और उनमें सुधार या उन्हें निरस्त करने की सिफारिश करें।
कानूनी सुधार में सहकारी संघवाद का अर्थ हर मामले में एकरूपता नहीं है, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि जहां संवैधानिक जिम्मेदारियां एक होती हैं, वहां केंद्र और राज्यों को साथ काम करना चाहिए और राज्यों की विशिष्ट जरूरतों के लिए उचित स्थान बनाए रखना चाहिए। उन्होंने भारत के विधि आयोग, राज्य विधि आयोगों और राज्य के कानून विभागों के बीच अंतर-राज्य परामर्श, सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान और पुराने कानूनों की व्यवस्थित समीक्षा के माध्यम से मजबूत समन्वय का आह्वान किया।
संसद में स्थापित सेंगोल का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने सुशासन और कानून के शासन के संबंध में तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर के ज्ञान को याद किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सत्ता के उपयोग से अधिक सुशासन स्थायी सफलता और समृद्धि की नींव है। उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की कि सम्मेलन सुसंगत, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित कानूनी ढांचे के लिए ठोस और कार्यान्वयन योग्य सिफारिशें प्रस्तुत करेगा।
इस अवसर पर केंद्रीय कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अर्जुन राम मेघवाल, भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, सदस्य सचिव डॉ. अंजू राठी राणा और सदस्य प्रो. डी. पी. वर्मा सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
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