अंतरिक्ष स्टेशन से पृथ्वी के वायुमंडल का अद्भुत नजारा और खगोलशास्त्र की यात्रा
अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन से बादलों के बीच चमकती बिजली और अंतरिक्ष विज्ञान के गहरे रहस्यों का विश्लेषण।

मानव जाति सदियों से रात्रि के आकाश की ओर नज़र दौड़ाकर तारों और ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने का प्रयास करती आई है। परंतु जब इसी आकाश से पृथ्वी की तरफ देखा जाता है तो हमारा अपना वायुमंडल एक अद्भुत और रहस्यमय दुनिया जैसा प्रतीत होता है। अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (International Space Station - ISS) पर से हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष यात्री और भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने पृथ्वी के वायुमंडल में होने वाली प्राकृतिक आतिशबाजी का एक विशिष्ट वीडियो जारी किया था। अंधकार में लिपटी पृथ्वी के बादलों के बीच चमकती बिजली के इन दृश्यों ने वैज्ञानिकों और आम नागरिकों दोनों का ध्यान खींचा है।
खगोल शास्त्र (Astronomy) मूल रूप से पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर मौजूद आकाशीय पिंडों और ब्रह्मांड की घटनाओं का अध्ययन करता है। हालांकि, पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित प्रयोगशालाएं अब केवल ब्रह्मांड की गहराइयों को ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के अपने वायुमंडलीय परिवर्तनों, बादलों की गतिविधियों और तूफानों का ऊपर से निरीक्षण करने का सबसे बड़ा माध्यम बन गई हैं। इस प्रकार का अवलोकन ज़मीन से किए जाने वाले मौसम और खगोलीय अवलोकनों की तुलना में बिल्कुल अलग परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
अंतरिक्ष से दिखने वाली बिजली: ज़मीन और कक्षा के बीच का अंतर
ज़मीन पर रहने वाले मनुष्य के लिए बादलों में होने वाली बिजली सिर के ऊपर होने वाली एक चमक और गर्जना है। आमतौर पर बादलों के नीचे से देखने पर बिजली की रेखाएं ज़मीन पर गिरती हुई या बादल के तल पर दौड़ती हुई दिखाई देती हैं। परंतु अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन, जो पृथ्वी की सतह से लगभग ४०० किलोमीटर (400 km) की ऊँचाई पर परिक्रमा करता है, वहां से यह पूरी प्रक्रिया उल्टी दिखाई देती है। अंतरिक्ष से देखने पर बादल पृथ्वी के अंधकारमय हिस्से पर बिछे सफेद कालीन जैसे लगते हैं और बिजली बादलों के अंदर से फूटते हुए तेज प्रकाश के गोले की तरह चमकती है।
- बादलों में विद्युतभार का निर्माणवातावरण में तापमान और नमी के परिवर्तन से बादलों के अंदर धन और ऋण विद्युतभार इकट्ठा होता है।
- विद्युत विसर्जन और प्रकाशबादलों के बीच या बादल के अंदर बिजली का चिंगारी उत्पन्न होती है, जो प्रचंड तेज पैदा करती है।
- ऊपरी वातावरण में प्रकाश का फैलावबिजली का प्रकाश बादल के घने स्तरों से बाहर निकलकर अंतरिक्ष की ओर फैलता है।
- 400 किमी ऊंचाई से सेंसिंगअंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर से अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी के अंधकारमय हिस्से में इस चमक को प्राकृतिक आतिशबाजी रूप में देखते हैं।

जब बादल के अंदर या दो बादलों के बीच विद्युत आवेश का विसर्जन (electrical discharge) होता है, तब उत्पन्न होने वाला प्रचंड प्रकाश बादल के ऊपरी स्तरों से बाहर निकलकर अंतरिक्ष की तरफ फैलता है। शुभांशु शुक्ला ने दिवाली और धनतेरस के अवसर पर इंस्टाग्राम पर यह वीडियो शेयर करते हुए इसे 'प्रकृति की अपनी आतिशबाजी' बताया था। स्पेस स्टेशन पर से एक साथ हज़ारों वर्ग किलोमीटर में फैले बादल दिखाई देने के कारण एक साथ कई स्थानों पर चमकने वाली बिजली किसी उत्सव के पटाखे फूटने जैसा अहसास कराती है।
| विवरण | राकेश शर्मा (1984) | शुभांशु शुक्ला (2025) |
|---|---|---|
| अंतरिक्ष यान / मिशन | सोयुज टी-11 | एक्सीओम-4 (Axiom-4) |
| स्थान | साल्यूत-7 स्पेस स्टेशन | इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) |
| अंतर्राष्ट्रीय साथी देश | सोवियत यूनियन | अमेरिका, पोलैंड, हंगरी |
| कक्षा की ऊंचाई | निचली कक्षा | लगभग 400 किलोमीटर |
| रहने की अवधि | लगभग 8 दिन | लगभग 2 सप्ताह |
ऐतिहासिक संदर्भ: राकेश शर्मा से शुभांशु शुक्ला तक की यात्रा
भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में मानव मिशन बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वर्ष १९८४ में विंग कमांडर राकेश शर्मा अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने थे। उस ऐतिहासिक क्षण के बाद दशकों तक कोई भारतीय नागरिक अंतरिक्ष में नहीं पहुँचा था। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय बने हैं और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर कदम रखने वाले वे सर्वप्रथ भारतीय हैं।
यह ऐतिहासिक यात्रा २५ जून २०२५ के दिन शुरू हुए 'एक्सिओम-४' (Axiom-4) मिशन के तहत संपन्न हुई थी। इस अंतरराष्ट्रीय मिशन में भारत के अलावा अमेरिका, पोलैंड और हंगरी के अंतरिक्ष यात्री शामिल थे। शुभांशु शुक्ला ने स्पेस स्टेशन पर लगभग दो सप्ताह बिताए थे। इस समयावधि के दौरान उन्होंने न केवल वैज्ञानिक प्रयोग किए, बल्कि पृथ्वी और भारतीय उपमहाद्वीप के कई महत्वपूर्ण दृश्य कैमरे में कैद किए थे।

रात्रि के समय स्पेस स्टेशन से भारत का अवलोकन करते हुए उन्होंने पाया था कि हमारा देश किसी जगमगाते गहने जैसा दिखाई देता है। पुणे, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों की रोशनी अंतरिक्ष से तारों की तरह चमकती हुई दिखती थी। यह शहरी प्रकाश और इसके साथ पृथ्वी के वायुमंडल में होने वाली प्राकृतिक हलचल मानव बस्तियों और पर्यावरण के बीच का अनोखा तालमेल दर्शाती है।
खगोलशास्त्र और वायुमंडलीय निरीक्षण का विज्ञान
खगोलशास्त्र (Astronomy) शब्द प्राचीन ग्रीक शब्दों 'एस्ट्रोन' (astron: तारा) और 'नोमोस' (nomos: नियम या कानून) से उत्पन्न हुआ है। इसका सीधा अर्थ आकाशीय पिंडों के नियमों का अध्ययन ऐसा होता है। खगोलशास्त्र को ज्योतिषशास्त्र (Astrology) के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए, क्योंकि खगोलशास्त्र भौतिकी, गणित और रसायन विज्ञान पर आधारित कठोर प्राकृतिक विज्ञान है।
दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं ने आकाश का निरीक्षण करके कैलेंडर बनाए थे। मिस्र, बेबीलोनिया, ग्रीस और भारत में वैज्ञानिक खगोलशास्त्र की नींव पड़ी थी। भारत में आर्यभट्ट, वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त जैसे महान विद्वानों ने ग्रहों की गति और ग्रहण की गणनाओं में क्रांतिकारी सुधार किए थे। समय के साथ निकोलस कॉपरनिकस, जोहांस केप्लर, गैलीलियो गैलिली और आइजैक न्यूटन के शोधों ने सूर्यकेंद्रित मॉडल (heliocentric model) और गुरुत्वाकर्षण के नियम देकर ब्रह्मांड को समझने की दिशा बदल दी।

जमीन से जब खगोलशास्त्री आकाश का अवलोकन करते हैं तब पृथ्वी का वायुमंडल अक्सर बाधा बनता है। वायुमंडल में मौजूद गैसों, धूल और तापमान के बदलाव तारों के प्रकाश को धुंधला बनाते हैं। यही कारण है कि दुनियाभर की अंतरिक्ष एजेंसियां, जैसे अमेरिका की नासा (NASA), हबल और जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप जैसी वेधशालाओं को अंतरिक्ष में स्थापित करती हैं। १९५८ में स्थापित नासा का वर्ष २०२६ के लिए बजट २४.४ अरब डॉलर ($24.4 billion) मंजूर किया गया था और इसमें लगभग १८,४०० कर्मचारी कार्यरत हैं।
સંખ્યા અને અબજ ડોલર
स्पेस स्टेशन से पृथ्वी का निरंतर निरीक्षण क्यों जरूरी है?
अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन केवल तारों की तरफ देखने की जगह नहीं है, बल्कि पृथ्वी की जीवंत प्रणालियों का निरंतर निरीक्षण करने वाला केंद्र भी है। ४०० किलोमीटर की ऊँचाई से समुद्र की धाराओं, पर्वतमालाओं, जंगलों में लगने वाली आग, तूफानों की उत्पत्ति और वायुमंडल के आवेशित तूफानों का व्यापक दृष्टिकोण से मूल्यांकन किया जा सकता है।
जब उपग्रहों और स्पेस स्टेशन से बादलों में होने वाली बिजली का अध्ययन किया जाता है, तो वायुमंडल की ऊपरी परतों में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों और ऊर्जा के प्रवाह को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इस प्रकार का वैज्ञानिक डेटा पृथ्वी पर मौसम के पूर्वानुमानों को अधिक सटीक बनाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को मापने में अत्यंत उपयोगी साबित होता है।
अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी एक ऐसी सीमाहीन भूमि के रूप में उभर कर आती है जहाँ प्रकृति अपने तरीके से रोशनी का जश्न मनाती है। शुभांशु शुक्ला के ये अवलोकन केवल एक मनोहारी वीडियो तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के नए युग का प्रमाण है, जहाँ भारतीय वैज्ञानिक पृथ्वी और संपूर्ण ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं।


