केंसर की कोशिकाओं में ही दवा का कारखाना: जहरीली गैस का उपयोग कर ट्यूमर को खत्म करने की नई तकनीक
जापान के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी पद्धति खोजी है जिसमें केंसर की कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जित कार्बन मोनोऑक्साइड का उपयोग करके उनके भीतर ही जहरीली दवा बनाई जा सकती है।

केंसर के उपचार में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाए बिना केवल केंसरग्रस्त कोशिकाओं का ही नाश किया जाए। पारंपरिक कीमोथेरेपी में दवा पूरे शरीर में फैल जाती है, जिसके कारण मरीज को गंभीर दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है। लेकिन अब जापान की 'RIKEN' पायनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (PRI) के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी पद्धति विकसित की है। इस पद्धति में केंसर की कोशिकाएं खुद ही जो जहरीला गैस उत्पन्न करती हैं, उसका उपयोग करके उनके अंदर ही केंसर विरोधी दवा बनाई जाती है। यह शोध 'Nature Communications' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और यह केंसर के उपचार में एक नया अध्याय खोल सकता है।
केंसर रोगों का एक ऐसा समूह है जिसमें कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और शरीर में ट्यूमर (tumor) बनाती हैं। दुनियाभर में हर साल लाखों लोग इस बीमारी का शिकार बनते हैं। 2019 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में 2.36 करोड़ नए केंसर के मामले दर्ज किए गए थे और 1 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। केंसर की कोशिकाओं की एक खासियत यह है कि वे सामान्य कोशिकाओं की तुलना में अलग तरह से व्यवहार करती हैं और कुछ निश्चित रसायनों का अधिक मात्रा में उत्पादन करती हैं। इन शोधकर्ताओं ने केंसर की कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide) को निशाना बनाया है।
कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) आमतौर पर वाहनों के धुएं से निकलने वाली जहरीली गैस के रूप में जानी जाती है, जो रंगहीन और गंधहीन होती है। लेकिन मानव शरीर में भी यह प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होती है। विशेष रूप से केंसर की कोशिकाओं में इस गैस की मात्रा असाधारण रूप से अधिक होती है। वैज्ञानिकों ने सोचा कि यदि इस गैस का उपयोग एक 'बायोलॉजिकल मार्कर' के रूप में किया जाए, तो केंसर की कोशिकाओं की पहचान करके वहीं प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इसके लिए उन्होंने एक खास प्रकार के मेटल कैटालिस्ट यानी उत्प्रेरक का उपयोग किया है।
- डिलिवरीपैलेडियम उत्प्रेरक को एल्ब्यूमिन प्रोटीन के कवच में पैक करके शरीर में प्रवेश कराया जाता है।
- रक्षणएल्ब्यूमिन कवच उत्प्रेरक को खून में मौजूद ग्लूटाथियोन जैसे अवरोधकों से बचाता है।
- प्रवेशयह संकुल केंसर की कोशिकाओं में प्रवेश करता है, जहाँ कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है।
- दवा का उत्पादनउत्प्रेरक कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ प्रतिक्रिया करके कोशिका के अंदर ही जहरीली फेनेंथ्रिडिनोन दवा बनाता है।
इस प्रक्रिया में मुख्य भूमिका 'पैलेडासाइक्ल' (palladacycle) नामक यौगिक की है। पैलेडासाइक्ल धातु युक्त एक ऐसा यौगिक है जो कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ प्रतिक्रिया करके 'फेनेंथ्रिडिनोन' (phenanthridinone) नामक पदार्थ बना सकता है। फेनेंथ्रिडिनोन एक जहरीला कार्बनिक अणु है, जिसका उपयोग केंसर विरोधी दवाओं में किया जाता है। वैज्ञानिकों का विचार यह था कि यदि पैलेडासाइक्ल को केंसर की कोशिकाओं तक पहुँचाया जाए, तो वहाँ मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड इसके साथ प्रतिक्रिया करेगा और कोशिका के अंदर ही जहरीली दवा पैदा होगी, जो उस कोशिका का नाश करेगी।
परंतु इस मार्ग में एक बड़ी बाधा थी। जब पैलेडासाइकेल को सीधे ही कोशिकाओं में दाखिल किया जाता है, तब कोशिकाओं में मौजूद 'ग्लूटामियोन' (glutathione) नामक पदार्थ पैलेडियम उत्प्रेरक को तुरंत ही निष्क्रिय कर देता है। यदि उत्प्रेरक ही काम न करे, तो दवा का उत्पादन नहीं हो सकता। इस समस्या के समाधान के लिए कात्सुनोरी तानाका और उनकी टीम ने 'एल्ब्यूमिन' (albumin) नामक प्रोटीन का उपयोग किया। एल्ब्यूमिन खून में पाया जाने वाला एक सामान्य प्रोटीन है। शोधकर्ताओं ने पैलेडासाइकेल को एल्ब्यूमिन के कवच में सुरक्षित रूप से पैक कर दिया। यह कवच उत्प्रेरक को ग्लूटामियोन जैसे अवरोधकों से बचाता है और इसे सुरक्षित रूप से कैंसर की कोशिकाओं तक पहुँचाता है।
- पैलेडासाइकिल का पैकिंगपैलेडासाइकिल को एल्ब्यूमिन प्रोटीन के कवच में सुरक्षित रूप से पैक किया जाता है।
- कोशिकाओं तक पहुँचनायह कवच उत्प्रेरक को ग्लूटाथियोन से बचाकर केंसर की कोशिकाओं तक पहुँचाता है।
- रासायनिक प्रक्रियाकेंसर की कोशिकाओं में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड उत्प्रेरक के साथ प्रतिक्रिया करता है।
- दवा का निर्माणकोशिका के अंदर ही फेनेंथ्रिडिनोन जैसी जहरीली दवा बनती है जो केंसर की कोशिका को नष्ट करती है।

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में मानव लिवर, ग्रीवा (cervical), स्तन और फेफड़े के कैंसर की कोशिकाओं पर इस पद्धति का परीक्षण किया। उन्होंने इन कोशिकाओं को ४८ घंटे तक एल्ब्यूमिन और पैलेडासाइकेल के मिश्रण के साथ रखा। परिणाम आश्चर्यजनक थे। कैंसर की कोशिकाओं में फेनेंथ्रिडिनोन दवा का उत्पादन हुआ था, जबकि सामान्य स्वस्थ कोशिकाओं में ऐसी कोई प्रक्रिया देखने को मिली नहीं थी। इसका अर्थ यह हुआ कि एल्ब्यूमिन कवच ने उत्प्रेरक की रक्षा की थी और कैंसर की कोशिकाओं में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड का उपयोग करके सफलतापूर्वक दवा बनाई थी।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या यह प्रक्रिया खून में भी हो सकती है? यदि खून में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ यह प्रक्रिया होती है, तो यह खून की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकती है। परंतु प्रयोगों में पता चला कि खून में यह जहरीली दवा बनती नहीं है। उसका कारण यह है कि खून में मौजूद अधिकांश कार्बन मोनोऑक्साइड 'हीमोग्लोबिन' (hemoglobin) के साथ जुड़ा होता है। हीमोग्लोबिन के साथ बंधा होने के कारण यह गैस रासायनिक प्रक्रिया के लिए उपलब्ध नहीं होती है। यह खोज इस पद्धति की सुरक्षा में वृद्धि करती है।
| गुण | मूल्य |
|---|---|
| मोलर मास | २८.० |
| बंध की लंबाई (Bond length) | ११२.८ pm |
| बंध वियोजन ऊर्जा (Bond energy) | १०७२ kJ/mol |
| क्वथनांक (Boiling point) | ८२ K |
| गलनांक (Melting point) | ६८ K |
कार्बन मोनोऑक्साइड के अणु की संरचना भी बहुत ही दिलचस्प है। उसमें कार्बन और ऑक्सीजन के बीच ट्रिपल बॉन्ड (triple bond) यानी त्रि-बंध होता है। यह बंध इतना मजबूत होता है कि इसे तोड़ने के लिए १०७२ किलोजूल प्रति मोल जितनी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, जो रसायन विज्ञान में ज्ञात सबसे मजबूत बंधों में से एक है। इस अणु की लंबाई मात्र ११२.८ पिकोमीटर होती है। इतना छोटा और मजबूत अणु होने के बावजूद, पैलेडियम जैसे उत्प्रेरक की मदद से इसे प्रक्रिया में जोड़ा जा सकता है।
| गुण | माप / जानकारी |
|---|---|
| मोलर द्रव्यमान (Molar mass) | २८.० |
| क्वथनांक (Boiling point) | ८२ केल्विन (K) |
| गलनांक (Melting point) | ६८ केल्विन (K) |
| बंध-विघटन ऊर्जा (Bond-dissociation energy) | १०७२ किलोजूल प्रति मोल |
| बंध की लंबाई | ११२.८ पिकोमीटर |
कैंसर के कारणों की जाँच करें, तो लगभग ९०-९५% मामले पर्यावरणीय और जीवनशैली के कारकों के कारण होते हैं। तंबाकू का उपयोग २५-३०% और गलत खानपान तथा मोटापा ३०-३५% कैंसर की मौतों के लिए जिम्मेदार है। यह नई तकनीक यदि सफल होती है, तो यह जीवनशैली या अन्य कारणों से होने वाले विभिन्न प्रकार के कैंसर के खिलाफ लड़ने में बेहद असरदार साबित हो सकती है। खासतौर पर स्तन कैंसर और कोलोरेक्टल कैंसर जैसे सामान्य प्रकारों में यह वरदान साबित हो सकती है।
यह शोध 'इन विवो सिंथेटिक केमिस्ट्री' (in vivo synthetic chemistry) के क्षेत्र में एक बड़ा कदम है। इन विवो यानी जीवित शरीर के भीतर होने वाली प्रक्रिया। तानाका के अनुसार, इस रणनीति में शरीर के अंदर प्राकृतिक रूप से मौजूद या बीमारी के कारण उत्पन्न होने वाले पदार्थों का ही उपयोग करके बीमारी के स्थान पर दवा बनाई जाती है। यह एक तरह की 'ट्रोजन हॉर्स' (Trojan Horse) जैसी युक्ति है, जहाँ दुश्मन (कैंसर) के अपने ही संसाधनों का उपयोग उसके खिलाफ किया जाता है।

फिलहाल यह शोध केवल संवर्धित कोशिकाओं (cultured cells) पर किया गया है। अब अगला कदम जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों का होगा। यदि जानवरों पर होने वाले परीक्षणों में भी यह पद्धति सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में मानवीय क्लिनिकल ट्रायल शुरू किए जाएंगे। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मरीजों को कीमोथेरेपी के भयानक दुष्प्रभावों जैसे कि बाल झड़ना, अत्यधिक कमजोरी और मितली आने जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। कैंसर का इलाज अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी बनने की दिशा में यह एक आशा की किरण है।


