जीन कैंची CRISPR: सिकल सेल के मरीजों के लिए विज्ञान की नई आशा
बैक्टीरिया की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली से विकसित CRISPR-Cas9 तकनीक कैसे एक जानलेवा आनुवंशिक रक्त विकार के इलाज में क्रांति ला रही है, इसकी विस्तृत वैज्ञानिक समझ।

मानव शरीर की अरबों कोशिकाओं में छिपे डीएनए (DNA: डिऑक्सीराइबोक्लिक एसिड, जीवन का आनुवंशिक नक्शा) में मौजूद एक छोटी सी त्रुटि कभी-कभी पीढ़ियों तक असह्य दर्द का कारण बन सकती है। सिकल सेल रोग (Sickle Cell Disease: रक्त कणों को दरांती जैसा बना देने वाला आनुवंशिक रक्त विकार) ऐसा ही एक वंशानुगत रोग है, जो दुनियाभर के लाखों मरीजों को आजीवन गंभीर शारीरिक पीड़ा और अंगों के नुकसान की ओर धकेलता है। वर्ष 2023 में चिकित्सा विज्ञान ने एक ऐतिहासिक मील का पत्थर पार किया, जब अस्थिमज्जा (bone marrow: हड्डियों के भीतर रक्त कोशिकाओं का निर्माण करने वाला ऊतक) के स्टेम सेल में मौजूद त्रुटिपूर्ण जीन को सुधारने के लिए CRISPR आधारित जीन थेरेपी (gene therapy) को आधिकारिक मंजूरी दी गई। इस उपचार के पीछे काम करने वाली पद्धति को आम भाषा में 'जीन कैंची' के रूप में जाना जाता है।
इस क्रांतिकारी पद्धति की जड़ें वर्ष 2020 के रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से जुड़ी हैं, जो फ्रांसीसी वैज्ञानिक Emmanuelle Charpentier और अमेरिकी वैज्ञानिक Jennifer A. Doudna को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया था। नोबेल समिति के अनुसार, जीनोम एडिटिंग (genome editing: जीव की आनुवंशिक संरचना में सटीक बदलाव करने की पद्धति) के लिए इन दोनों वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई पद्धति मानवता के लिए अत्यंत कल्याणकारी साबित हो रही है। जो तकनीक आज मानवीय डीएनए में मौजूद त्रुटियों को सुधार रही है, वह वास्तव में सूक्ष्म बैक्टीरिया में वायरस से लड़ने के लिए लाखों वर्षों से प्राकृतिक रूप से मौजूद एक सुरक्षात्मक प्रणाली है।
सिकल सेल रोग: रक्त कणों का विकृत रूप और उसका जोखिम
हमारे लाल रक्त कणों (red blood cells: ऑक्सीजन का वहन करने वाली रक्त कोशिकाएं) में मौजूद हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन फेफड़ों से पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करता है। एक सामान्य वयस्क में 97% से अधिक हीमोग्लोबिन 'हीमोग्लोबिन A' (HbA) प्रकार का होता है, जो दो अल्फा और दो बीटा ग्लोबिन श्रृंखलाओं से बना होता है। मानव शरीर के गुणसूत्र 11 (chromosome 11) पर स्थित HBB जीन इस बीटा-ग्लोबिन प्रोटीन को बनाने का संकेत देता है। सिकल सेल रोग तब होता है जब व्यक्ति अपने माता और पिता दोनों की ओर से इस HBB जीन की क्षतिग्रस्त प्रतियां विरासत में प्राप्त करता है।


इस आनुवंशिक विकृति के कारण शरीर में सामान्य हीमोग्लोबिन के बजाय असामान्य 'हीमोग्लोबिन S' (HbS) उत्पन्न होता है। जब ये असामान्य रक्त कण रक्त वाहिकाओं में ऑक्सीजन छोड़ते हैं, तो अणु एक-दूसरे से जुड़कर कड़े तंतु बनाते हैं, जिसके कारण सामान्य गोलाकार और लचीले रक्त कण दरांती जैसे कठोर आकार में बदल जाते हैं। ये कठोर सिकल कोशिकाएं अत्यंत संकरी रक्त वाहिकाओं (capillaries) से आसानी से गुजर नहीं पाती हैं और वहीं जमा होकर रक्त प्रवाह को अवरुद्ध करती हैं। इस स्थिति को 'वासो-ओक्लुसिव क्राइसिस' (vaso-occlusive crisis: रक्त प्रवाह रुकने से होने वाला दर्दनाक दौरा) कहा जाता है, जिसके कारण मरीज को हड्डियों, पीठ, छाती और हाथ-पैरों में असह्य पीड़ा होती है।
यह बीमारी केवल दर्द तक सीमित नहीं रहती; यह शरीर के महत्वपूर्ण अंगों जैसे कि प्लीहा (spleen), यकृत, किडनी, हृदय और फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचाती है। बच्चों में प्लीहा ब्लॉक हो जाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है और फेफड़ों में ब्लॉकेज होने से 'एक्यूट चेस्ट सिंड्रोम' पैदा होता है, जो इन मरीजों में 25% मौतों के लिए जिम्मेदार है। सिकल सेल रोग वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में अनुमानित 77 लाख लोगों को प्रभावित करता है, जिसके कारण सीधे तौर पर 34,000 मरीजों की मौत होती है और अन्य 3,76,000 मौतों में यह एक गौण कारण बनता है। इन मामलों में से लगभग 80% मामले सब-सहारा अफ्रीका में पाए जाते हैं, लेकिन भारत, दक्षिण यूरोप और पश्चिम एशिया के क्षेत्रों में भी इस बीमारी की मात्रा उल्लेखनीय है।
बैक्टीरिया की रक्षा प्रणाली से CRISPR की खोज
विज्ञान की दुनिया में CRISPR (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats: नियमित अंतराल पर व्यवस्थित छोटे पुनरावृत्ति वाले डीएनए क्रम) का इतिहास अप्रत्याशित निष्कर्षों से भरा है। सबसे पहले 1987 में जापानी वैज्ञानिक Ishino और उनकी टीम ने Escherichia coli बैक्टीरिया में इस अजीबोगरीब पुनरावृत्ति वाली डीएनए श्रृंखला को देखा था। सामान्य रूप से डीएनए में ऐसे क्रम लगातार होते हैं, लेकिन यहाँ उनके बीच अज्ञात डीएनए के टुकड़े (spacers: विभाजक टुकड़े) नियमित अंतराल पर व्यवस्थित थे। 1993 में van Solingen और साथियों ने क्षय रोग के बैक्टीरिया में भी ऐसी ही संरचना दर्ज की, जिसके आधार पर 'स्पोलिगोटाइपिंग' नामक पद्धति विकसित हुई।
स्पेनिश वैज्ञानिक Francisco Mojica ने वर्ष 2000 और 2001 में व्यापक शोध करके यह निष्कर्ष निकाला कि यह ढांचा लगभग 20 तरह के सूक्ष्मजीवों में एक समान रूप से मौजूद है और उन्होंने Jansen के साथ मिलकर इस संरचना को 'CRISPR' नाम दिया। वर्ष 2005 में तीन स्वतंत्र शोध समूहों ने दर्ज किया कि इन दो पुनरावृत्तियों के बीच मौजूद 'स्पेसर' वास्तव में बैक्टीरिया पर पहले हमला करने वाले बैक्टीरियोफेज (bacteriophage: बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस) के डीएनए टुकड़े हैं। बैक्टीरिया अपने ऊपर हमला करने वाले वायरस के डीएनए को सुरक्षित रखकर भविष्य के हमलों के खिलाफ स्मृति आधारित रोग प्रतिरोधक क्षमता (adaptive immunity) प्राप्त करते हैं। यह प्राकृतिक रक्षा प्रणाली अनुक्रमित (sequenced) किए गए लगभग 50% बैक्टीरिया और 90% आर्चिया में पाई जाती है।
आणविक कैंची कैसे काम करती है: चरणबद्ध पद्धति
CRISPR प्रणाली केवल डीएनए का संग्रह नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़े विशिष्ट एंजाइम भी रखती है, जिन्हें Cas (CRISPR-associated: CRISPR से जुड़े प्रोटीन) कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने कुल 93 Cas जीन की पहचान की है जो 35 परिवारों में विभाजित हैं, जिनमें से Cas1 से Cas9 तक के 11 परिवार मुख्य कोर माने जाते हैं। जब वायरस हमला करता है तब Cas1 और Cas2 प्रोटीन वायरस के डीएनए से एक छोटा टुकड़ा काटकर बैक्टीरिया के CRISPR एरे में नए स्पेसर के रूप में जोड़ देते हैं। इसके बाद इस पूरे क्रम से crRNA (CRISPR RNA) बनता है।
| घटक का नाम | सामान्य आकार (bp) | पूर्ण विस्तार (bp) |
|---|---|---|
| CRISPR रिपीट्स (Repeats) | 28 से 37 | 23 से 55 |
| स्पेसर क्रम (Spacers) | 32 से 38 | 21 से 72 |
| एरे प्रति यूनिटों की संख्या | 50 से कम | लागू नहीं होता |
वर्ष 2012 में Emmanuelle Charpentier और Jennifer A. Doudna की टीम ने साबित किया कि Streptococcus pyogenes बैक्टीरिया का Cas9 प्रोटीन एक आणविक कैंची (molecular scissors) की तरह काम करता है। उन्होंने दो अलग आरएनए घटकों (crRNA और tracrRNA) को जोड़कर एक सिंगल गाइड आरएनए (sgRNA) बनाया। यह सिंगल गाइड आरएनए Cas9 एंजाइम को डीएनए पर विशिष्ट लक्ष्य स्थान तक ले जाता है। जब तक डीएनए पर विशिष्ट पहचान संकेत (PAM: प्रोटोस्पेसर एडजसेंट मोटिफ) नहीं मिलता तब तक यह कैंची सक्रिय नहीं होती, लेकिन लक्ष्य मिलते ही यह डीएनए की दोनों श्रृंखलाओं को एक निश्चित स्थान से काट देती है।
- 1. लक्ष्य की पहचानसिंगल गाइड आरएनए (sgRNA) डीएनए पर मौजूद त्रुटिपूर्ण या विशिष्ट जीन क्रम को सटीकता से पहचानता है।
- 2. Cas9 जुड़ाव और PAM स्कैनिंगCas9 एंजाइम गाइड आरएनए के साथ जुड़कर टारगेट डीएनए पर मौजूद PAM क्रम की जांच करता है।
- 3. डीएनए का विभाजननिश्चित स्थान मिलते ही Cas9 एंजाइम डीएनए की दोनों श्रृंखलाओं को काटकर दोहरा कट (DSB) बनाता है।
- 4. कोशिकीय मरम्मतकोशिका अपनी प्राकृतिक डीएनए मरम्मत पद्धति से इस कट को जोड़ती है, जिससे जीन सुधारा जा सकता है या निष्क्रिय किया जा सकता है।
जब कोशिका के डीएनए में इस तरह का दोहरा कट (double-strand break) लगता है, तो कोशिका अपनी प्राकृतिक मरम्मत प्रणाली को सक्रिय करती है। इस मरम्मत के दौरान त्रुटिपूर्ण जीन को निष्क्रिय किया जा सकता है या मरीज के लिए आवश्यक नया जीन क्रम दर्ज करके डीएनए की गलती को सुधारा जा सकता है। इस तकनीक का उपयोग 2013 में Cong और Mali द्वारा मानव कोशिका संवर्धन (human cell cultures) में और 2015 में Liang द्वारा मानव भ्रूण कोशिकाओं में प्रायोगिक तौर पर किया गया था।
सिकल सेल के मरीजों के लिए उपचार और वर्तमान स्थिति
सिकल सेल रोग के पारंपरिक उपचार में दर्द निवारक दवाएं, रक्त चढ़ाना (blood transfusion) और हाइड्रॉक्सीकार्बामाइड (hydroxyurea) जैसी दवाएं शामिल हैं। उचित चिकित्सा उपचार के बिना मरीज शायद ही वयस्क अवस्था तक पहुंच पाते हैं, जबकि बेहतरीन उपचार के साथ भी उनकी औसत आयु सीमा 58 से 66 वर्ष की रहती है। परंतु CRISPR तकनीक ने इस आजीवन उपचार की सीमाओं को पार करके स्थायी इलाज का रास्ता खोल दिया है।

इस नई जीन थेरेपी में मरीज के अपने ही अस्थिमज्जा से रक्त बनाने वाले स्टेम सेल बाहर निकाले जाते हैं। प्रयोगशाला में CRISPR-Cas9 कैंची की मदद से इन कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव किया जाता है, ताकि शरीर में फिर से 'हीमोग्लोबिन F' (HbF: गर्भावस्था के दौरान बनने वाला प्राकृतिक सुरक्षात्मक हीमोग्लोबिन) बनना शुरू हो जाए। इन संशोधित कोशिकाओं को मरीज के शरीर में वापस प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे रक्त कणों का दरांती जैसे कठोर आकार में बदलना रुक जाता है और मरीज दर्दनाक दौरों से स्थायी मुक्ति पा सकता है।
दुनियाभर में लगभग 77 लाख लोग सिकल सेल रोग के साथ जी रहे हैं, ऐसे में यह तकनीक केवल एक वैज्ञानिक चमत्कार नहीं है, बल्कि मरीजों के लिए पुनर्जन्म है। भारत जैसे देशों में, जहाँ आदिवासी और ग्रामीण आबादी में सिकल सेल ट्रेट (वाहक लक्षण) वाले लोगों का प्रमाण काफी ऊंचा है, वहाँ इस तरह की उपचार पद्धतियां भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती हैं। हालांकि यह उपचार अत्यंत जटिल प्रयोगशालाओं और अस्थिमज्जा प्रत्यारोपण जैसी उन्नत अस्पताल बुनियादी ढांचे की सुविधाओं पर निर्भर होने के कारण इसे आम नागरिकों तक उचित तरीके से पहुंचाना वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों के लिए आगामी समय का सबसे बड़ा व्यावहारिक लक्ष्य होगा।


