नाविक (NavIC): भारत की अपनी स्वदेशी ‘जीपीएस’ प्रणाली और NVS-03 मिशन की गहरी समझ
कारगिल युद्ध के कड़वे अनुभव से शुरू हुई भारत की आत्मनिर्भर नेविगेशन यात्रा अब NVS-03 के प्रक्षेपण के साथ एक नए और अधिक सटीक चरण में प्रवेश करने जा रही है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आगामी 30 अक्टूबर 2026 को अपने नेविगेशन नेटवर्क को मजबूत करने के लिए NVS-03 उपग्रह लॉन्च करने जा रहा है। यह मिशन भारत की अपनी नेविगेशन सिस्टम ‘नेविक’ (NavIC) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पुरानी पीढ़ी के उपग्रहों में आई कमियों को दूर कर आम नागरिकों के लिए अधिक बेहतर सेवाएं प्रदान करेगा। नेविक (NavIC) ‘नेविगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन’ (Navigation with Indian Constellation) का संक्षिप्त नाम है, जिसका अर्थ भारतीय भाषाओं में ‘नाविक’ या समुद्र खेने वाला होता है। यह एक स्वायत्त क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है जो रीयल-टाइम पोजिशनिंग, वेलोसिटी और टाइमिंग (PVT) सेवाएं प्रदान करता है।
नेविक की आवश्यकता के पीछे एक ऐतिहासिक और सामरिक कारण रहा है। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना को दुश्मन के सटीक स्थान की जानकारी प्राप्त करने के लिए अमेरिका की ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) के डेटा की आवश्यकता थी। उस समय अमेरिका ने भारत को यह डेटा देने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण भारतीय वायुसेना के पायलटों को गैर-मार्गदर्शित पेलोड छोड़ने के लिए अपने कॉकपिट में कमर्शियल GPS उपकरण लगाने पड़े थे। इस घटना ने भारत को समझाया कि संकट के समय विदेशी सिस्टम पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है। परिणामस्वरूप, मई 2006 में भारत सरकार ने अपनी स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम विकसित करने के प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी।
नेविक सिस्टम मुख्य रूप से भारत और उसकी सीमाओं से 1,500 किमी तक के क्षेत्र को कवर करती है। भविष्य में इस दायरे को बढ़ाकर 3,000 किमी तक करने की योजना है। यह सिस्टम 10 से 20 मीटर की पोजीशन सटीकता और 40 नैनोसेकंड की समय की सटीकता प्रदान करती है। नेविक दो प्रकार की सेवाएं देती है: एक है स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस (SPS), जो आम नागरिकों के लिए उपलब्ध है और दूसरी है रिस्ट्रिक्टेड सर्विस (RS), जो केवल सैन्य और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड रूप में होती है। ये सेवाएं L1, L5 और S बैंड फ्रीक्वेंसी पर कार्य करती हैं।
नेविक की पहली पीढ़ी को IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) श्रेणी के रूप में जाना जाता है। इस श्रेणी में कुल 7 उपग्रहों की योजना थी, जिसमें IRNSS-1A से IRNSS-1G शामिल थे। हालांकि, इस सफर में कई चुनौतियां आईं। IRNSS-1H उपग्रह कक्षा में पहुँचने में असफल रहा था, जिसके बाद IRNSS-1I को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। सबसे बड़ा चैलेंज उपग्रहों में लगी एटॉमिक क्लॉक (atomic clock) यानी परमाणु घड़ियों की विफलता का था। प्रत्येक उपग्रह में तीन रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक होती हैं, जो समय की सटीकता बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। पहली पीढ़ी के कई उपग्रहों में इन घड़ियों के फेल होने से नेविगेशन सेवाओं में बाधा उत्पन्न हुई थी।
सितंबर २०२४ तक केवल चार उपग्रह - IRNSS-1B, IRNSS-1F, IRNSS-1I और NVS-01 - नेविगेशन सेवाएँ देने में सक्षम थे। सटीक स्थान निर्धारित करने के लिए कम से कम चार उपग्रहों का कार्यरत होना आवश्यक है। मार्च २०२६ तक यह संख्या घटकर तीन रह गई थी, जो आवश्यकता से कम है। अन्य पाँच उपग्रह (1A, 1C, 1E, 1F, 1G) अपनी घड़ियाँ विफल होने के बाद केवल एकतरफ़ा ब्रॉडकास्ट मैसेजिंग सेवाओं के लिए उपयोग किए जाते हैं। इस समस्या के समाधान के रूप में ISRO ने दूसरी पीढ़ी के NVS उपग्रह लॉन्च करना शुरू किया है, जिसमें NVS-03 एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
₹ કરોડ
NVS-03 दूसरी पीढ़ी का तीसरा और नेविक श्रृंखला का कुल १२वाँ उपग्रह है। इस उपग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसमें उपयोग की गई स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक है। पिछले उपग्रहों में यूरोपीय कंपनी स्पेक्ट्राटाइम (SpectraTime) से आयातित घड़ियों का उपयोग किया जाता था, जिनमें कमियाँ पाई गई थीं। अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC) ने अब इन घड़ियों को भारत में ही विकसित किया है। NVS श्रृंखला के उपग्रहों का जीवनकाल भी १० वर्ष से बढ़ाकर १२ वर्ष कर दिया गया है। इस उपग्रह में L1 बैंड को शामिल किया गया है, जो स्मार्ट वॉच और फ़िटनेस ट्रैकर्स जैसे कम पावर वाले उपकरणों में नेविक के उपयोग को आसान बनाएगा।
NVS-03 में दो प्रकार के पेलोड हैं: नेविगेशन पेलोड और रेंजिंग पेलोड। नेविगेशन पेलोड उपयोगकर्ताओं को स्थान और समय के सिग्नल भेजता है, जबकि रेंजिंग पेलोड में ट्रांसपोंडर होते हैं जो दो-तरफ़ा दूरी मापने के लिए CDMA (कोड डिवीज़न मल्टीपल एक्सेस) मोड में कार्य करते हैं। यह प्रणाली सभी मौसम परिस्थितियों में निरंतर सेवा प्रदान करने में सक्षम है। NVS-03 को GSLV-F18 मिशन के ज़रिए श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया जाएगा। इस रॉकेट के पहले चरण की स्टैकिंग सितंबर २०२६ तक पूरी कर ली गई थी।
| विशेषता | प्रथम पीढ़ी (IRNSS) | दूसरी पीढ़ी (NVS) |
|---|---|---|
| मिशन आयुष् | १० वर्ष | १२ वर्ष |
| एटोमिक क्लॉक | आयाती (SpectraTime) | स्वदेशी (SAC Ahmedabad) |
| फ्रीक्वेंसी बैंड्स | L5 और S बैंड | L1, L5 और S बैंड |
| नागरिक उपयोग (L1) | उपलब्ध नहीं था | उपलब्ध है |
नेविक प्रणाली को केवल अंतरिक्ष में ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर भी मज़बूत बनाया जा रहा है। कर्नाटक के ब्याललु स्थित ISRO डीप स्पेस नेटवर्क कैंपस में एक नया सैटेलाइट नेविगेशन सेंटर स्थापित किया गया है। देश भर में २१ रेंजिंग स्टेशनों का नेटवर्क उपग्रहों की कक्षा तय करने और सिग्नल पर निगरानी रखने के लिए कार्यरत है। भारत सरकार का लक्ष्य पूरी तरह भारतीय नियंत्रण वाली प्रणाली बनाना है, जिसमें स्पेस सेगमेंट, ग्राउंड सेगमेंट और यूज़र रिसीवर तीनों भारत में ही बने हों।
हार्डवेयर क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। IIT बॉम्बे द्वारा ‘अजीत’ (AJIT) नाम का माइक्रोप्रोसेसर विकसित किया गया है। यह प्रोसेसर नेविक के रिसीवरों में इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया है। यह 70 से 120 MHz की गति से कार्य करता है और प्रत्येक क्लॉक साइकिल में एक निर्देश को निष्पादित कर सकता है। इस प्रोसेसर में मेमोरी मैनेजमेंट यूनिट और फ्लोटिंग पॉइंट यूनिट जैसी आधुनिक सुविधाएँ हैं, जो जटिल गणनाओं को तेज़ी से कर सकती हैं। इसके अलावा, क्वालकॉम (Qualcomm) जैसी बड़ी कंपनियों ने भी अपने स्नैपड्रैगन चिपसेट में नेविक का समर्थन देना शुरू कर दिया है, जिसका अर्थ है कि अब भारतीय स्मार्टफ़ोन में सीधा नेविक नेविगेशन उपलब्ध होगा।
- सिग्नल प्रसारणनेविक उपग्रह लगातार समय के स्टैम्प के साथ नेविगेशन सिग्नल भेजते हैं.
- सिग्नल प्राप्तिजमीन पर रहने वाले यूजर रिसीवर (जैसे कि स्मार्टफोन) इन सिग्नलों को प्राप्त करते हैं.
- गणनारिसीवर सिग्नल मिलने के समय और उपग्रह के स्थान के आधार पर दूरी की गणना करता है.
- स्थान निर्धारणविभिन्न उपग्रहों के डेटा को प्रोसेस करके रिसीवर अपना सटीक स्थान, वेग और समय तय करता है.
नेविक का उपयोग भारत में अनिवार्य बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। 1 अप्रैल 2019 से भारत में सभी कमर्शियल वाहनों के लिए AIS 140 मानक के अनुसार नेविक-आधारित ट्रैकिंग सिस्टम अनिवार्य कर दिए गए हैं। रक्षा क्षेत्र में मिसाइल टार्गेटिंग और सैन्य हलचल के लिए यह सिस्टम अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2020 में अमेरिकी कांग्रेस ने भी नेविक को उनके सहयोगी नेविगेशन सिस्टम के रूप में मान्यता दी है, जो यूरोप के गैलिलियो (Galileo) और जापान के QZSS के समकक्ष है।
प्रोजेक्ट के खर्च की बात करें तो, शुरुआत में इस प्रोजेक्ट का अनुमान ₹1,420 करोड़ था। जिसमें ग्राउंड सेगमेंट के लिए ₹300 करोड़, प्रत्येक उपग्रह के लिए ₹150 करोड़ और प्रत्येक PSLV-XL रॉकेट के लिए ₹130 करोड़ का अनुमान था। हालांकि, उपग्रहों की अदला-बदली और लॉन्चिंग में आई बाधाओं के कारण मार्च 2017 तक यह खर्च बढ़कर ₹2,246 करोड़ हो गया था। भारत सरकार अब नेविक के विस्तार को बढ़ाने के लिए उपग्रहों की संख्या 7 से बढ़ाकर 11 करने की योजना बना रही है। ये अतिरिक्त उपग्रह 42 डिग्री के झुकाव वाली जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित किए जाएंगे।

नेविक केवल स्थान खोजने के लिए ही नहीं, बल्कि समय के सटीक निर्धारण के लिए भी महत्वपूर्ण है। 2025 से भारत की नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी (NPL) में समय के संदर्भ के लिए GPS के बदले नेविक का उपयोग किया जाएगा। इसके लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने एकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स के साथ मिलकर स्वदेशी नेटवर्क टाइमिंग सिस्टम विकसित की है। इससे भारत समय के मापन के लिए भी अमेरिका पर अपनी निर्भरता घटा सकेगा।
भविष्य में नेविक सिस्टम में ऑप्टिकल एटॉमिक क्लॉक जैसी अत्यंत स्थिर तकनीक का उपयोग करने की भी योजना है। NVS-03 के सफल लॉन्चिंग के बाद NVS-04 और NVS-05 उपग्रहों को सितंबर 2027 तक लॉन्च करने का लक्ष्य है। ये नए उपग्रह नेविक नेटवर्क को और अधिक मजबूत बनाएंगे और भारत के प्रत्येक नागरिक के फोन और वाहन में सटीक नेविगेशन सुनिश्चित करेंगे। कारगिल के उस कड़वे अनुभव ने भारत को जो सबक सिखाया था, उसका परिणाम आज एक अत्याधुनिक और आत्मनिर्भर अंतरिक्ष तकनीक के रूप में हमारे सामने है।



