चंद्रयान-3 के बाद: चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर भारत ने क्या सीखा
दुनिया का पहला यान जो चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के पास सुरक्षित उतरा। वहाँ की मिट्टी से मिली जानकारी आने वाले मिशनों का नक्शा बदल रही है।

23 अगस्त 2023 की शाम को इसरो के नियंत्रण कक्ष में तालियाँ गूँज उठीं। चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के पास धीरे से उतरा, और भारत उस क्षेत्र में पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश बना। चार साल पहले चंद्रयान-2 का लैंडर आखिरी घड़ी में टूट गया था; इस बार इंजीनियरों ने उन्हीं गलतियों से सीखकर मजबूत पैर, अधिक ईंधन और उतरने के लिए विशाल क्षेत्र रखा था।
दक्षिण ध्रुव क्यों महत्वपूर्ण है? वहाँ के कुछ गहरे गड्ढों में अरबों वर्षों से सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि वहाँ बर्फ के रूप में पानी सहेजा हुआ हो सकता है। भविष्य में चंद्रमा पर रहने वाले मनुष्यों के लिए वह पानी पीने, ऑक्सीजन बनाने और रॉकेट के ईंधन के काम आ सकता है।
प्रज्ञान ने मिट्टी में क्या देखा
विक्रम से निकला छह पहियों वाला प्रज्ञान रोवर लगभग सौ मीटर चला। उसके लेज़र उपकरण ने चंद्रमा की सतह पर गंधक (सल्फर) होने की पुष्टि की, जो इस क्षेत्र में स्थल पर ही मापा गया हो ऐसा पहली बार हुआ। साथ ही एल्युमिनियम, कैल्शियम, लोहा, टाइटेनियम और ऑक्सीजन भी मिले।
विक्रम पर लगे थर्मामीटर जैसे उपकरण ने सतह से कुछ सेंटीमीटर नीचे तक का तापमान मापा। ऊपर तापमान सत्तर डिग्री के आसपास था, लेकिन थोड़ी ही नीचे वह तेज़ी से घटता गया। इसका अर्थ यह है कि चंद्रमा की मिट्टी गर्मी को बहुत कम बहने देती है, जो भविष्य के मकानों के लिए उपयोगी जानकारी है।
मिशन के अंत में इसरो ने एक छोटा प्रयोग भी किया: विक्रम के इंजन दोबारा चालू करके उसे लगभग चालीस सेंटीमीटर ऊपर उठाकर बगल में फिर उतारा। यह छोटी छलांग बताती है कि भविष्य में चंद्रमा से नमूने लेकर पृथ्वी पर वापस आने वाला यान संभव है।
अब आगे क्या
चंद्रयान-3 जहाँ उतरा उस जगह को 'शिवशक्ति पॉइंट' नाम दिया गया और 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस घोषित किया गया। इसरो अब चंद्रमा से मिट्टी वापस लाने के मिशन और जापान के साथ संयुक्त ध्रुवीय मिशन की तैयारी कर रहा है। चंद्रयान-3 ने साबित किया कि भारत कम खर्च में, धैर्य से और गलतियों से सीखकर अंतरिक्ष में बड़े काम कर सकता है।


