115 मिलियन वर्ष पुराने डायनासोर के जीवाश्मों में मिले रक्त के अंश: विज्ञान की एक अद्भुत खोज
ब्राजील में पाए गए अराटासॉरस डायनासोर की हड्डियों में रक्त कणों और हीम अणुओं की उपस्थिति मिली है, जो प्राचीन जीवों के जीवविज्ञान को समझने में एक नई दिशा प्रदान करती है।

विज्ञान जगत में वर्षों से यह मान्यता रही है कि लाखों वर्ष पुराने जीवाश्मों में केवल हड्डियाँ या कठोर पदार्थ ही बच सकते हैं, और कोमल ऊतक या रक्त के अंश समय के साथ नष्ट हो जाते हैं। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध ने इस मान्यता को जोरदार चुनौती दी है। ब्राजील के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित एक खदान से मिले 115 मिलियन वर्ष पुराने डायनासोर के जीवाश्मों में वैज्ञानिकों को रक्त के अंश मिले हैं। यह खोज 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' (PNAS) नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित की गई है। यह शोध डायनासोर की शारीरिक संरचना और उनकी जीवनशैली के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह से बदल सकता है।
इस शोध का नेतृत्व ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर क्लिटी ग्राइस द्वारा किया गया था। उनकी टीम ने 'अरातासॉरस म्यूजियोनेशनाली' (Aratasaurus museunacionali) नामक डायनासोर के पिछले पैर की हड्डियों का विश्लेषण किया था। यह डायनासोर लगभग 11.5 करोड़ वर्ष पहले जीवित था। शोध के दौरान वैज्ञानिकों को हड्डियों के अंदर स्थित अत्यंत सूक्ष्म नलियों, जिन्हें वैस्कुलर कैनाल्स (vascular canals) कहा जाता है, उनमें अंडाकार आकृतियाँ दिखाई दीं। इन आकृतियों के वास्तव में खनिजीकृत लाल रक्त कोशिकाएं होने का अनुमान है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाती है कि उचित परिस्थितियों में जैविक अणु लाखों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।
इन जीवाश्मों में सबसे महत्वपूर्ण खोज 'हीम' (heme) नामक अणु की है। हीम, हीमोग्लोबिन (haemoglobin) का एक मुख्य भाग है। हीमोग्लोबिन रक्त कोशिकाओं में मौजूद वह प्रोटीन है जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुँचाने का काम करता है। प्रोफेसर ग्राइस के अनुसार, उन्होंने जिन नमूनों का परीक्षण किया, उनमें लगभग 80 प्रतिशत तक हीम पाया गया। यह खोज डायनासोर की फिजियोलॉजी (physiology) यानी शरीर क्रिया विज्ञान के अध्ययन के लिए प्रमाण का एक नया प्रकार प्रदान करती है। इससे यह जाना जा सकेगा कि इन जीवों में ऑक्सीजन का संवहन कैसे होता था और उनका मेटाबॉलिज्म (metabolism) यानी चयापचय की दर कैसी थी।
जिस डायनासोर की हड्डियों से ये अंश मिले हैं, उस 'अरातासॉरस' के बारे में भी कुछ दिलचस्प जानकारी सामने आई है। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, जब इस डायनासोर की मृत्यु हुई, तब उसकी आयु केवल 4 वर्ष थी। उसका वजन लगभग 34 किलोग्राम था और सिर से पूंछ तक की लंबाई 3.1 मीटर थी। यह डायनासोर पंखों वाला था और इसके मांसाहारी होने की संभावना है। इसकी हड्डियाँ 2008 में ब्राजील की एक खदान से मिली थीं, लेकिन उन पर अत्याधुनिक तकनीक से परीक्षण अब किया गया है।
| विवरण | माप/जानकारी |
|---|---|
| अश्मी की उम्र | 115 मिलियन वर्ष |
| मृत्यु के समय उम्र | 4 वर्ष |
| अनुमानित वजन | 34 किलोग्राम |
| कुल लंबाई | 3.1 मीटर |
| मिले हुए अंग | फीमर, टिबिया और पैर की हड्डियां |
आमतौर पर जैविक पदार्थ इतने लंबे समय तक टिक नहीं पाते हैं, तो फिर इस मामले में ऐसा कैसे हुआ? वैज्ञानिकों का मानना है कि इस डायनासोर की मृत्यु 'माइक्रोबियल मैट्स' (microbial mats) पर हुई थी। माइक्रोबियल मैट यानी बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों की एक मोटी परत, जो आमतौर पर तटीय क्षेत्रों में देखी जाती है। जब डायनासोर का शरीर इस परत पर गिरा, तो सूक्ष्मजीवों ने उसे चारों ओर से घेर लिया होगा। इस प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीडेशन (oxidation) और मिनरलाइजेशन (mineralisation) यानी खनिजीकरण की प्रक्रिया एक साथ हुई होगी, जिसके कारण नरम ऊतक पत्थर जैसे कठोर हो गए और नष्ट होने से बच गए।
- माइक्रोबियल मैट्स पर मृत्युडायनासोर का शरीर बैक्टीरिया से बनी मोटी परत (माइक्रोबियल मैट्स) पर गिरा।
- सूक्ष्मजीवों द्वारा घेरावसूक्ष्मजीवों ने शरीर को चारों तरफ से घेर लिया, जिससे वह सुरक्षित हो गया।
- खनिजीकरणऑक्सीकरण और मिनरलाइजेशन की प्रक्रिया के कारण नरम ऊतक पत्थर जैसे सख्त हो गए।
- मृत्यु और स्थानडायनासोर तटीय क्षेत्र में माइक्रोबियल मैट्स (सूक्ष्मजीवों की परत) पर मर गया।
- सूक्ष्मजीवों की प्रक्रियाबैक्टीरिया और आर्किया जैसे सूक्ष्मजीवों ने शरीर को घेर लिया और ऑक्सीकरण की प्रक्रिया शुरू की।
- खनिजीकरण (Mineralisation)नरम ऊतकों और रक्त कोशिकाओं में खनिज भरने लगे, जिससे वे पत्थर की तरह सख्त हो गए।
- लाखों वर्षों का संरक्षणभूवैज्ञानिक दबाव और उचित रासायनिक वातावरण में ये अंश 115 मिलियन वर्षों तक बरकरार रहे।
इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने कई अत्याधुनिक पद्धतियों का उपयोग किया था। उन्होंने लाइट स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (light scanning electron microscopy) द्वारा हड्डियों की आंतरिक संरचना की जांच की थी। इसके अलावा पायरोलिसिस (pyrolysis) और मास स्पेक्ट्रोमेट्री (mass spectrometry) जैसी रासायनिक विश्लेषण पद्धतियों का उपयोग करके अणुओं की पहचान की गई थी। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इन नमूनों में प्राचीन डीएनए (DNA) खोजने का भी प्रयास किया था, लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। इसलिए, फिल्मों में दिखाए जाने के अनुसार डायनासोर की क्लोनिंग अभी संभव नहीं है।
विज्ञान जगत में इस खोज को लेकर कुछ मतभेद भी प्रचलित हैं। नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैरी श्वित्ज़र, जो स्वयं डायनासोर के नरम ऊतकों की विशेषज्ञ हैं, वे इन अंडाकार आकृतियों को रक्तकण मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि इन आकृतियों का आकार लगभग 15 माइक्रोन (micron) है। पक्षियों और अन्य सरीसृपों के रक्तकण आमतौर पर इनसे बड़े होते हैं क्योंकि उनमें न्यूक्लियस (nucleus) यानी कोशिका केंद्र होता है। हालांकि, वे हड्डियों में हीम और कोलेजन (collagen) प्रोटीन की उपस्थिति को स्वीकार करती हैं। इस विवाद के बावजूद, अधिकांश वैज्ञानिक सहमत हैं कि इस प्रकार के रासायनिक प्रमाण डायनासोर के बारे में नई जानकारी प्राप्त करने के लिए बहुत मूल्यवान हैं।
यह खोज भारत और दुनियाभर के आम लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पृथ्वी के इतिहास और विकास के बारे में हमारी समझ को बढ़ाती है। अब तक हम डायनासोर को केवल पत्थर बन चुकी हड्डियों के रूप में ही देखते थे, लेकिन अब हम उनके रक्त और कोशिकाओं तक पहुँच रहे हैं। इससे भविष्य में यह जाना जा सकेगा कि डायनासोर गर्म रक्त वाले (warm-blooded) प्राणी थे या ठंडे रक्त वाले। यूनिवर्सिटी ऑफ रेजिना के प्रोफेसर मौरिसियो बार्बी कहते हैं कि हम अब केवल यह पूछने के बजाय कि जीवाश्म कैसे दिखते हैं, यह समझने की ओर बढ़ रहे हैं कि वे प्राणी कैसे जीवित थे।

इस शोध के बाद अब दुनिया भर के संग्रहालयों में रखे पुराने जीवाश्मों का फिर से परीक्षण करने की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है। प्रोफेसर ग्राइस आशावादी हैं कि यदि संग्रहालय अपने संग्रह में मौजूद जीवाश्मों पर इस प्रकार के अत्याधुनिक परीक्षण करने की अनुमति दें, तो हमें डायनासोर के बारे में ऐसी कई जानकारियां मिल सकती हैं जो दशकों से हमारी नजरों के सामने होने के बावजूद छिपी हुई थीं। वर्तमान में कर्टिन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के शार्क बे (Shark Bay) से मिले माइक्रोबियल मैट्स के नमूनों पर मानव रक्त के खनिजीकरण के प्रयोग कर रहे हैं, ताकि इस जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझा जा सके।


